Tuesday, November 24, 2020

मिलन - Final Part

 Please read first part of this story, before reading this part, than you will get easily be connected with this final part.



     सुबह की चहल कदमी से जब सौम्य की आँख खुली, तो उसने रोहित को अपने पैरों के पास बैठा पाया। रोहित की आँखे अभी बन्द थी, और वो गहरी नींद के आगोश में था। सोते हुए रोहित के चेहरे पर जो मासूमियत का नूर छाया हुआ था, सौम्य के लिए रोहित के चेहरे से नज़रें हटा पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था। रोहित की अब तक कि बातों, और उसके व्यवहार से, सौम्य अब तक ये तो समझ चुका था, की रोहित एक नेक दिल इंसान है, और उसके मन में कहीं ना कहीं सौम्य के लिए जगह भी बन चुकी है। लेकिन क्या रोहित भी सौम्य की तरह, लड़कों में रुचि रखता है??? इस बात की पुष्टि अभी तक सौम्य को नही हो पाई थी। सौम्य रोहित के चेहरे को निहार ही रहा था कि ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी। सामने वाली सीट पर बैठे बाबा, रोहित को धन्यवाद कहने के लिए, उसके कंधे पर हाँथ रखने ही वाले थे कि सौम्य ने उन्हें रोक दिया।


सौम्य :- "नहीं बाबा, अभी गहरी नींद में है, मत उठाइये।"


बाबा :- "ठीक है बेटा, जब ये उठ जाए तो मेरी ओर से इसे धन्यवाद कह देना। बहुत ही गुणी बच्चा है। रात में भी मेरी मदद की और तुम्हे कोई परेशानी ना हो, इसलिए तुम्हे सोते से उठाया नही, और रात भर यही तुम्हारे पैरो के पास बैठा रहा। आज कल कोई नही सोचता दूसरों के बारे में। भगवान इसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करे।"



      बाबा रोहित को ढेरों आशीर्वाद देकर ट्रैन से उतर गए। और ट्रेन आगे बढ़ दी अपने आखिरी पड़ाव, कानपुर की ओर। तभी रोहित की भी आँख उसके मोबाइल पर आते एक फ़ोन कॉल से खुल गयी।



पराग (रोहित का मौसेरा भाई) :- "हाँ भैया!! कहा तक पहुंची आपकी ट्रेन। मौसी ने तो सुबह से बवाल ही मचा रखा है, और हमें यही स्टेशन पर बिठवा दिया है।"


रोहित :- (आँखे मलते हुए) "बस आ ही गए समझो, अब ज्यादा इंतेज़ार नही करना पड़ेगा तुम्हे।"



      फ़ोन रख कर रोहित ने सौम्य की ओर देखा। और सौम्य को देख कर ही रोहित के चेहरे पर मुस्कान छा गई। बाहर खिड़की से आती सुबह की ठंडी हवा, और उगते सूरज की मद्धम किरणों में, सौम्य का चेहरा पहले से भी ज्यादा हसीन नज़र आ रहा था। दोनों बिना कुछ कहे ही बस एक दूसरे की आँखों मे डूबने की कोशिश कर रहे थे। मानो नज़रों से ही एक दूसरे के दिल का हाल जान लेना चाह रहे हो। सौम्य को तो रोहित के मन का थोड़ा बहुत अंदाज़ा हो गया था, लेकिन सौम्य के अब तक के बर्ताव से, रोहित को ज़रा सी भी भनक नही थी, की सौम्य के मन मे क्या है। दोनों ही एक दूसरे को कहना तो बहुत कुछ चाहते थे, लेकिन इस हसीन सफर के बाकी बचे कुछ पलों को खराब भी नही करना चाहते थे। दोनों ही बस एक दूसरे की नज़रों में ही खोये हुए थे। नैनों की जुगलबंदी कुछ यूं चली की, दोनों को ही समय का होश ही नही रहा। कब कानपुर स्टेशन आ गया और ट्रेन स्टेशन पर आ कर खड़ी भी हो गयी, सारी सवारियां भी उतर गई, लेकिन ना तो दोनों की पलकें भी झपकी, और ना ही उन्हें पता भी चला कि ट्रेन रुक चुकी है। दोनों का सम्मोहन तब भंग हुआ, जब पराग उनके पास पहुंचा।


पराग :- (रोहित के कंधे को हिलाते हुए) "लो हम आपको सारे स्टेशन पर ढूंढ रहे हैं, और आप यहां मौन धारण किये बैठे हो।"


रोहित :- (आश्चर्य से) "अरे इतनी जल्दी कानपुर आ गया। हमें तो पता भी नही चला।"



      पराग ने रोहित का बैग उठाया और ट्रेन से बाहर आने लगा। और रोहित ने सौम्य का बैग उठाने के लिए उसका बैग पकड़ा ही था, की सौम्य ने उसे रोक दिया।



सौम्य :- "अरे क्या कर रहे हैं रोहित जी। हम उठा लेंगे।"


रोहित :- "सौम्य जी अब आप कानपुर के ही नही, हमाए भी मेहमान है, तो थोड़ी मेहमान नवाज़ी करने दीजिए।"


      रोहित सौम्य का बैग लेकर ट्रैन से बाहर आ गया। स्टेशन पर रोहित ने सौम्य को उसका बैग पकड़ाया, और उस से बात करने ही वाला था कि, पराग ने उसे टोक दिया।


पराग :- "अब चलो भी भैया!!! मौसी अब तक पचासों फ़ोन कर चुकी हैं। आपको तो कुछ नही कहेंगी, लेकिन हमाई तो खटिया खड़ी हो जाएगी।"


      रोहित ने पराग से 2 सेकण्ड्स का इशारा किया, और सौम्य का मोबाइल नंबर मांगने के लिए उसकी ओर मुड़ा ही थी, की तभी वहां, सौम्य को लेने, उसकी बुआ का लड़का शेखर आ गया।


पराग :- "अरे शेखर जी। आप भी किसी को लेने आये है क्या??"


शेखर :- (सौम्य की ओर इशारा करते हुए) "हाँ!!! इन्हें ही लेने आये हैं। ये सौम्य हैं!!! हमारे मामा के लड़के।"


पराग :- "अच्छा!!! हम भी रोहित भैया को लेने ही आये थे।"


      रोहित और सौम्य वहां खड़े, उन दोनों को आश्चर्य से ही देखे जा रहे थे, की ये दोनों एक दूसरे को कैसे जानते हैं।


शेखर :- (रोहित की ओर अपना हाँथ बढ़ाते हुए) "अच्छा तो आप हैं रोहित जी!!! जीजाजी से बड़ी तारीफ सुने हैं आपकी।"


      रोहित ने शेखर से हाँथ तो मिला लिया, लेकिन अभी उसके चेहरे पर कई प्रश्नवाचक चिन्ह बने हुए थे। जिनका उत्तर पाने के लिए उसने पराग की ओर, बड़ी आस भारी निगाहों से देखा।


पराग :- "अरे ज्यादा कंफ्यूजाइये नहीं। हम बताते हैं। ये हैं शेखर जी!!! अपनी होने वाली मामी के भाई।"



      पराग के मुँह से ये बात सुन कर तो, जैसे रोहित के कानों में मिश्री सी घुल गयी थी। अब ना तो सौम्य के साथ का ये सफर आख़िरी था, और ना ही ये मुलाकात। अब  सौम्य से भी रिश्तेदारी जो हो गयी थी। इस बात के बारे में सोचने से ही, रोहित के चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान छा गयी थी। यूं तो रोहित का सौम्य से दूर जाने का मन तो नही हो रहा था, लेकिन अपने मन को मार कर, और दिल को फिर से मुलाकात की तसल्ली देकर, वो पराग के साथ, सौम्य को अलविदा कह कर, अपने घर आ गया था। 


      यूं तो शादी वाले घर मे पहले से ही कई मेहमान थे, ढोलक के थाप थे, महकते फूलों की सजावट के साथ, टिमटिमाती लइटों की जगमगाहट थी, शोर शराबा था, रौनक थी। लेकिन फिर भी रोहित के घर आते ही, सारे माहौल में ऐसा जोश भरा, मानो किसी मोहल्ले की गई लाइट कुछ देर बाद वापस आ गयी हो। अलका जी सारे काम छोड़, भागकर आईं और रोहित को अपने गले से लगा लिया।


अलका जी :- "कितने दुबला गए हो, खाना वाना टाइम से खाया करो।"


रोहित :- "अरे मम्मी आपको तो हम हर बार दुबले ही लगते हैं। अब आप अपना लाड़ प्यार दिखाओ, और कुछ खिलाओ हमे, बहुत तेज भूख लगी है।"


अलका जी :- (अपनी छोटी बहन को आवाज़ लगाते हुए) "अरे सरोज!!! बन गए क्या आलू के पराठे??? देखो रोहित आ गए हैं।"(अपनी दूर की मौसी को रोहित के बारे में बताते हुए) "देखो मौसी, ये हैं रोहित, इंदौर के बहुत बड़े कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं, अगले साल तक बोहोते अच्छी नौकरी भी पा लेंगें। बस फिर उसके बाद इनकी शादी में बुलाएंगे आपको, और कोई बहाना नही सुनेंगे, आना ही पड़ेगा....."


रोहित :- (अलका जी के कान में फुसफुसाते हुए) "क्या मम्मी आप फिर से शुरू हो गईं। कितनी बार मना किये हैं आपको, ऐसा करने से।"


अलका जी :- "अरे इसमे शर्माने की क्या बात है??? जब सबको पता होगा, की तुम क्या कर रहे हो क्या नहीं, तभी तो कोई अच्छा शादी का रिश्ता बताएगा तुम्हाए लिए।"



    ये अलका जी का हर बार का किस्सा हुआ करता था। जब भी उन्हें मौका मिलता था, वे अपने बेटे की तारीफों के पुल बांधना शुरू कर दिया करती थीं। और अलका जी की ये आदत, रोहित और उसके पापा, दोनों को ही बिल्कुल पसंद नहीं थी। लेकिन दोनों की ही अलका जी के आगे एक ना चलती थी। होता वही था, जो अलका जी चाहती थीं। इसलिये रोहित अपनी मम्मी की बातों को नजरअंदाज कर, पराग के साथ, अपने मामा से मिलने चला जाता है। 



     चादर को सर तक ढके, गोलू मामा तो ऐसे लेटे थे, जैसे ये किसी और कि शादी में आये दूर के रिश्तेदार हों। रोहित ने जाकर जब उनके ऊपर से चादर खींचा, तब जाकर सारा मामला साफ हुआ। गोलू मामा सो नही रहे थे, बल्कि होने वाली मामी से फ़ोन पर बतिया रहे थे।


रोहित :- "वाह हमाए प्यारे मामा, हम वहाँ इतनी दूर से सिर्फ आपके लिए यहाँ तक आये, और आप हमें लिवाने स्टेशन तो छोड़ो, घर के बाहर भी नही आ सके???"


गोलू मामा :- (फ़ोन को कान और कंधे के बीच मे दबाये) "अरे क्या बताए भांजे!! घर की महिलाओं ने हमारा घर से निकलना ही बंद करवा दिया है। और हम नीचे आ ही रहे थे कि तब तक तुमाई होने वाले मामी का फ़ोन आ गया।"


रोहित :- "बोहोत सही मामा!!!! अभी शादी हुई नही, और हम से ज्यादा मामी प्यारी हो गयी आपको!!!"


गोलू मामा :- "अरे नही भांजे, ऐसी कोई बात नहीं। वो तुमाई मामी ने तुम्हें थैंक्यू कहने के लिए ही फ़ोन किआ है। तुमने उनके भाई, सौम्य का रास्ते भर जो ख्याल रखा उसके लिए।"


रोहित :- "लाईये जरा हमाई बात कराइये।" (गोलू मामा के हाथ से फ़ोन लेते हुए) "नमश्कार मामी जी! कैसी हैं आप??"


लतिका (रोहित की होने वाली मामी) :- "हम बहुत अच्छे हैं रोहित जी, आप कैसे हैं? सुने हैं कि आप रात भर ठीक से सो भी नही पाए!!!"


रोहित :- "बिल्कुल ठीक सुना है आपने मामी जी, वैसे खातिरदारी करवाना तो लड़के वालों के जिम्मे होता है, लेकिन चलिए कोई बात नही।"


लतिका :- "अरे आप शाम को आएंगे, तो अच्छे से खातिरदारी होगी आपकी। लेकिन सच कहें रोहित जी, पहले दीदी मतलब आपकी मम्मी और आपके मामा, दोनों से आपकी बहुत तारीफ सुनी थी, तो लगा कि ये लोग कुछ बड़ा चढ़ा कर बोल रहे होंगे। लेकिन आज जब सौम्य ने भी आपकी तारीफ की, तो लगा कि आप शायद सच मे ही तारीफ के लायक होंगे।"


रोहित :- "अब ये तो आप हमसे मिलकर बताना मामी जी। वैसे हैं कहाँ आपके भाई साहब????"


लतिका :- "रात को ही मिल लीजियेगा।"



      कुछ और यहां वहां की बातें कर रोहित ने फोन रख दिया और अपने मामा और पराग से बतियाने लगा। इतने दिनों तक जो वह इन सब लोगों से दूर था, तो उन लोगों को अपने हॉस्टल के, इंदौर के कई कहानी किस्से सुनाने लगा। और रह रह कर उसका ध्यान हाँथ में बंधी घड़ी की ओर जाता रहा। अब रोहित के लिए शाम तक का इंतज़ार करना बहुत भारी होता जा रहा था। रोहित ने मामा को डांस के स्टेप भी सीखा दिए, उनके रात को पहनने वाले कपड़ों को भी व्यवस्थित लगा दिया, अपने कपड़ों को भी तैयार कर लिया। मम्मी के साथ बाकी रिश्तेदारों से भी मिल लिया। फ़्री होने के बाद जब घड़ी की ओर देखा, तो अभी तो बस दोपहर के 1 ही बजे थे। अभी तो पूरे 7 घण्टे बाकी थे, बारात निकलने में, और सौम्य से मिलने में। दोपहर का खाना खा कर, रोहित कुछ देर के लिए गोलू मामा के कमरे में ही, थोड़ा आराम करने के लिए लेट गया। और रात भर ठीक से ना सो पाने के कारण उसे तुरंत नींद भी आ गई। और ये नींद का झोंका साथ ले कर आया एक खास सपना, जिस सपने में था सौम्य, उसका भोलापन, उसका नकली गुस्सा और उसकी सादगी। रोहित का ये साधारण सा सपना, सौम्य की वजह से बहुत खास हो गया था। रोहित अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर, अपने स्कूल के अंतिम वर्षो में ही सजग हो चुका था, लेकिन अपने घरवालों, और समाज मे मज़ाक का पात्र ना बनने के उद्देश्य से, उसने अपनी इस सच्चाई को बस अपने तक ही छुपा कर रखा हुआ था। यूं तो कानपुर के कॉलेज, और फिर इंदौर के कॉलेज में उसे काफ़ी लड़के पसंद भी आये, लेकिन उसने कभी उन लोगों के बारे में ज्यादा गंभीरता से विचार नही किआ। लेकिन सौम्य के साथ का ये कुछ घंटों का सफर मात्र, उसके दिल और दिमाग पर इतनी गहरी छाप छोड़ चुका था, की अब सौम्य ने उसके सपनों में भी अपनी जगह बना ली थी। शाम 5 बजे मामा ने रोहित को उठाया, और रात की तैयारियों का एक मुआयना करने को कहा। रोहित ने भी सभी इन्तेज़ामो का निरीक्षण किया। इन सब मे 7 बज चुके थे। और सभी लोग बारात के लिए तैयार भी होने लगे थे। गोलू मामा को तैयार कर, रोहित भी झट से तैयार हो गया। जितनी खुशी उसे मामा की बारात की थी, उससे कहीं ज्यादा सौम्य से मिलने की।


      बारात बड़ी धूम धाम, नाच गाने के साथ, अपने गंतव्य तक जा पहुँची। बारात आगमन की सभी रस्मों के बाद, दूल्हे को प्रांगण में बने स्टेज पर ले जाया गया, जहाँ जय माला का प्रोग्राम किआ जाना था। स्टेज पर गोलू मामा के साथ, उनके कुछ दोस्त, उनके सभी भांजे भंजियाँ, उनका उत्साह बढ़ाने के लिए मौजूद थे। और तभी, प्रांगण के एक कोने से आगमन हुआ, दुल्हन का। एक चमकीली चादर को, चारो कोनो से पकड़े उनके भाई, और उसके नीचे दुल्हन, उसकी सहेलियों और बहनों के साथ स्टेज तक जा पहुँची। यूं तो किसी भी शादी में, जब दुल्हन का आगमन होता है, तो वहाँ मौजूद सभी लोगों की नजरें उसी दृश्य में अटक सी जाती हैं। लेकिन इस शादी में, बस वो 2 नज़रें कुछ अलग सी थीं, जो सभी को नजरअंदाज कर, आपस मे बंधी हुई थीं। वो दोनों नज़रें दूल्हे, दुल्हन की ना होकर, रोहित और सौम्य की थीं। रोहित को सुबह से ही जिस पल का इंतज़ार था, अब वो पल आ चुका था। नीले रंग की चमकीली सी शेरवानी उस पर काले रंग का दुपट्टा लिए, सौम्य बेहद ही मनमोहक लग रहा था। उसने अपने सम्मोहन में रोहित को कुछ यूं बांध रखा था, की गोलू मामा की शादी की एक बहुत खास रस्म, जयमाला, सम्पन्न हो चुकी थी, और रोहित को उसकी कोई सुध भी नही थी। अब सभी लोग स्टेज से नीचे उतर रहे थे, और दूल्हा - दुल्हन के साथ, सभी के फोटो खिंचवाने का सिलसिला शुरू होना था। पराग ने धक्के के साथ, रोहित का सम्मोहन भंग करवाया, और उसे स्टेज से निचे लेकर आया।


पराग :- "क्या हुआ है भैया आपको??? हम सुबह से ही देख रहे हैं, आप कहीं खोये खोये से हो। क्या कोई मामी की सहेली या बहन पसंद तो नहीं आ गयी आपको???"


रोहित :- "हाँ भाई, कुछ ऐसा ही समझ लो!!!'


पराग :- "क्या बात कर रहे हो भैया??? हम अभी मौसी को बताते हैं, वो तो बहुत ही खुश हो जाएंगी। बेचारी कितनी परेशान है आज कल, अपनी बहू की खोज में।"


    

     ये कहते हुए, पराग, रोहित को छेड़ने के बहाने से, अलकायदा जी की और दौड़ पड़ता है। और रोहित भी उसे रोकने के लिए, उसके पीछे भागता है। और जा टकराता है, सौम्य से।



सौम्य :- "अरे अरे रोहित जी, संभाल कर। कहाँ भागे जा रहे हैं?"


रोहित :- "सॉरी सौम्य जी!!! वो बस..... वैसे आज आप बहुत ही अच्छे लग रहे हैं। ये रंग बहुत जच रहा है आप पर!"


सौम्य :- "शुक्रिया!! आप का भी ये मेहरून कुर्ता अच्छा लग रहा है, लेकिन इस पर जो आपने ये सफेद जैकेट डाला हुआ है, वो इसके रंग को दबा दे रहा है। आपको इसके ऊपर काले रंग की जैकेट पहननी चाहिए थी।"


रोहित :- "अरे सौम्य जी, अब आपके यहाँ होते हुए, हमाए ऊपर कोन इतना ध्यान देगा।"


सौम्य :- (अपने एक कज़न भाई से मिठाइयों से भरी थाली मंगवा कर) "हम हैं ना आपको देखने के लिए, ये लीजिये, अब से आपकी ख़ातिरदरी शुरू होती है। हमें आपकी पसंद नापसंद का ज्यादा अंदाजा नही था, इसलिए यहाँ  जो कुछ भी मौजूद था, वो सब आपके सामने हाज़िर है।"


रोहित :- "अरे सौम्य जी, हम तो मामी जी से बस मज़ाक़ किये थे, आप तो सीरियस ही हो गए।"


सौम्य :- "आप लड़के वाले हैं, आपकी खातिरदारी हम सीरियसली ही करना चाहते हैं।"



       सौम्य ने अपने सभी भाई बहनों के साथ मिलकर, सभी बारातियों की खूब खातिरदारी की। सभी बारातियों का बहुत ख़्याल भी रखा। सौम्य का ये रूप देख कर, रोहित थोड़ा आश्चर्यचकित भी था। कल रात में गुस्से को अपने चेहरे पर पहने हुए वाले सौम्य, और आज रात के, चेहरे पर मुस्कान लिए, सबकी पसंद नापसंद का ख्याल रखने वाले सौम्य में, ज़मीन आसमान का अंतर था। जो सिर्फ रोहित को ही समझ आ रहा था, क्योंकि उसके अलावा, किसी ने भी कल वाले सौम्य को जो नही देखा था। लेकिन सौम्य के इस रूप ने भी, रोहित के दिल को और ज्यादा उसके करीब ही ला दिया था। और कल सौम्य बनावटी गुस्सा दिखा रहा था, सौम्य का आज का रवैया इस बात का गवाह था। उधर पराग ने भी मज़ाक मस्ती में, अलका जी और बाकी सभी लोगो को, रोहित भैया को पसंद आई लड़की की खबर को, सब तक पहुंचा दिया था। तो सभी लोग, वहाँ मजूद सभी लड़कियों की तरफ इशारा कर कर के, रोहित से उसकी स्वीकृति माँगने में, और रोहित को छेड़ने में लगे थे। जो कि फेरो का समय आते आते, रोहित के लिए सिर दर्द बन चुका था।



   फेरों से पहले, दूल्हा - दुल्हन के लिए, खाने की एक मेज सजाई गई। जहां दूल्हे ओर उनके कुछ रिश्तेदारों को बड़े ही सम्मान के साथ, लड़कीवालों ने खाना खिलाया। अब लड़कीवालों की तरफ से जो भी लड़की, रोहित को खाना परोसने आती, तो वहाँ बैठे रोहित के सभी रिश्तेदार, कुछ ना कुछ आवाजें निकालते, तालियां बजाते, और रोहित को छेड़ते। इन सब से तंग आकर, कुछ देर बाद, रोहित गोलू मामा को, फेरों के लिए कपड़े बदलवाने के लिए वहाँ से लेकर आ गया। और गोलू मामा को फेरों के लिए तैयार करवा कर, जब उसने खुद को आईने में देखा, तो उसे सौम्य की कही बात भी याद आ गयी, की मेहरून कुर्ते के साथ काले रंग की जैकेट ज्यादा अच्छी लगती।



       कुछ देर बाद, सभी लोग मण्डप के नीचे फेरों के लिए एकत्रित हुए। रोहित सबसे नज़रें बचा कर, सौम्य के पास जा बैठा। और जब सौम्य की नज़र रोहित पर पड़ी, तो सौम्य के चेहरे पर अनायास ही एक मुस्कान छा गयी।



सौम्य :- "अरे वाह रोहित जी। ये ब्लैक जैकेट तो सच मे ही बहुत खिल रही है आपके ऊपर।"


रोहित :- "अब आपकी सलाह को कैसे टाल सकते थे?"



       बस युही सारी रात, रोहित और सौम्य की आँख मिचोली चलती रही। रोहित के अथक प्रयासों के बाद भी, वो सौम्य के मन की बात को समझने में नाकामयाब ही रहा। उसने कोशिशें तो बहुत की, लेकिन इतने सारे रिश्तेदारों के बीच, और पराग की उस मस्ती के बाद तो सबका खास ध्यान रोहित के ऊपर ही होने की वजह से, वो जिस बात को अपने मन मे लेकर यहाँ आया था, की सौम्य के मन को टटोलेगा, उसके मन की बात को जानने की कोशिश करेगा। वो ऐसा करने में नाकामयाब ही रहा। और धीरे धीरे, सुबह भी होने आए थी और सभी विदाई की तैयारियों में भी लग चुके थे। बातों बातों में रोहित को मालूम लग चुका था, की सौम्य शाम की ट्रेन से वापस इंदौर भी जा रहा है। तो अब रोहित के पास समय भी कम ही था, सौम्य को अपने मन की बात बताने ओर उसके मन की बात को जानने का। इसलिए उसने हिम्मत करके, सौम्य को कुछ देर के लिए अपने साथ, उस प्रांगण से बाहर चलने को मना लिया। और दोनों प्रांगण की पार्किंग में जा पहुँचे।



सौम्य :- "क्या बात हो गयी रोहित जी??"


रोहित :- "वो मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ.. लेकिन मुझे समझ नही आ रहा कि मैं कहाँ से शुरू करू।"


सौम्य :- (रोहित के मन की बात को भांपते हुए) "एक काम करते हैं रोहित जी, कल दोपहर में आपकी उधार चाय के लिए मिलते हैं, फिर बात करेंगे। अभी दीदी की विदाई भी होनी है, और आपके घरवाले भी आपको खोज ही रहे होंगे। (वहाँ से जाते हुए) रोहित जी आपसे एक बात कहें, आप जो भी हमसे कहना चाहते हैं ना, वो कहने से पहले अपने परिवार के बारे में अच्छे से सोच लीजियेगा। क्योंकि हमें रिश्तों में मिलावट बिल्कुल पसंद नहीं है।"



   अपनी बात कह कर, सौम्य वहाँ से चला जाता है। और रोहित वहां खड़ा खड़ा, सौम्य की कही बात के बारे में ही सोचता रहता है। कि वो यहाँ सौम्य के मन की बात जानने के लिए उसे बुलाकर लाया था, और सौम्य तो उसे और ज्यादा उलझा कर ही चला गया। इतने में पराग रोहित को ढूँढता हुआ वहाँ आ जाता है, और रोहित को वहां से लेकर चला जाता है। कुछ देर में ही, दुल्हन को विदा करा कर, सारा परिवार हँसी खुशी घर वापस आ जाता है, और नई दुल्हन के गृह प्रवेश की रस्म भी शुरू हो जाती है। फिर कुछ लोग रात भर की नींद पूरी करने में लग जाते हैं, और कुछ यहां वहां के काम निपटाने लगते हैं। और रोहित, वो तो अभी भी सौम्य की कही बात का अर्थ ही ढूंढने में खोया रहता है।



       दोपहर होते ही, रोहित सौम्य को फ़ोन करता है, और उसे एक रेस्टोरेंट का पता बताता है, और वहाँ पहुंच कर, सौम्य का इंतज़ार करने लगता है। सौम्य भी रोहित के बताए पते पर पहुंच जाता है, और रोहित से मुलाकात करता है। रोहित कुछ कहे उससे पहले ही सौम्य रोहित से कहता है।



सौम्य :- "रोहित जी मैं गे हूँ, और मुझे ये बात बोलने में कोई संकोच भी नही है। मेरे घरवाले, और मेरे खास दोस्त भी इस बात से अवगत हैं। मैं आपको एक बात और बताना चाहता हूँ। नागपुर में मेरा एक बॉयफ्रेंड भी था, हम साथ मे ही कॉलेज में थे, और हमारा रिलेशन 4 सालों तक चला। हम दोनों ही एक दूसरे से बहुत प्यार भी करते थे। काफी अच्छा समय हमने साथ बिताया है। हम हमेशा शाम की चाय के लिए साथ ही जाते थे, इसलिए अब जब भी चाय पिता हूँ तो उसकी याद आती है।......."


रोहित :- (सौम्य को बीच मे ही रोकते हुए) "क्या आप अभी भी उससे प्यार करते हैं???"


सौम्य :- "नहीं वो बात नहीं है, लेकिन मैं अभी आपसे कुछ और बात करना चाहता हूँ।"


रोहित :- "सॉरी!!!!"


सौम्य :- "कोई बात नही!!! मैं आपकी भावनाओं को अच्छे से समझ सकता हूँ। मैं ये भी जनता हूँ कि आप मेरी तरफ आकर्षित है। और मैं भी कुछ हद तक आपको पसंद करने लगा हूँ। लेकिन मैं जो आपसे कहना चाहता हूं, वो बात थोड़ी अलग है, मैं आशा करता हूँ कि आप उसे समझेंगे।"


     सौम्य अपनी बात बीच मे ही रोक कर, अपना मोबाइल निकलता है, और उसमें एक छोटे से परिवार की फ़ोटो रोहित को दिखाता है। जिसमे एक पति एक पत्नी और उनकी गोद मे एक छोटा सा बच्चा होता है।



सौम्य :- "ये किशोर है, मेरा पहला प्यार। और मेरे मन मे उसके लिए कोई कड़वाहट भी नही है। ये उसका फैसला था, और वो इस फैसले के साथ खुश है। मुझे इस बात का भी कोई मलाल नही, की उसने मुझे छोड़ कर अपने परिवार वालों के कहने पर किसी लड़की से शादी की। लेकिन हाँ, मुझे अफसोस है, की उसने शादी करने के बाद भी, मुझसे रिश्ता जोड़े रखने की बहुत कोशिशें की। और उसी के चलते, मैंने स्वेछा से अपने घर को छोड़ कर, इतनी दूर ट्रांसफ़र ले लिया। ये मेरा फैसला था, और शायद इसके चलते ही, वो अपने जीवन मे खुश रह सके, और मैं अपने।"


रोहित :- "माफ़ी चाहूंगा सौम्य जी, लेकिन हमाई कुछ समझ नहीं आ पा रहा है, की आप मुझसे क्या चाह रहे हैं??"


सौम्य :- "मैं आपसे सिर्फ ये कहना चाहता हूँ रोहित जी, की अगर मुझे एक और टूटे रिश्ते का दर्द सहना है, तो उससे बेहतर मैं अकेला रहना ही पसंद करूँगा। कल मैंने आपके घरवालो की तरफ से जो भी महसूस किया, और जितना भी आपकी मम्मी जी से बात की, वे सभी आपकी शादी को लेकर बड़े उत्साहित हैं। और मैं सिर्फ अपनी खुशी के लिए, इतने सारे लोगो के सपने नही तोड़ना चाहता। क्योंकि सपनों के टूटने का दर्द में अच्छे से महसूस कर सकता हूँ। और जैसा मैंने आपसे कल कहा, की मुझे रिश्तों में मिलावट बिल्कुल पसंद नही है। तो मैं, एक ही समय पर दो रिश्तों को साथ मे जीने के भी पक्ष में नही हूँ। तो हमारे लिए यही बेहतर होगा, की हम अपनी भावनाओं को बस यहीं तक सीमित रखें। और अपनी अपनी ज़िंदगी मे आगे बड़ें।"



     सौम्य अपनी बात कह कर चुप हो जाता है। और कुछ देर के लिए वहां एक दम सन्नाटा छा जाता है। सौम्य रोहित के कुछ कहने का इंतज़ार करता है, और वहीं रोहित, सौम्य द्वारा कही गयी सारी बातों को अपने ज़ेहन में बैठाने की कोशिश करता है। और रोहित की खामोशी का मतलब समझ कर, सौम्य रोहित से अलविदा लेता है।



सौम्य :- "चलिए रोहित जी, अब हम चलते हैं। शाम को हमारी ट्रेन भी है। आपसे मिलकर सच मे बहुत अच्छा लगा, आप एक सच्चे और नेक दिल इंसान हैं। फिर कभी मौका मिला, तो वापस आएंगे आपके शहर कानपुर। वाक़ई बहुत अच्छा शहर है आपका।"



     सौम्य वहाँ से चला जाता है। दरअसल वो आया तो था रोहित के मन की बात जानने के लिए। और उसे उम्मीद भी थी, की रोहित उसकी बात को समझेगा, और इस रिश्ते को एक मौका देने पर थोड़ा तो जोर देगा। लेकिन रोहित की ख़ामोशी ने सौम्य को, असल जिंदगी का आईना ही दिखा दिया था। यहाँ सब प्यार तो करना चाहते हैं, संभोग भी करना चाहते हैं, लेकिन प्यार के रिश्ते को प्यार से निभाना नही चाहते। सौम्य रोहित की खामोशी से थोड़ा आहात तो था, लेकिन जो दर्द उसे इस रिश्ते में आगे चल कर मिलता, वो रिश्ता शुरू ही ना होने से थोड़ा सहज भी था। अपने पिछले रिश्ते के अनुभवों से, रोहित की खामोशी का भी, सौम्य को ज्यादा बुरा नही लग रहा था। वो इस बात से भली भांति अवगत था, की आज कल समलैंगिक प्यार तो बड़ी आसानी से मिल जाता है, लेकिन उस प्यार को स्वीकार कर, अपने घरवालों की रजामंदी लेना हर किसी के बस की बात नही होती। इसलिए आज के दौर में भी, कई समलैंगिक लोग, अपने मन मे तो किसी और को प्यार करते रह जाते हैं, और समाज के या अपने घरवालों के दबाव में, अपनी सारी इकच्छाओ, भावनाओ को दबा कर, किसी और से शादी कर, अपने जीवन मे आगे बढ़ने की झूठी कोशिशें करते रहते है। जिनमे कुछ लोग तो सफल भी हो जाते है, और सारी जिंदगी उस घुटन भारी ज़िन्दगी में निकाल देते हैं, और कुछ उस झूठी शादी के रिश्ते को ज्यादा दिन नही संभाल पाते, और 2 ज़िन्दगियों को बर्बाद कर देते हैं। 



     थोड़े भारी मन से सौम्य अपनी बुआ जी के घर से, सब से विदा लेकर, कानपुर रेल्वे स्टेशन आ गया था। शेखर, सौम्य की बुआ का लड़का, सौम्य को उसकी ट्रैन में बैठा कर अलविदा कह कर वहां से जा चुका था। और ट्रेन भी धीरे धीरे प्लेटफॉर्म से निकल चुकी थी। चूंकि ट्रैन कानपुर से ही बनकर चल रही थी, तो ज्यादा सवारी भी नही थी। और सौम्य के कूपे में तो बस वो अकेला ही था। सौम्य अपनी सीट पर बैठा, खिड़की से टेक लिए, आँखे बंद कर के रोहित के, और उसके साथ बिताए समय के बारे में ही सोच रहा था। कि एक जानी पहचानी आवाज़ उसके कानों में गूंजी।



"एक्सक्यूज़ मी!!!!! क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ??"


     सौम्य ने पलट कर देखा, तो ये कोई और नही, रोहित ही था। अपने प्यारे से चेहरे पर सुंदर सी मुस्कान और आँखों मे हल्की सी नमी के साथ, प्यार की चमक लिए, सौम्य के सामने खड़ा था।


सौम्य :- "रोहित जी आप??"


रोहित :- "वो क्या है ना सौम्य जी, कनपुरिया हूँ, ये प्यार मोहब्बत की बात समझने में थोड़ा समय जरूर लेता हूँ, लेकिन एक बार जो समझ लूँ, तो फिर अपने प्यार को खुद से दूर जाने भी नही देता।"


     सौम्य ने कुछ बोलने के लिए अपना मुँह खोला ही था की, रोहित ने उसे ये बोल कर चुप करवा दिया, की "वहाँ आपने बोला और मैंने सुना, अब आप मेरी पूरी बात सुन लेने के बाद ही बोलियेगा।"



रोहित :- "सौम्य जी मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ, की अगर मैं आपके साथ रिश्ता निभाता हूँ, तो मैं अपने घरवालों के सपने तोड़ दूंगा। लेकिन जब मेरे घरवालों को इस बात का पता चलेगा कि उनके सपनों की वजह से मेरा सारा जीवन एक घुटन में बीतेगा, तो मैं ये दावे से कह सकता हूँ कि वो अपने सपनो के टूटने से कहीं ज्यादा, मेरा जीवन बर्बाद करने से दुखी होंगे। इसलिए मैं अपने और अपने परिवार वालों की तरफ से आपको निश्चिंत कर देना चाहता हूँ, की हमारी तरफ से आपको एक और टूटे रिश्ते का दर्द बिल्कुल नही सहना होगा। और मैं आपकी रिश्तों में मिलावट की बात से भी पूरी तरह सहमत हूँ। मैं ये आपको यकीन दिलाता हूँ, की आपके रहते मेरे जीवन में मैं, किसी दूसरे चाय पार्टनर को भी नही आने दूंगा, बाकी किसी और पार्टनर का तो सवाल ही नही उठता। और एक आख़िरी बात, मुझे ये अफसोस हमेशा रहेगा कि मैं आपका पहला प्यार नहीं हूं, लेकिन आप मेरे पहले प्यार हैं। और मुझे उसी पहले प्यार की कसम, अगर मैंने आपको आपका पहला प्यार, पूरी तरह से ना भूला दिया तो मैं सच्चा कनपुरिया नहीं।"



      रोहित की बात खत्म होते होते, सौम्य की आँखे आँसुओ से तर हो चुकी थीं। रोहित के चेहरे का तेज और उसकी आँखों की चमक को देखकर, ये कहना बिल्कुल भी गलत नही होगा, की रोहित ने अभी जो कुछ भी कहा है, वो सच्चे दिल से और अपने प्यार पर पूर्ण विश्वास के साथ कहा है। सौम्य ने बिना कुछ कहे, आगे आकर रोहित को अपनी बाहों में भर लिया, और उसके होंठों पर अपने प्यार की छाप छोड़, उसे जोर से अपने गले से लगा लिया।



सौम्य :- (अपने आँसुओ को पोंछते हुए) "आपकी बातों से ऐसा लग रहा, की आप अपने घर मे हमारे रिश्ते की आग लगा आये हैं??"


रोहित :- (सौम्य को अपने गले से लगा कर) "नहीं अभी तो बस चिंगारी छोड़ी है, पराग, गोलू मामा और आपकी दीदी, यानी मेरी मामी को बता आया हूँ। अब मम्मी पापा और बाकी सभी को कैसे बताना है, वो लोग संभाल लेंगे। और अगर उनसे नही संभला, तो कुछ टाइम बाद आपको फिर आना पड़ेगा हमारे शहर कानपुर, लेकिन इस बार मेरा सहारा बनकर।"


सौम्य :- (रोहित को मुस्कुराकर किस करते हुए) "I Love KANPUR ❤️"


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Lots of Love

Yuvraj ❤️


 

       







      


 



 














Tuesday, October 13, 2020

मिलन Part -I

Hello friends,

                       I am again here to present my another story "मिलन".... A log time ago I wrote this story with straight characters, but now I change its theme, with different story ending. Hope you like it as you like my previous work.       



      दोस्तों हमारा नाम रोहित है। हम आईआईएम इंदौर के आखिरी वर्ष के विद्यार्थी हैं, और कानपुर के रहने वाले हैं। दिखने में बहुत हैंडसम हैं, ऐसा सभी बोलते हैं। लेकिन स्वभाव से थोड़े शर्मीले हैं, या यूं कहिए कि बड़े छुपे रुस्तम है, बाकी के कामों में। पढ़ाई में हमेशा टॉपर रहे और थोड़ा मम्मी का बेलन हमारे पिछवाड़े में रहता था, तो अब उस सब की बदौलत यहां तक आ गए हैं। हमारी बातचीत का तरीका बड़ा ही साधारण है। एकदम अपने कनपुरिया मिजाज के हैं। और बड़ा प्रेम भी है कानपुर से, तो एकदम शान से कनपुरिया बनकर रहते हैं। हमारे कॉलेज में भी लोग हमें कनपुरिया भाई जी बुलाते हैं। ऐसा नहीं है कि हमें अंग्रेजी बोलना नहीं आता, एकदम लल्लन टॉप अंग्रेजी बोलते हैं। लेकिन जहां मौका हो वहीं, बाकी तो अपना कनपुरिया लहजा ही हमें बड़ा पसंद है। या यूं कहें शान है ।


"भैया जरा जल्दी चलाइए टैक्सी, हमाई ट्रेन नहीं छूटनी चाहिए। इकलौते मामा की शादी है, और हम कतई अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते आज की ट्रेन मिस करना।" रोहित ने जरा चिल्लाते हुए टैक्सी वाले को बोला।


       कल मामा जी की शादी में हमें समय से पहुंचना है। सॉरी इकलौते मामा की शादी में। तो हमाई उत्सुकता आप समझ सकते हैं। पांच बहनों में एकलौते भाई हैं, गोलू मामा!!! जिनकी कल शादी है, कानपुर में। बड़ी ही मन्नतों से उनका जन्म भी हुआ, और अब शादी का रिश्ता भी तय हुआ है। तो सब बहुत खुश हैं। हमाई मम्मी सबसे बड़ी बहन है, और हम सबसे बड़े भांजे हैं, गोलू मामा के। इसलिए बड़े ही करीबी हैं मामा जी के। तो हमाए बिना मामा घोड़ी पर ही नहीं बैठेंगे।  और उतने में ही, मम्मी जी का फोन आ गया।


(रोहित की मम्मी, अलका जी फ़ोन पर) "हां रोहित!!! अरे निकले कि नहीं तुम??? तुम्हारा तो राग ही नहीं समझ आता है हमें। अगर आज पहुंच जाते तो कितना बढ़ियाँ होता, अब कल सुबेरे भी तुम टाइम से पहुंच जाओ, तो हम बाबा आनंदेश्वर का प्रसाद चढ़ाएं।


रोहित :- (झल्लाते हुए बोला) "अरे मम्मी काहे इतना फालतू परेशान हो रही हो। हम जब कह दिए कि हम सुबेरे सुबेरे पहुंच जाएंगे, आप कतई टेंशन ना लो।"


अलका जी :- "वाह बेटा!!! हम अगर टेंशनियाते नहीं, तो आज तुम्हारा एडमिशन वहां नहीं होता। यही कानपुर में ही सड़ रहे होते, कहीं सरकारी डिग्री कॉलेज में। गाड़ी में बैठ जाना, तब हमें एक बार बता देना। गाड़ी पर भरोसा है, तुम पर नहीं है। (अलका जी एकदम तंज भरे शब्दों में बोली)


रोहित :- (गुस्से में) "आप का प्रवचन हो गया हो तो फोन रखिए माता जी!!  सुबह में मिलते हैं आपसे, और हां सुनिए नाश्ते में गरम गरम आलू के पराठे बनवा देना।"


     रोहित की मम्मी ने बिना बात पूरी हुए ही फोन काट दिया। खैर जैसे-तैसे टैक्सी वाले ने ट्रैफिक को मात देकर रोहित को ट्रेन के समय से 7 मिनट पहले स्टेशन पहुंचा दिया। रोहित बड़ी खुशी से टैक्सी वाले को थैंक्स बोल कर उसे ₹100 देकर दौड़ा अपने प्लेटफार्म की ओर। बस सिग्नल होने के 2 मिनट पहले ही रोहित ट्रेन में घुस गया। ट्रेन सीधा उज्जैन से आ रही थी, तो तमाम बाबा बैरागी लोग या फिर तीर्थयात्री ही थे उस थर्ड एसी कोच में। अपनी सीट पर रोहित बाबू जा कर बैठे और चैन की सांस ले ही रहे थे, कि अलका जी को कहां चैन था। फिर फोन आ गया।


अलका जी :- "हां बेटू!!!! ट्रेन मिल गई??"


रोहित :- (थोड़ा मजाक वाले मूड में बोला) "मम्मी आप चिंता ना करो, हमाए इकलौते गोलू मामा कल ही बकरा बनेंगे। काहे से उनके सबसे प्यारे भांजे ट्रेन में बैठ चुके हैं।"


अलका जी :- "तुम बहुत मस्तियाने लगे हो, और थोड़ा हंस लो, अब बस मामा के बाद तुम्हारा नंबर है। सुन रहे हो???"


रोहित :- (थोड़ा चिड़चिड़ाते हुए बोला) "हां मम्मी!!! वैसे यह ख्याल भी बढ़िया है।"


       रोहित ने फ़ट से फोन काट दिया और उधर से अलका जी को लगा कि, हां अब रोहित बाबू शादी के लिए तैयार है। ट्रेन पूरी रफ्तार से दौड़ने लगी थी। रोहित अब आराम से अपनी खिड़की वाली सीट पर बैठकर मोबाइल हाथ में लिए चला रहे थे। बाहर लगभग अंधेरा हो चुका था। थोड़ी ही देर में ट्रेन भोपाल स्टेशन पर रुकी। और कुछ और सवारी रोहित के कोच में भी चढ़ी। रोहित अपने मोबाइल पर व्यस्त थे, तभी एक बड़ी ही तेज तर्रार आवाज उनके कान में गूंजी।


"एक्सक्यूज़ मी"


      रोहित जैसे ही मुड़ा, उसके चेहरे से सारे भाव गायब हो गए। एक टक उसे देखता ही रहा। सांवला सा, मनमोहक सूरत, दुबली पतली कद काठी, सुनहरे बाल, लेकिन आवाज ऐसी कड़क, की ना देखो तो ऐसा लगे, जैसे किसी बड़ी उम्र वाले पुलिस ऑफिसर ने आवाज लगाई हो। रोहित  अभी भी अचंभे में ही था, तब उसने दोबारा कहा।


"हेलो!!!! मैं आपसे ही बोल रहा हूं मिस्टर!!!"


       रोहित एकदम अपनी फॉर्म में वापस आते हुए बोला।


रोहित :- "हां जी बताएं???"


"यह खिड़की वाली सीट मेरी है, तो आप जरा वहां से शिफ्ट हो जाइए।"


      उस लड़के ने एकदम बुलंद और कर्कश आवाज में बोला। रोहित मन ही मन बड़बड़ा रहा था, "भगवान बेचारे के साथ बहुत ही बुरा किए, इतनी भोली सूरत और आवाज से एकदम ही लड़ाकू। लेकिन कुछ भी कहो भैया, है बड़ा भोकाल। देखो कैसे कोच में आते ही हर आदमी का ध्यान अपने पर खींच लीआ। खैर हमें क्या लेना देना।" रोहित सीट पर दूसरे कोने में जाकर दुबक कर बैठ गया। थोड़ी देर में वह लड़का भी अपनी खिड़की वाली सीट पर सेट हो गया, और वह भी अपना मोबाइल हाथ में लेकर कान में हेडफोन लगाकर कुछ सुन रहा था, और साथ में कुछ देख भी रहा था। तब तक उसका फोन बज गया। शायद उसकी मां का फोन था।


"हां मम्मा!!! हम बैठ गए हैं आराम से ट्रेन में। आप बिल्कुल भी चिंता मत करो। हम सुबह कानपुर पहुंच कर आपको फोन करेंगे। बस आप एक बार बुआ जी का एड्रेस मैसेज कर दो, तानिया दीदी को बोलना वह कर देंगी।"


उधर से मां ने शायद बोला होगा बेटा अपना ध्यान रखना। इधर से बेटे ने बोला।


"जी मम्मी!!! आपका सौम्य अब बड़ा हो गया है, इतनी चिंता मत करो।"


    उसकी बातें आसपास बैठे सब लोग सुन रहे थे। रोहित फिर से मन में बड़बड़ाया, "इनको देख लो जरा, परवाह ही नहीं है, आस पास बैठे लोगों की। अब इनका नाम सबको पता है। भैया यह है गजब भौकाल सौम्य साहब।" थोड़ा समय बीता और रोहित को आने लगी नींद। तो सोचा सौम्य जी से कहें, कि सीट खोलें क्या!!!! लेकिन हिम्मत जवाब दे गई। चेहरे पर गुस्सा,  अपनी किताब में मगन और कानों में हेडफोन भी चढ़ाए बैठा था। थोड़ी देर इंतजार के बाद, रोहित भैया वहीं सीट पर बैठे बैठे ही सो गए। जब एक आवाज, चाय गरम चाय!!! कानो में पड़ी, तो रोहित की आंख खुली। देखा गाड़ी किसी स्टेशन पर खड़ी थी। सौम्य भी जाग रहा था। किताब बंद थी और खिड़की के बाहर टुकुर टुकुर निहार रहा था। अब रोहित ने सोचा, की थोड़ी बात की जाए। क्योंकि सौम्य को देखकर लग नहीं रहा था, कि उन्हें कहीं दूर दूर तक नींद आ रही थी। 


रोहित :- (धीरे से कहा) "एक्सक्यूज मी!!!।"



      सौम्य ने रोहित को पलट कर देखा, और उसके चेहरे पर धीरे धीरे गुस्से के भाव वापस आने लगे, उसकी भवैं धीरे धीरे ऊपर चढ़ने लगीं।



 रोहित :- "दरअसल हमें नींद आ रही थी, तो क्या आप.....!!"



       इससे पहले रोहित अपनी बात पूरी कर पाता सौम्य बौखला उठा।


सौम्य :- "नींद आ रही तो सो जाईये, अब क्या मैं आपको लोरी सुनाऊं???"


रोहित :- (मुस्कुरा कर) "अरे नहीं नहीं!!! आपने हमारी पूरी बात नहीं सुनी। हमाई सीट तो यह बीच वाली है, और बिना सुने आप तो हमारी क्लास ही लगा दीए।"


      सौम्य को अपने कहे पर थोड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई, तो उसने सॉरी बोला रोहित को। फिर बोला।


सौम्य :- "जी बस अगले स्टेशन तक बैठ जाईये। हम कुछ खाना ले ले और फिर आप सो सकते हैं।"


       अभी करीब रात के 9:00 बज चुके थे, ज्यादातर लोग सो ही गए थे। बस एक आधे ही जागे बैठे थे। अब हम भी चुपचाप बैठ कर अपना मोबाइल निहारने लगे। तब तक गोलू मामा का फोन आ गया, जी हां वही मामा जिनकी कल शादी है।


रोहित के मामा :- (फ़ोन पर) "हेलो रोहित दे बेटा, तुम यार अभी तक आए नहीं। ऐसे कैसे काम चलेगा। यहां सुबह से सब गड़बड़ मची है। यार मामी तुम्हाई चार बार पूछ चुकी हैं, भांजे साहब कहां हैं??"


रोहित :- "अरे मामा बोलने तो दो यार हमें!!! बस गाड़ी में बैठ चुके हैं और कुछ ही घंटों की दूरी है कानपुर से। भला आप की शादी हमाए बिना हो सकती है क्या??  यार कैसी बात कर दिए आप!!! अच्छा और सुनो जरा वहाँ तैयारी सब है ना??? कुछ कमी बसी हो तो हमें बताओ, हम सब जुगाड़ करते हैं।"


मामा :- "यार तुम्हाई मामी कह रही हैं, कि डांस करो कल साथ में और यार हम आज तक कभी डांस नहीं किए। गुरु बताओ जरा कुछ, तुम ही हो जो कुछ कर सकते हो।"


रोहित :- "आप चिंता ना करो कतई। अब आपके परम संकट मोचन कानपुर पधार रहे हैं। डाँस वांस सब निपटा देंगे।"


      रोहित जोर जोर से हंस रहा था, और सौम्य रोहित को घूर रहा था, और मन में सोच रहा था, कि कितना जोर जोर से बात करता है। दिखने में हैंडसम है, लेकिन जुबान से तो एकदम जाहिल ही है। उधर  रोहित का फोन खत्म हुआ, फोन रखते हुए उसने सौम्य की तरफ देखा, और बोला।


रोहित :- "कल हमाए मामा की शादी है कानपुर में। बस उन्हीं का फोन आया था।"


सौम्य :- (थोड़ा हंसते और सरकास्टिक हंसी के साथ) "जी मैंने सुना सब!!! और आप उनके डांस का जुगाड़ कराने वाले हैं।"


    दोनों जोर से हंसने लगे।


रोहित :- "आपको पता है ना सौम्य जी!!! हर चीज का जुगाड़ होता है कनपुरिया के पास।"


सौम्य :- (हंसते हुए) "तो मामा के डांस का जुगाड़ कैसे कर रहे हैं आप???"


रोहित :- (सर खुजाते हुए) "अब बोले हैं तो कुछ तो करना होगा, वैसे आप बुरा ना माने तो आप कुछ सुझाव दीजिये।"


सौम्य :- (हँसते हुए) "अभी तो सब जुगाड़ था आपके पास, अब कहां गया???" (रोहित का निराश चेहरा देखकर) "अच्छा रुकिए मैं आपको कुछ वीडियो दिखाता हूं। कल हमारी भी बुआ जी की बेटी की शादी है कानपुर में। दीदी ने यह डांस तैयार किया है, तो इसमें जो लड़के के स्टेप्स हैं, हो सकता है आपके कुछ काम आए।"


      दोनों सौम्य के मोबाइल पर वीडियो देखने लगे। गाना बज रहा था।


कहते हैं खुदा ने इस जहां में सभी के लिए 

किसी ना किसी को है बनाया हर किसी के लिए 

तेरा मिलना है उस रब का इशारा मानो 

मुझको बनाया तेरे जैसे ही किसी के लिए 

कुछ तो है तुझसे राबता 

कैसे हम जाने हमें क्या पता 

कुछ तो है तुझसे राबता 


      गाना सुनते सुनते हमारे रोहित बाबू भी एकदम यही सोच रहे थे, कि शायद सौम्य का आज यू मिलना भी कोई इत्तेफाक ही नहीं बल्कि ऊपर वाले का इशारा है। उधर सौम्य पूरी तरह से डांस के स्टेप्स का मजा ले रहा था। दोनों ने शांत होकर डांस देखा। रोहित के मन में कुछ अलग ही डांस चल रहा था। खामोशी तोड़ते हुए सौम्य ने कहा।


सौम्य :- "कैसा लगा??? ज्यादा मुश्किल भी नहीं है!!! आपके मामा भी कर सकते हैं।" (रोहित को थोड़ा सा धक्का देते हुए) "कहाँ खो गए आप?? कहीं वहां खुद को तो इमेजिन नहीं कर रहे थे??"


      जोर से हंसते हुए सौम्य इतना अच्छा लग रहा था, कि रोहित से रहा नहीं गया और उसने बड़ी हिम्मत करके कहा।


रोहित :- "सौम्य आप बहुत सुंदर दिखते हैं। आप जब खिलखिला कर हंसते हैं, एकदम कल कल करते झरने की तरह लगते हैं। आपको देख कर पहली नजर में नहीं लगा था कि आप इतना हंसते भी होंगे।"


      रोहित की बात सुनकर सौम्य एकदम शांत हो गया और कुछ देर के लिए खिड़की के बाहर देखने लगा। रोहित को समझ नहीं आया क्या करें??? ऐसा क्या बोल दिया कि सौम्य इतना शांत हो गया। तभी गाड़ी एक स्टेशन पर जाकर रुक गई। रात के करीब 10:30 बज चुके थे। जल्दी से रोहित बाहर गया और दो डब्बे खाने के और एक चाय वाले को साथ लेकर आया। उसने सौम्य की ओर इशारा करते हुए चाय वाले से कहा।


रोहित :- "भैया जरा एक कड़क चाय सर जी को दीजिए तो।"


सौम्य :- "शुक्रिया रोहित जी लेकिन मैं चाय नहीं पीता।"


     रोहित ने चाय वाले से दो कुल्लड़ में चाय ली और चाय वाले को जाने दिया। ट्रेन चल दी थी। सौम्य की नजर चाय के कुल्लड़ पर पड़ी तो रोहित से बोला।


सौम्य :- "दो चाय क्यों???? मैंने तो मना किया था!!"


रोहित :- (बड़ी मासूमियत से) "एक हमाई और एक उनकी!!


      रोहित के चेहरे पर थोड़ी शर्मीली सी मुस्कान थी, सौम्य थोड़ा आश्चर्य भरे भाव से पूछता है।


सौम्य :- "उनकी किसकी??? यहां तो मेरे अलावा और कोई नहीं!! और मैंने तो मना किया था!"


रोहित :- (मुस्कुराते हुए) "यह हमारे काल्पनिक चाय पार्टनर के लिए है, जो है नहीं लेकिन हम चाय अकेले नहीं पीते, तो जब कोई चाय पर साथ नहीं देता, तो हम दूसरा कप सामने रख लेते हैं, उन्हीं से बतिया भी लेते हैं, और दोनों चाय हम खुद ही पी लेते हैं।"


       सौम्य को रोहित की मासूमियत पर हंसी भी आ रही थी और थोड़ा प्यार भी।


सौम्य :- "बड़े जज्बाती  हैं आप रोहित जी।"


रोहित :- (सौम्य की ओर आस भारी निगाहों से देखते हुए) "सौम्य आज भर के लिए हमारे चाय पार्टनर बन जाइए ना। हमें बहुत अच्छा लगेगा।"


सौम्य :- (चाय के कप की ओर हाँथ बढ़ाते हुए) "वैसे मुझे चाय से परहेज नहीं है। बस किन्ही कारणों से चाय पीना बंद कर दिया।"


रोहित :- (हँस कर) "सौम्य आप बुरा ना माने तो एक बात कहें, जैसा आप खुद को दिखाते हैं, वैसे है नहीं।"


सौम्या :- (चाय की चुस्की को बीच मे ही रोकते हुए, कई प्रश्नचिन्ह अपने चेहरे पर लिए) "क्या मतलब??? मैं बनावटी लग रहा हूँ आपको???" 


रोहित :- (मुस्कुरा कर) "देखो आपको चाय कितनी ज्यादा पसंद आई, आपने जैसे ही घूंट को अंदर लिया, तो वह सुकून हमने देखा। और अब आप फिर वापस अपने दिखावटी रूप में आ गए। बुरा मत मानियेगा, हमारा इरादा आपकी जासूसी करने नही था, लेकिन आपकी चोरी पकड़ी गई।"


     सौम्य एकदम निशब्द था, और फिर दोनों ने चाय की चुस्कियां लेते हुए माहौल को थोड़ा बदला। और फिर रोहित पूछने लगा सौम्य के बारे में, सौम्य को और जानने की कोशिश करता है। तो सौम्य बताने लगा, कि वह नागपुर से है, एक सरकारी बैंक में नौकरी करता है। और अभी कुछ दिन पहले ही तबादला हुआ है, यहां भोपाल में। यहां बतौर ब्रांच ऑपरेशन मैनेजर काम कर रहा है। रोहित भी उसे अपने बारे में बताता है, कि वह आई आई एम का अंतिम वर्ष का विद्यार्थि है। अभी कुछ बाहर की यूनिवर्सिटी में एग्जाम दिया है, यदि सेलेक्ट हो गया तो देखेगा। चाय खत्म होते ही सौम्य ने रोहित को थैंक्स बोला।


सौम्य :- रोहित जी दिल से शुक्रिया!!! बड़े दिनों बाद इतनी अच्छी चाय पीने को मिली। और एक अच्छा चाय पार्टनर भी।"


रोहित :- (मुस्कुरा कर) "सौम्य जी हमें भी एकदम परफेक्ट लाइफ पार्टनर सारी सॉरी हमारा मतलब है चाय पार्टनर मिला आज, तो आपका भी शुक्रिया।"


          दोनों ने साथ में खाना खाया और फिर सौम्य ने रोहित से खाने के पैसे पूछे। तो रोहित ने कहा।


रोहित :- "अरे सौम्य जी रहने दीजिएगा। हमें अच्छा नहीं लगेगा अगर आप पैसे देंगे तो।"


सौम्य :- "अच्छा तो मुझे भी नहीं लगेगा अगर आपने पैसे नहीं लिए तो।"


रोहित :- "अगर आप हमसे दोस्ती करें, और अगर आपको मंजूर है, तो फिर 1 दिन कानपुर में मिलकर हमें चाय पिला दीजिएगा।"


सौम्य :- (कुछ सेकेंड शांत रहकर) "चलो मुझ पर उधार रही चाय।"


रोहित :- "यह हुई ना दोस्तों वाली बात।"


        रात के 11:30 बज चुके थे, दोनों की आंखों में नींद नहीं थी। एक बाबा सामने वाली सीट से उठे और उन्हें बाथरूम जाना था, लेकिन पांव में दर्द के कारण ज्यादा चल नहीं पा रहे थे। रोहित ने उनकी मदद की।


रोहित :-  "अरे बाबा अब ऐसी उम्र में काहे अकेले यात्रा करते हो?? किसी को संग में रखा करो।"


        फिर रोहित उन्हें बाथरूम ले जाकर वापस आया। सौम्य रोहित को देखकर बहुत खुश था, उसका इतना हेल्पिंग नेचर उसे बहुत अच्छा लगा। सौम्य ने रोहित को पूछा यदि वह सोना चाहे तो सो सकता है, रोहित ने ना में सर हिला दिया। और फिर सौम्य को भी नींद नहीं आ रही थी। खिड़की से बाहर देखते हुए, कहीं तो किसी पुराने ख्यालों में खोया था। उधर हमारा रोहित सौम्य के ख्यालों में खोया था। कब दोनों की आंख लग गई पता ही नहीं चला।




     आगे का सफर दोनों को कहाँ तक ले जाता है, और क्या कानपुर में दोनों फिर से चाय पर मिल पाते हैं या नहीं। रोहित अपने मन की बातें सौम्य को बता पायेगा या नहीं, और सौम्य का क्या रिएक्शन होगा। ये सभी बातें जानने के लिए बने रहिये रोहित ओर सौम्य के साथ। और अब हम लोग मिलते हैं, कानपुर में।







Thursday, October 8, 2020

वो सफ़र... - लघुकथा

 Hello friends,

                          I am again here to present  a very short story. It's just a thought which came into my mind while I'll traveling. So now I present that thought in the form of a short story. Hope you like it.



       बाहर हो रही चहल कदमी और आवाज़ों से जब मेरी आंख खुली, मैंने बाहर देखा, तो ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी हुई थी। मैंने जब खिड़की से झांककर देखा, तो वह आगरा स्टेशन था। मैंने पास रखी पानी की बोतल को उठाया, तो उसमें पानी खत्म हो चुका था। पानी लेने जाने के लिए जब मैं अपनी सीट से उठने लगा, तो एक आवाज मेरे कानों में सुनाई दी।


"ट्रैन बस चलने ही वाली है!!!!!"


मैंने पलट कर देखा, तो मुझसे उम्र में कुछ ही बड़ा एक लड़का, हाँथो में मोबाइल लिए, मेरे सामने वाली सीट से, मेरी ओर ही देख रहा था। चेहरा तो कुछ जाना पहचाना सा लग रहा था, और बोलने के लहजे से भी झांसी का ही लग रहा था।


"हाँ!!! मैं जल्दी से पानी लेकर आ जाऊंगा। आप please मेरा bag देखते रहिएगा।"


      मैं ट्रेन से उतरा और नल की खोज में थोड़ा आगे की ओर चला गया। नल पर ज्यादा भीड़ तो नहीं थी, लेकिन कुछ लोग हाथ मुंह धो रहे थे, और कुछ अपनी बोतल लेकर पानी भरने का इंतजार कर रहे थे। मैंने भी नल के खाली होने का इंतजार किया, और नल खाली होते ही, जैसे ही अपनी बोतल को नल के नीचे लगाया। ट्रेन ने स्टेशन छोड़ने का सिग्नल दिया। लेकिन पता नही क्यों, मेरा वापस से ट्रेन की ओर जाने का मन ही नही किआ। मैंने बड़े आराम से अपनी पानी की बोतल को भरा, और उधर ट्रैन ने धीरे धीरे स्टेशन को छोड़ते हुए, अपनी रफ्तार बढ़ानी शुरू कर दी। और मैं अपने हाँथो में पानी की बोतल लिए, वहाँ खड़ा, ट्रैन को जाते देखता रहा। कुछ देर वहीं खड़े रहने के बाद, मैंने अपना मुँह धोया, और वहीं पास पड़ी बैंच पर आकर बैठ गया। ट्रैन के जाते ही स्टेशन पर थोड़ी शान्ति सी हो गयी थी। रात के 3 बजे, और प्लेटफार्म नंबर 3 होने के कारण, वहाँ कुछ 2 3 लोग ही मौजूद थे, और वो लोग भी नवंबर की हल्की सर्दी में चादर ओढ़े सो रहे थे। मैं भी बैंच से टिक कर, अपनी आँखें बंद कर के सोच ही रहा था, की अब क्या करना चाहिए, की तभी वही आवाज़ फिर से मेरे कानों में पड़ी।


"इससे अच्छा तो ट्रैन में ही सो जाते!!!"


     मैंने आँखे खोली, तो वही ट्रैन वाला लड़का मेरा bag हाथोँ में लिए, मेरे सामने खड़ा था।


"Sorry आपको मेरी वजह से ये तकलीफ उठानी पड़ी। लेकिन आपको ऐसा करने की कोई जरूरत नही थी।"


"अरे!!!! अब तुमने कहा था कि bag को देखना!!! तो ये bag को कब तक देखता रहता??? ट्रेन से बाहर तुम्हे देखा, तो तुम बुत बने खड़े थे, तुम ट्रैन में नही चढ़े तो मैं तुम्हारा bag लेकर नीचे उतर गया।"


"Thanq so much!!! लेकिन सच में, इस bag के लिए ऐसा करने की कोई भी जरूरत नही थी। इसमे मेरे कुछ कपड़ों के अलावा कुछ भी नही है। और इसकी वजह से आपकी ट्रैन भी छूट गयी।"


(उसी बैंच पर बैठते हुए अपने माथे पर हाँथ पीटते हुए) "वैसे मैं ये कहता हुआ थोड़ा पागल लगूंगा तुम्हे, लेकिन मैं ट्रैन से उतरने से अच्छा, chain pulling कर के ट्रैन रोक भी तो सकता था।"



      उसके ऐसा कहते ही, हम दोनों ही ठहाके लगा कर हँसने लगे। और हँसते हँसते ही मेरी आँखों मे आँसू आ गए, और मेरे होंठों पर बर्फ सी जम गई। और मेरी उदासी भरी शक्ल को देख कर उसने कहा।


"क्या हुआ??? मेरा यहाँ बैठना अच्छा नही लगा?? या फिर ये बैग??? कहो तो मैं और ये बैग, दोनों यहाँ से चले जायें???"


      

        मैंने मुस्कुराते हुए उसकी बातों का जवाब दिया।


"नहीं ऐसा कुछ भी नहीं!! बस मुझे मेरे पापा की याद आ गयी। आखिरी बार उनके साथ ही ऐसे खुलके हँसा था।"


"Hmmmmm और तुम्हे हँसते ही रहना चाहिए, तुम्हारे चेहरे पर हँसी ही अच्छी लगती है, ये उदासी नहीं। और तुम्हारे पापा भी यही चाहेंगे, की तुम हमेशा हँसते रहो।"


"हाँ!!! लेकिन ये कहने के लिए अब वो इस दुनिया में ही नही है।"



    वैसे तो मैं इतनी जल्दी किसी से नही घुलता मिलता हूँ, लेकिन उस अजनबी में पता नही वो कोनसा अपनापन था, जो मैं उससे अपने मन की, अपने हाल की सारी बातें बिना हिचकिचाए कर सकता था। मुझे बचपन से ही अकेले रहने की आदत भी थी, मुझे किसी का भी साथ इतनी जल्दी नही भाता था, लेकिन फिर भी, उस अजनबी से कुछ पलों की ही मुलाकात में, मुझे अपने अब तक के 18 साल के जीवन के हर लम्हों से उसे अवगत कराने में भी कोई झिझक नही थी। अब यूं तो ऐसा कुछ खास नही था मेरा जीवन, जिसके बारे में कोई किस्सा किसी को सुना सकूँ। मैं कक्षा 6 से ही, देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई के लिए चला गया था, और अभी भी वहीं के एक कॉलेज में फर्स्ट ईयर में एडमिशन लिया था। पापा की तबियत खराब रहने की वजह से, पिछले 10 दिनों से झाँसी में ही था। परिवार के नाम पर मेरे पास सिर्फ मेरे पापा ही थे। वही मेरा सारा परिवार थे। मेरी मां मुझे जन्म देते वक्त ही इस दुनिया को अलविदा कह गई थी। और मेरे पापा ने ही मुझे पाल पोस कर इस लायक बनाया था, कि मैं आज उनके बिना भी, इस दुनिया में अकेले रहने की कोशिश कर पा रहा था। कहने को तो दिल्ली में मेरा ननिहाल भी था, लेकिन मेरी माँ के द्वारा, एक अनाथ लड़के के संग प्रेम विवाह करने की वजह से, उन लोगो ने मेरे माँ पापा से इन 21 सालों में कोई संबंध नही रखा था। मेरे माँ पापा ने, माँ के घरवालों के विरुद्ध जा कर, घर से भागकर, दिल्ली से दूर, यहाँ झांसी में अपनी एक छोटी सी दुनियाँ बसा ली थी। उनकी शादी के 3 सालों के बाद मेरा जन्म हुआ, और मैंने इस दुनियाँ में आते ही, अपने पापा का इकलौता परिवार, उनका प्यार ही उनसे छीन लिया। लेकिन सभी परेशानियों के बाद भी, मेरे पापा ने मुझे बड़े ही लाड़, प्यार से, पाला पोसा। मेरे अच्छे भविष्य की कामना में, उन्होंने मुझे खुद से दूर भेजने में भी, जरा सी भी झिझक नही दिखाई, और मुझे खुद से दूर भी भेज दिया था। रोज टेलीफोन पर बात हो जाया करती थी, स्कूल की छुट्टियों में मैं झांसी आ जाया करता था। या साल के बीच में कभी पापा मुझसे मिलने देहरादून आ जाया करते थे। यह सफर कुछ साल ऐसा ही चलता रहा था। लेकिन जब कुछ दिनों पहले पापा का मेरे पास फोन आया, और उन्होंने मुझे अपने पास आने को कहा। तो मुझे नहीं पता था, कि यह उनका आखिरी फोन होगा, और यह कुछ दिन मेरे पापा के साथ बिताए आखिरी दिनों में से एक हो जाएंगे।


      मैं अपनी सोच में कुछ यूं डूब गया था, जैसे मानो मैं भूल ही गया था, कि मैं आगरा रेल्वे स्टेशन के, प्लेटफार्म नंबर 3 पर पड़ी उस बैंच पर, किसी अजनबी के साथ बैठा हूँ। मेरी आँखों के सामने, पापा के साथ बिताए प्यारे लम्हों का सफर, किसी तेज रफ्तार से दौड़ती ट्रैन की तरह गुजर रहा था। मेरी पलकें फिर उसी आवाज के साथ झपकी।


"कहाँ जा रहे थे तुम??? वैसे मैंने अपना नाम नही बताया, मैं मानव हूँ।"


"मानव!!!!! मैं विनय।"


मानव :- "hmmmmm.... मानव याने इंसान का बच्चा!!!! पुजारी बाबा ने मेरा नाम मानव ही रख दिया, जब मैं उन्हें मंदिर की सीढ़ियों पर मिला।"


विनय :- (मुस्कुरा कर) "आप भी अनाथ, और मैं भी!!!"


मानव :- "जिसका कोई नही होता उसका भगवान होता है। या वो किसी ना किसी को आपके लिए भेज ही देता है। जैसे मुझे भेज दिया, ये bag लेकर, तुम्हारे पास!!!"


विनय :- (हँसते हुए) "आप बातें बड़ी अच्छी बना लेते हो।"


मानव :- "hmmmmm मार्केटिंग जॉब में हूँ, बातें बनाने के ही पैसे मिलते हैं। वैसे बताया नही तुमने??? कहाँ जा रहे थे??"


विनय :- "दिल्ली!!!! लेकिन जाऊं या नहीं, समझ नही पा रहा।"


मानव :- "मतलब???"


विनय :- "दरअसल मेरे पापा की यही आखिरी इक्छा थी!!! कि अगर उन्हें कुछ हो जाता है, तो मैं दिल्ली अपने ननिहाल चला जाऊं।"


मानव :- "तो फिर??? अपने ननिहाल जाने के लिए इतना क्या सोचना???"


विनय :- "इतना आसान नही है सबकुछ!!!"


मानव :- "मैं भी दिल्ली ही जा रहा हूँ। मेरे साथ चलो, मैं छोड़ दूंगा तुम्हें वहाँ!"


विनय :- "नहीं!!! नहीं!!!! वैसे ही मेरी वजह से आपको बहुत परेशानी हुई है, अब और ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है।"


मानव :- "मैंने कहा ना, शायद भगवान ने ही मुझे तुम्हारे लिए यहाँ भेजा हो। चलो!!! Main station पर चल कर पता करते हैं, अगली ट्रैन कब है!!!"



       मैं उसकी कोई मदद लेना तो नहीं चाहता था, लेकिन उसके व्यवहार से, उसकी बातों से मुझे अपनेपन का वो एहसास हो रहा था, जो मैंने अपने पापा के अलावा किसी और से कभी महसूस ही नही किआ था। और उसी भाव के प्रति विवष होकर, मैं भी बिना कुछ बोले, चुप चाप उसके पीछे पीछे चलता हुआ, अगरा के 1 नंबर प्लेटफार्म से बाहर निकर कर, पूछताछ खिड़की पर जा पहुंचा। वहाँ जा कर पता चला कि कुछ ही देर में एक ट्रेन आएगी, जो नई दिल्ली की ओर जाएगी। पर मुझे तो दिल्ली सराय रोहिल्ला स्टेशन पर जाना था, और दिल्ली शहर मेरे लिए बिल्कुल अनजान था। इससे पहले, मैंने झांसी और देहरादून के अलावा कोई और शहर देखा तक नही था, यहां तक कि, इन दोनों शहरों से भी मैं अभी तक लगभग अनजान ही था। तो दिल्ली जैसे महानगर में जाकर, उस घर का पता खोजना, जहाँ शायद मेरा इंतज़ार भी नही हो रहा हो, मेरे लिए बहुत ही मुश्किल होने वाला था। इसके बारे में सोचकर ही, मेरे चेहरे पर आई शिकन को भांपते हुए, मानव ने कहा।



मानव :- "ऐसा करते हैं, पीछे आने वाली ट्रेन से ही निकल चलते है। नही तो सुबह तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। मैं नई दिल्ली से तुम्हे तुम्हारे ननिहाल भी छोड़ दूंगा, उसकी चिंता मत करना तुम।"



      मानव के कहे शब्दों का असली भाव, मैं अच्छे से समझ सकता था। एक अनाथ के लिए इतना कह भर देना ही, बहुत मददगार होता है, की "मैं हूं तुम्हारे साथ"!!!!! लेकिन मानव भी तो इस परेशानी में मेरी वजह से ही फसा था। अब उसकी और मदद लेने के बारे में सोचने से ही, मुझे उसके लिए बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था।


विनय :- "नहीं मानव!!! मेरी वजह से ही तो आपको इतनी परेशानी हुई है, अब और परेशानी उठाओगे, तो मुझे बिल्कुल अच्छा नही लगेगा। हम चलते हैं नई दिल्ली, मैं चला जाऊंगा वहां से।"



       हम दोनों अगली ट्रैन से दिल्ली के लिए निकल गए। सुबह के 4 बज गए थे। ट्रैन के अंदर सभी लोग सो रहे थे, और कुछ लोग मथुरा आने का इंतेज़ार कर रहे थे। हम लोगों को बड़ी मुश्किल से, बैठने को जगह मिल तो गयी थी, लेकिन उतनी सी जगह में, एक ही व्यक्ति अच्छे से बैठ सकता था। मानव ने मुझे वहां बिठाया और खुद मेरे पास ही खड़ा हो गया। मैं मानव जैसे व्यक्ति को देख कर बहुत स्तब्ध था। आज के ज़माने में जहां सब पहले अपने बारे में सोचते है, और अपनी सुख सुविधाओं को प्राथमिकता देते हैं। उस समय मे, मैं जबसे मानव से मिला था, तबसे ही वो, मेरे लिए हर वो प्रयत्न कर रहा था, जैसे, मैं उसका कोई अपना ही हूँ। कुछ ही देर में, मैंने वहां थोड़ी सी जगह और बनाई, और मानव को भी साथ बैठने का इशारा किया। लेकिन उसने ना में सर हिलाया, और अपनी ही जगह पर खड़ा रहा। लेकिन मैंने उसका हाँथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा, और उसे अपने पास ही बैठा लिया। मानव भी मेरी ओर देखकर मुस्कुराया और ठीक से व्यवस्थित होकर बैठ गया। कुछ देर में मथुरा स्टेशन भी आ गया, और हमे थोड़ा अच्छे से बैठने की जगह भी मिल गयी। रात भर जागने की वजह से हम दोनों को ही पलकें नींद से भरी होने लगी थी। और ही कुछ ही देर में, मानव नींद में झोंके लेने लगा और उसका सर इधर उधर गिरने लगा। मैंने मानव का सर सम्भालते हुए अपने कंधे पर रखा, और मानव मेरे कंधे के सहारे, गहरी झपकी लेने लगा। उस वक़्त पहली बार, मैंने मानव के चेहरे को इतने गौर से देखा था। वो सोते हुए बहुत ही मासूम लग रहा था। ट्रैन की खिड़की से आते हवा के झोंको में, उसके माथे पर थपकियाँ देते उसके बाल, उसकी आँखों पर चादर सी बिछी घनी पलकें, और उन पलकों पर पहरा देती, उसकी काली घनी भावैं। उसके चेहरे पर, उसकी वयस्कता की पहचान देती हल्की हल्की दाड़ी मूंछे, और उनमे घिरे, गुलाब सी पंखुड़ियों से उसके होंठ। और उसके चेहरे की शोभा बढ़ाती उसकी वो नुकीली नाक। उसके चेहरे को निहारते हुए, मैं एक पल को तो भूल ही गया था, की मैं कहाँ हूँ, और कहाँ जा रहा हूँ। लेकिन इस शारीरक सुंदरता से कहीं ज्यादा मोहक था, मानव का व्यक्तित्व, उसके सहयोग करने का व्यवहार। मानव का आंकलन करने मे कब समय बिता, मुझे पता ही नही चला, और मानो पलक झपकते ही नई दिल्ली रेलवे स्टेशन भी आ गया। मैने मानव को उठाया, और हम दोनों स्टेशन से बाहर आ कर, टमटम में बैठ, दिल्ली सराय रोहिल्ला के लिए निकल गए। 



      कुछ ही देर में हम पापा द्वारा बताए गए पते पर पहुँच गए थे। लेकिन उस घर के दरवाजे को खटखटाने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी। मानव के बहुत समझाने के बाद मैंने उस घर की डोर बेल बजाई, और कुछ ही देर में लगभग मेरे पापा की उम्र का ही एक व्यक्ति दरवाजे के उस पार खड़ा हुआ था।


"जी कहिये!!!"


विनय :- (हिचकिचाते हुए) "जी मैं विनय!! मीरा और रकेश का बेटा!!!"


"कौन???"


विनय :- "मीरा शुक्ला और राकेश कुमार....!!!"


     मेरे द्वारा लिए गए नामों को सुनकर, सामने खड़ा वह इंसान कुछ देर तो चुपचाप मुझे टकटकी लगाए देखता रहा। और फिर उसने मुझसे कहा।


"तुम किसी गलत पते पर आ गए हो, यहाँ इन नामों को कोई नही जानता।"


     इतना कहकर, वो दरवाजा बंद ही करने वाले थे, की मानव ने दरवाजे को पकड़ते हुए, उनसे कहा।


मानव :- "कम से कम एक बार उसकी पूरी बात तो सुन लीजिए।"


"उन गिरे हुए लोगों के नाम सुनकर ही मैं ये दरवाजा बंद कर रहा हूँ।"


विनय :- "आपको नही मुझसे बात करनी है तो मत कीजिये, लेकिन मेरे माँ पापा के लिए बुरा बोलने की कोई जरूरत नही है।"


"बुरा???? जो मीरा ने हम लोगों के साथ किआ है, उसके हिसाब से तो मैंने अभी तक कुछ कहना शुरू भी नही किआ है। तुम्हे यहाँ भेज कर अगर वो लोग ये सोच रहे हैं, की हम लोग उन्हें माफ कर देंगे तो जाकर कह देना उन दोनों से, ये दरवाजे वो खुद हमेशा के लिए, खुद के लिए, बन्द करके गयी थी, और ये हमेशा उसके लिए बंद ही रहेंगे।"


विनय :- "वो दोनों ही अब इस दुनिया मे नही हैं। माँ तो मेरे जन्म के वक़्त ही हमे अलविदा कह गईं थीं, और पापा ने भी कुछ दिनों पहले हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं।"


"हमारे लिए तो वो उस दिन ही मर गयी थी, जिस दिन उसने हमारी खुशियों में आग लगा कर, तुम्हारे बाप की दुनिया सजाने के फैसला लिया था। अब हमें ना उनसे कोई मतलब है, और ना ही तुमसे।"



     इन जली कटी बातों के साथ ही, उन्होंने दरवाज़ा बन्द कर लिया। पारिवारिक सहारे के नाम पर, वो घर ही मेरा आखिरी सहारा था। पापा ने सिर्फ इस उम्मीद से मुझे यहाँ आने को कहा था, की शायद ये लोग इतने सालों की नाराज़गी भुला कर, मुझे अपना लेंगे, और मेरे अकेलेपन को बाँट लेंगे। आर्थिक दृष्टि से ना सही, लेकिन मानसिक तौर पर, इस कच्ची उम्र में, मुझे सहारे की अत्यंत आवश्यकता थी। उसी को भांपते हुए, पापा ने मुझे यहाँ दिल्ली आने को भी कहा था। लेकिन शायद नियति को मेरा अकेला ही इस दुनिया मे जीना कुबूल था। आँखों मे आँसू, और चेहरे पर उदासी लिए मैं वहाँ से चलने लगा। कहाँ जाना है, क्या करना है, इस बात का तो कोई इल्म ही था, लेकिन उस बन्द दरवाजे के सामने नही खड़ा रहना चाहता था। इन सब में, मैं एक बार फ़िर मानव के बारे में भूल चुका था। और उसने फिर मेरा हाँथ पकड़ कर, खुद की मौजूदगी का एहसास करवाया।



मानव :- "कहाँ जा रहे हो अब???"


विनय :- "नहीं पता, शायद वापस अपने घर झाँसी चला जाऊं।"


मानव :- "चलो मैं साथ चलता हूँ।"


विनय :- "नहीं मानव!!!! आपका और मेरा साथ बस यहीं तक का था। मेरा इतना साथ देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। अब आगे का सफर मुझे अकेले ही तय करना है।"


मानव :- "मैं तुम्हे कुछ बताना, चाहता हूँ। मैं ये सब पहले ही बता देना चाहता था, लेकिन नही समझ पा रहा था कि तुमसे ये बात कैसे करूँ। मुझे पाला पोसा जरूर पुजारी बाबा ने है, लेकिन जीवन जीने के लायक तुम्हारे पिता, राकेश चाचा ने ही बनाया है। वे ही पुजारी बाबा को मेरी पढ़ाई लिखाई के लिए पैसे दिया करते थे। और वे तो मुझे भी देहरादून भेजना चाहते थे, तुम्हारे साथ, लेकिन पुजारी बाबा ने मुझे नही जाने दिया। राकेश चाचा मेरे लिए भगवान स्वरूप थे। शायद वे खुद अनाथ थे, इसलिए मेरे जीवन की कठिनाइयों को अच्छे से समझते थे, और हर पल मेरा साथ देते थे। सिर्फ उन्हीं की वजह से मैं आज अच्छे से अपना जीवन यापन कर पा रहा हूँ। नहीं तो पता नही कहां ,क्या, संघर्ष कर रहा होता।"


विनय :- (आश्चर्य से) "तो ये सब बातें आपने मुझे पहले क्यों नही बताई???"


मानव :- "क्या बताता?? जिस देवता ने मेरी ज़िंदगी सँवारी, उसके अंतिम समय मे मैं वहां नही था, और जब तुम अकेले हो, तब मैं तुम्हारा साथ देने के लिए आ गया हूँ!!! लोग और शायद तुम भी, मेरी नियत पर शक करने लगते!!!"


विनय :- "आप साफ और नेक दिल इंसान हो मानव!!! आपको ऐसा सोचने की कोई जरूरत नही है।"


मानव :- "मैं अपनी नौकरी के काम से बंगलोर गया हुआ था, और पुजारी बाबा ने भी राकेश चाचा की खबर मुझे नही दी, की कही मैं नौकरी छोड़ कर ही ना भाग आऊं। वो तो जब मैं अपने एक दोस्त से फ़ोन पर बात कर रहा था, तब उसने मुझे बताया कि, राकेश चाचा का कुछ दिनों पहले स्वर्गवास हो गया। ये सुनते ही मैं फ़ौरन वह से झांसी के लिए निकल दिया। और जब मैं झांसी स्टेशन पर उतरा, तो मैंने तुम्हें वहां देखा। और फिर तुम्हे देखकर मुझे तुम्हे अकेले जाने देने का मन ही नही हुआ, तो मैं तुम्हारे साथ ही चल दिया।"



     मानव की आंखों की नमी और उसके चेहरे के भाव, उसके द्वारा कहे गए एक-एक शब्द की सत्यता का प्रमाण स्वयं दे रहे थे। मैंने उसके द्वारा कही गई सभी बातों को स्वीकार कर, उसे अपने गले से लगा लिया।



मानव :- "मैं सच मे ये सब बात तुमसे छुपना नही चाहता था, लेकिन जब ट्रेन में तुमने मुझे पहचाना ही नहीं, तो मुझे समझ ही नही आया कि मैं ये सब कैसे बताऊ तुम्हे!!!"


विनय :- (मानव को गले से लगाये हुए ही) "कैसे पहचानता??? मैन आपको कभी देखा ही नहीं!!!"


मानव :- "तुम्हें याद नही है, हम बचपन मे साथ खेला करते थे। वो तो जबसे तुम देहरादून गए हो, तबसे ही नही मिले हम। और जब तुम गर्मियों की छुट्टियों में झांसी आते थे, तो पुजारी बाबा मुझे गर्मियों की छुट्टियों में मथुरा भेज दिया करते थे। पंडिताई सीखने के लिए।"


विनय :- (मानव से दूर हटकर, विनय को मुस्कुरा कर देखते हुए) "अच्छा तो आप पार्ट टाइम पंडित भी हो!!!"


मानव :- (मुस्कुराकर) "हाँ थोड़ा बहुत!!! (विनय का हाँथ पकड़ते हुए) "विनय मैं एक बात तुम्हे सच्चे दिल से कहना चाहता हूं, तुम्हे कभी भी खुद को अकेला समझने की कोई जरूरत नही है। मैं साये की तरह हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा। हाँ, मैं राकेश चाचा की कमी कभी दूर नही कर सकता, और ना ही मैं कभी उनकी जगह लेने की कोशिश करूंगा, लेकिन मैं अपने साथ से, अपनी एक अलग जगह तुम्हारे जीवन मे जरूर बनाये रखूंगा, और हमेशा तुम्हारा साथ निभाउंगा। और मैं ऐसा, राकेश चाचा के एहसानों के दबाव में नही कह रहा हूँ, और ना ही मैं राकेश चाचा के साथ को एहसान मानता हूं। मैं तुम्हारा साथ सिर्फ इसलिए दूंगा, क्योंकि बचपन से ही मेरे दिल मे तुम्हारे लिए एक खास जगह है, और उस जगह में, तुम्हारे देहरादून जाने के बाद भी सिर्फ इजाफा ही हुआ है।"



     इस वक़्त मैं मानव की आँखों मे एक अटूट विश्वास की चमक को साफ साफ देख सकता था। मानव के चेहरे का वो तेज, अग्नि को साक्षी मान कर ली जा रही शपथ के सापेक्ष ही था। और मैं वहाँ खड़ा खड़ा, मानव की आँखों की गहराईयों में डूबता ही जा रहा था। मेरे इस सम्मोहन को मानव की आवाज ने ही भंग किआ।


मानव :- "चले घर!!!! अभी वो सफ़र भी बाक़ी है।"



      ये है मेरे वो सफ़र की कहानी, जिसकी शुरुआत तो परिवार की तलाश में हुई थी, लेकिन अंत एक हमसफ़र के मिलने के साथ ही हुआ। एक ऐसा हमसफ़र जो कि सफ़र में, मेरी छोटी से छोटी सुख सुविधाओं का ख़्याल, खुद से भी ज्यादा रखता था। आगे इस हमसफ़र का मेरे जीवन मे कितना और क्या सहयोग रहता है, फिर कभी किसी कहानी के जरिये जरूर आपसे सांझा करूँगा।

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Lots of Love 

Yuvraaj ❤️




















    

Wednesday, September 23, 2020

"दर्द-ए-दिल" Final Part

 Hello friends,

                  This the last part of this story, if u didn't read it's previous parts, than please read those first, than you will easily be connected with this final part.



      पहले तो अंश एकदम शांत बैठा रहा। उन लोगों की सारी बातें चुपचाप सुनता रहा। लड़की वालों के यहां से आए लोगों के सभी सवालों का जवाब भी देता रहा। लेकिन उन लोगों के घर से जाते ही, उसने बहुत ही गुस्से में अपने मम्मी पापा को शादी ना करने का अपना निर्णय सुनाया और वहां से बिना किसी की कोई बात सुने अपने कमरे में जाकर दरवाजा भीतर से बंद कर लिया। कुछ देर बाद जब अंश की मम्मी उसके लिए खाना लेकर आईं, और उन्होंने दरवाजा खटखटाया, तो अभी भी अंश ने गुस्से में उन्हें वहां से चले जाने को कहा। वे वहां कुछ देर और दरवाजा खटखटाती रहीं, लेकिन उनकी इस कोशिश का कोई भी जवाब, अंश की ओर से नहीं मिला, और वे हताश होकर वापस लौट गईं। अगली सुबह भी जब अंश अपने कमरे से बाहर नहीं आया, तो इस बार अंश के पापा ने दरवाजा खुलवाने की कोशिश की। लेकिन वे भी अपनी सभी कोशिशों में नाकाम रहे। कुछ देर बाद फिर से अंश के दरवाजे पर दस्तक हुई।



अंश :- (गुस्से से चिल्लाते हुए) "मैं आप लोगों से कितनी बार कह चुका हूं, कि मुझे नहीं बात करनी है किसी से।"


सिद्धार्थ :- (दरवाजा खटखटाते हुए) "हां ठीक है! मत कर किसी से बात, लेकिन मुझे तो अंदर आने दे।"



       सिद्धार्थ की आवाज सुनकर अंश को थोड़ा अच्छा महसूस होता है। और वह दरवाजा खोल देता है। सिद्धार्थ अपने हाथों में गरमा गरम चाय और नाश्ता लेकर, अंश के कमरे में आता है, और उसके अंदर आते ही, अंश फिर से अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेता है।



सिद्धार्थ :- "तू कब तक यहां बंद कमरे में बैठा रहेगा??"


अंश :- "जब तक इन लोगों को समझ नहीं आ जाएगा, कि मुझे शादी नहीं करनी है।"


सिद्धार्थ :- "देख यार तेरी भावनाओं को मैं समझ सकता हूं, लेकिन तेरे घर वालों को सपना थोड़ी आएगा, कि तू शादी क्यों नहीं करना चाहता!!! वे तो अपने हिसाब से सही कर रहे हैं ना।"


अंश :- "हां तो यार अब उन्हें समझना पड़ेगा, कि मुझे शादी नहीं करनी है।"


सिद्धार्थ :- (अंश को चाय का कप पकड़ाते हुए) "यार तू 29 का हो जाएगा इस साल और अगले साल 30 का। तो वे तो बस अपने मां-बाप होने का फर्ज निभा रहे हैं। अब धीरे-धीरे तो तेरे ऊपर और प्रेशर पड़ेगा शादी को लेकर।"


अंश :- "तो मैं क्या करूं यार??" 


सिद्धार्थ :- "मैं क्या बताऊं?? तू मुझे बता, तू क्या करना चाहता है?"


अंश :- "अगर मेरी जगह तू होता, तो तू क्या करता??"


सिद्धार्थ :- (हंसते हुए) "मैं तो कर चुका जो करना था!!"


अंश :- (आश्चर्य से) "क्या?? तेरी शादी फिक्स हो गई क्या??" 


सिद्धार्थ :-  "नहीं यार!! मैंने घर में बता दिया कि मैं गे हूं। 2 सालों तक तो मैं भी बस यही कह कर मना करता रहा, कि अभी नहीं करनी शादी। लेकिन फिर घर में मम्मी पापा से रोज इसी बात को लेकर लड़ाइयां होने लगी। तो फिर मैंने उन्हें सब सच बता दिया।"


अंश :- "फिर क्या कहा अंकल आंटी ने??"


सिद्धार्थ :- "क्या कहेंगे!! तब से मुझसे बातचीत बंद है। तू जब दुकान पर आया, तब नहीं देखा क्या तूने?? पापा मुझसे बात नहीं कर रहे हैं!! जब से मैंने उन्हें अपने बारे में बताया है।"


अंश :- "यार तेरे लिए तो यह बहुत ही मुश्किल समय होगा फिर?"


सिद्धार्थ :- "हां यार!! वह तो है, लेकिन और कोई रास्ता था ही नहीं मेरे पास। इसलिए तो मैं तुझसे कह रहा हूं, कि तू भी अब तय कर ले, तू क्या करना चाहता है!! अभी तो कुछ वक्त है तेरे पास।" 


अंश :- "इसमें तय क्या कर ना यार!! मैं भी शादी नहीं कर सकता। तो मुझे भी इन लोगों को सच बताना ही पड़ेगा।" 


सिद्धार्थ :- "हां यार!! लेकिन फिर भी अभी थोड़ा समय ले, और तैयार कर ले खुद को। पता नहीं तेरे घरवाले कैसे रिएक्ट करें इस बात पर। तो अच्छे से सोच ले, समझ ले, अभी तो बस मना करता रह, शादी के लिए। जब बात ज्यादा ही बढ़ जाए, तब बता देना।"


अंश :- "यार क्या तब और अब!!! जो तब सोचेंगे, वही अभी भी सोचेंगे। तो मैं आज ही बता कर, मुंबई वापस चला जाऊंगा।"



     सिद्धार्थ से बात करके अंश को एक रास्ता मिल गया था। उस रास्ते पर चलना तो बेशक अंश के लिए बहुत ही ज्यादा मुश्किल होने वाला था। लेकिन इस सच्चाई को छुपाए रखने से भी किसी का कोई फायदा नहीं होने वाला था। सिद्धार्थ जबरदस्ती अंश को चाय नाश्ता करा कर, वापस अपने घर चला गया। और अंश अपने घर वालों को अपनी सच्चाई बताने की तैयारी करने लगा। शाम होते ही, अंश ने अपने सभी घरवालों को एक जगह इकट्ठा किया। और उन्हें अपने गे होने और मुंबई में अपने बॉयफ्रेंड होने के बारे में सब सच बता दिया। कुछ देर तो वहां सन्नाटा छाया रहा, लेकिन फिर धीरे-धीरे सभी के विचार सामने आने लगे। कुछ ने इसे महज एक जिंदगी का दौर कहा, और शादी के बाद सब ठीक हो जाने का वादा दिया। कुछ ने इसे मुंबई जाने का दोष बताया। और कुछ ने इसे, अंश के उस मुंबई वाले दोस्त की गलत संगत कहा। लेकिन अंश के मम्मी-पापा, वे दोनों चुपचाप बस अंश को ही देखे जा रहे थे। अपने घर वालों के बर्ताव को देखकर, अंश अपनी नजरें झुकाए, वहां से वापस अपने कमरे में चला गया। फिर उसने सिद्धार्थ को फोन कर, सारी बात बताई। और सिद्धार्थ ने उसके घर आने का बोला, लेकिन उसने ऐसा करने से सिद्धार्थ को मना किया। अंश ने सिद्धार्थ को कल उसे एयरपोर्ट छोड़ने को कहा, जिसके लिए सिद्धार्थ ने हामी भरी।


         रात को अंश की मम्मी, अंश के लिए खाना लेकर उसके कमरे में आईं। अंश अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। मम्मी को आता देख, वह उठकर तो बैठ गया, लेकिन उसने अपनी नजरें नीचे ही झुकाए रखीं।



मम्मी :- (अंश के पास बैठते हुए) "तूने जो आज किया है, वह बहुत हिम्मत का काम है। इसके लिए तुझे नजरें झुकाने की कोई जरूरत नहीं है।"



         अपनी मम्मी की बातें सुनकर अंश थोड़े आश्चर्य में पड़ा। और वह अपनी मम्मी की ओर देखने लगा, और सोचने लगा, कि "जब मैंने यह बात बताई थी, तब तो मम्मी कुछ नहीं बोल रही थी। और अब यह सब क्यों बोल रही है?"



मम्मी :- (अंश की ओर खाने की थाली बढ़ाते हुए) "अब ऐसे क्या देख रहा है? माँ हूँ तेरी!  तेरे बचपन से ही पता था मुझे, कि तू बाकी लड़कों से अलग है। लेकिन मैंने यही सोचा कि, शायद वक्त के साथ सब बदल गया होगा। जब तूने आज यह सब कहा, तब मुझे लगा, कि तेरी शादी के बारे में सोचने से पहले, मुझे तुझसे बात करनी चाहिए थी। यह हमसे गलती हुई है। यह मेरी और तेरे पापा की गलती है, जो हम तुझे समझ नहीं पाए। इसमें तुझे नीचे देखने की, या नजरें चुराने की, या यहां कमरे में छुपकर बैठने की कोई जरूरत नहीं है।"


अंश :- "नहीं मम्मी!! गलती मेरी है, मुझे यह सब बहुत पहले ही आप लोगों को बता देना चाहिए था।"



     खाने के साथ-साथ दोनों मां-बेटे के बीच, ढेरों बातें होती हैं। आज की, कल की, और आने वाले कल की भी। अंश की मम्मी, अंश से उसके बॉयफ्रेंड के बारे में भी पूछती हैं। और व्योम कपूर का नाम सुनकर, तो उनके होश ही उड़ जाते हैं। जिसको वह रोज अपनी टीवी पर देखती हैं, वह व्योम कपूर, उनके बेटे के साथ में एक प्यार भरे रिश्ते में है, यह जानकर तो उनकी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहता। और वे अंश को व्योम से फोन पर बात कराने को कहती हैं। और अंश भी उनकी बात  व्योम से करा देता है। अंश की मम्मी,  हिचकीचाते हुए, खुश होकर, व्योम कपूर से फोन पर बात करती हैं। और उसे भी कभी ग्वालियर आने का न्योता देती हैं।


       अगली सुबह अंशु द्वारा बताए समय पर, सिद्धार्थ अपनी गाड़ी लेकर, अंश को हवाई अड्डे छोड़ने के लिए आ जाता है। अंश अपने रूठे घरवालों और प्रफुल्लित मम्मी से विदा लेकर वापस मुंबई आ जाता है। मुंबई आने के बाद, व्योम की व्यस्तता के चलते, अंश का कुछ हफ्तों से व्योम से मिलना नहीं हो पा रहा था। फोन पर और चैट पर बस साधारण बातें हो जाया करती थी। कुछ ही दिनों बाद, सिद्धार्थ ने अंश को फोन किया और उसे व्योम के बारे एक बात बताइए।



सिद्धार्थ :- (फ़ोन पर) "कैसा है?? अंश अगर तुझे वहां अच्छा नहीं लग रहा हो, तो तू ग्वालियर आजा। या मैं आ जाता हूं, कुछ दिनों के लिए वहां।"


अंश :- "हां!!! तू आजा, तुझे मुंबई भी घुमा दूंगा। लेकिन यह क्यों पूछ रहा है अचानक??"


सिद्धार्थ :- "तू ने टीवी पर नहीं देखा क्या? व्योम कपूर के बारे में??"


अंश :- (चिंता से) "क्या हुआ?? अभी तो मेरी उससे बात हुई है, थोड़ी देर पहले!!!"


सिद्धार्थ :- "नहीं!!! वो स्टार प्लस पर एक शो आने वाला है, नच बलिए!!!! उसमें दिखा रहे हैं, कि व्योम कपूर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ हिस्सा लेने वाला है।"


अंश :- (हंसते हुए) "क्या??? अरे तो उसका कोई सीरियल होगा। उसके लिए इतना सीरियस क्यों हो रहा है?"


सिद्धार्थ :- (दबी आवाज में) "नहीं यार!! यह एक रियलिटी शो है। इसमें हस्बैंड, वाइफ या बॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड ही हिस्सा लेते हैं।"


अंश :- "ओके!!! तू चिंता मत कर। मैं व्योम से बात कर लूंगा इस बारे में। लेकिन जहां तक मुझे लगता है, कि यह बस टीवी के लिए ही होगा।"



          अंश सिद्धार्थ को तो समझा देता है। लेकिन यह बात सुनकर उसके मन में भी कई सवाल उठने लगते हैं। वह तुरंत व्योम को फोन करता है, और शाम को उसे अपने घर बुलाता है। शाम को ऑफिस के बाद, जब अंश अपने घर पहुंचता है। तो वह तब से ही व्योम को फोन लगाना शुरु करता है, लेकिन व्योम अपना फोन उठता है, रात के 11:00 बजे। काम में व्यस्त होने का कारण बताकर, व्योम रात 12:30 बजे अंश से मिलने उसके फ्लैट पर आता है।



व्योम :- (अंश के फ्लैट में अंदर आते हुए) "क्या हो गया?? इतना भी क्या जरूरी काम था???"


अंश :- "अर्जेंट तो कुछ नहीं!! लेकिन जब से ग्वालियर से वापस आया हूं, तुमसे मिल ही नहीं पाया।"


व्योम :- (अंश को गले लगाते हुए) "हां यार!! आजकल ज्यादा काम है, बहुत बिजी रहता हूं। बिल्कुल भी समय नहीं मिल पाता।"


अंश :- "नच बलिए के लिए???"


व्योम :- (अंश को खुद से दूर करके, उसके चेहरे की तरफ देखते हुए) "हां!!! लेकिन तुम्हें कैसे पता??"


अंश :- "टीवी पर देखा!!! तुम और तुम्हारी गर्लफ्रेंड भी हिस्सा ले रहे हैं, इस बार शो में!!"


व्योम :- (हंसते हुए) "अरे वह तो बस टीवी पर यूं ही दिखाते हैं। सरगुन और मैं तो बस अच्छे दोस्त हैं। नच बलिए से मुझे, शो का ऑफर आया, तो बोला कि आपकी पार्टनर को भी करना पड़ेगा। तो मैंने और सरगुन ने एक सीरियल में साथ काम किया था पहले, तो काफी अच्छी बॉन्डिंग थी हमारी। मैंने उससे पूछा तो वह भी फ्री थी इस टाइम के लिए। तो हम दोनों ने मिलकर साइन कर लिया।"


अंश :- "अरे तो मुझे क्यों इतनी सफाई दी रहे हो?? मुझे तुम पर भरोसा है। एक बात बताऊं!!! मैंने मेरे घर वालों को बता दिया, कि मैं गे हूं, और मम्मी  को तो मैंने तुम्हारे और मेरे बारे में भी बता दिया।"


व्योम :- (थोड़ा गुस्सा होते हुए) "अच्छा तभी उस दिन इतने प्यार से बात कर रहीं थीं वो!!! लेकिन अंशुमन यह सही नहीं रहेगा, मेरे करियर के लिए। और तुम्हें अपने बारे में जो बताना है बताओ, लेकिन मेरा नाम अपने साथ मत जोड़ा करो।"


अंश :- "यार मम्मी है वो मेरी!!! कैसे छुपा सकता हूं उनसे। और मेरी मम्मी को तुम्हारे बारे में पता होने से कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा तुम्हारे काम पर??"


व्योम :- "अंशुमन अब तुम मुंबई में हो, मेरे साथ हो। यह छोटे शहरों वाली सोच को बाहर निकालो अपने दिमाग से। हमारा रिश्ता एक सीक्रेट है, और हमेशा बस मेरा और तुम्हारा सीक्रेट ही रहेगा। जरा सी अफवाह, मेरा करियर खत्म कर सकती है। जब मेरा उस फैशन डिजाइनर से रिश्ता टूटा था ना, तब मुझे भी नहीं समझ आ रहा था, कि उसने ऐसा क्यों किया, जैसे अभी तुम्हें नहीं समझ आ रहा है। लेकिन अब मैं समझ सकता हूं, कि उसने जो किया सही किया। वही ठीक था हम दोनों के लिए। जब नच बलिए का मुझे ऑफर आया, तो मैंने बिना सोचे समझे हां कर दिया। पता है क्यों?? सिर्फ इसलिए, कि अभी भी अगर किसी के दिमाग में जरा सा भी शक होगा, मेरे और उस फैशन डिज़ाइनर के बारे में, तो यह शो देखकर वह भी खत्म हो जाएगा।"


अंश :- (आश्चर्य से) "तुम जो कुछ भी कह रहे हो ना, मैंने कभी भी तुमसे ये सब सुनने की उम्मीद नही की थी।"


व्योम :- "क्या गलत बोला मैंने?? तुमने सोचा है, तुम्हारे मम्मी पापा पर क्या गुजर रही होगी, यह सब जानकर!!! तुम उनके अकेले बैटे हो!! उनके कितने सपने होंगे, तुम्हें लेकर, तुम्हारी फैमिली को लेकर, और तुमने एक बार भी मुझसे पूछना जरूरी भी नहीं समझा??"


अंश :- "इसमें पूछने वाली कौन सी बात थी?? मेरी फैमिली है वो, मेरे बारे में सच जानने का पूरा हक है उनका। और वह लोग मेरी शादी की बात कर रहे थे, और कब तक छुपा कर रखता है इस बात को मैं??"


व्योम :- "शादी कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, कि उसके लिए तुम अपने मम्मी पापा के सपने ही तोड़ दो। कुछ बातें हमेशा के लिए छुपा कर रखनी पड़ती हैं, और कुछ बातों का दिखावा करना पड़ता है। तभी हमारे आसपास के सभी लोग खुश रह पाते हैं।"


अंश :- "हां जैसे तुम्हारा यह गर्लफ्रेंड वाला नाटक???? किसे खुश करने के लिए कर रहे हो तुम??? और मेरे पम्मी पापा खुश है, मेरी सच्चाई जानकर। हां बाकी घर वाले थोड़े निराश हैं, लेकिन मैं उन्हें जानता हूं, कुछ समय बाद वे सब भी नॉर्मल हो जाएंगे। और एक बात मुझे बताओ!! मुझे खुश देखकर वह लोग खुश होंगे, या फिर मैं एक जबरदस्ती का रिश्ता बनाऊ, और कुछ समय के बाद वह रिश्ता टूट जाए, फिर मेरी लाइफ को देखकर वह लोग खुश होंगे??? किस तरीके से खुश होंगे वो लोग????"


व्योम :- "गलती हो गई जो मैंने तुम्हें कुछ अच्छा समझाने की कोशिश की। जो तुम्हें ठीक लगे वही करो तुम। बस मेरा नाम कहीं लेने की जरूरत नहीं है।...... कितना अच्छा मूड था, सब खराब कर दिया!!"



      अंश के फ्लैट में कुछ देर वक्त बिताने के बाद, व्योम कुछ नाराज होकर वहां से चला गया। और व्योम की बातें अंश को भी बिल्कुल पसंद नहीं आई। व्योम का यह रूप, इतने महीनों में अंश को पहली बार देखने को मिला था। अंश व्योम की बातों से थोड़ा गुस्सा और थोड़ा परेशान सा हो गया था। और अंश, व्योम के गर्लफ्रेंड वाले नाटक की वजह से परेशान नहीं हो रहा था, अंश के परेशानी की वजह थी, व्योम की सोच। व्योम अभी जो कुछ भी कह कर गया था, इसमें साफ साफ उसकी सोच नज़र आती थी। और उस सोच को जानकर, अंश को बिल्कुल भी अच्छा महसूस नहीं हो रहा था। अगले दिन सोकर जागने के बाद, जब व्योम ने कल रात को, अंश से की हुई बातों के बारे में सोचा, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। और उसने अंश को फोन कर अपनी गलती की माफी मांगी। और अपनी गलती के प्रायश्चित फल स्वरुप, अंश के साथ आज का सारा दिन साथ बिताना तय किया। व्योम ने अंश को भी उसके ऑफिस फोन करके आज की छुट्टी लेने को कहा। और कुछ समय बाद, व्योम अंश को लेने उसके फ्लैट पर भी आ गया। दोनों साथ में महाबलेश्वर के लिए निकल गए।


      रास्ते भर दोनों के बीच अपने अपने विचारों का आदान-प्रदान हुआ। लेकिन अंश व्योम की सोच के बारे में जानकर, थोड़ा हैरान जरूर हुआ था। व्योम की सोच ने उनके रिश्ते पर कुछ सवाल जरूर खड़े कर दिए थे। जिनके बारे में अंश चाह कर भी नहीं सोचना चाहता था। और इतने दिनों के बाद, व्योम के साथ ने उन सभी सवालों को हवा में भी उड़ा दिया था। अंश और व्योम ने पिछली रात की सारी बातों को भुला कर, साथ में अच्छा समय बिताया, और दोनों देर रात तक वापस मुंबई भी लौट आए।


      कुछ ही दिनों में दोनों के बीच का मनमुटाव पूरी तरह से खत्म हो चुका था। व्योम अपने नए शो, नच बलिए को लेकर ज्यादा ही व्यस्त हो गया था। लेकिन जब उसे समय मिलता था, वह अंश के साथ समय बिताने, उसके फ्लैट पर आ जाया करता था। अपनी और सरगुन की डांस प्रैक्टिस की सभी बातें, अंश को सुनाया करता था। अंश की मम्मी से भी कभी-कभी फोन पर बात कर लिया करता था। व्योम की सोच के कुछ अंश, अगर उससे अलग कर दिए जाएं, तो अंश के लिए एक आदर्श व्यक्तित्व की छवि साफ़ साफ़ व्योम में देखी जा सकती थी। और कुछ कमियां तो हर इंसान में ही होती हैं, और उन कमियों को स्वीकार कर अंश ने व्योम की अच्छाइयों को ही तवज्जो देने का जो फैसला ले लिया था, अब अंश अपने उस फैसले से काफी खुश भी था। मुंबई आने का फैसला लेना, व्योम से मिलना, और व्योम का अंश की जिंदगी में आना, यह सब महज एक संयोग ही था। और अंश अपनी जिंदगी में अचानक आए इस प्यार के समंदर से काफी अभिभूत भी था। लेकिन अगर कोई अपनी किस्मत में ही दर्द-ए-दिल पाना लिखवा कर साथ लाया हो, तो उसके दिल को टूटने से कोई नहीं बचा सकता।


       कुछ ही दिनों बाद नच बलिए टीवी पर आना शुरू हो गया। और ग्वालियर में सिद्धार्थ और अंश की मम्मी, इस शो को बड़े ही चाव से देखने भी लगे। लेकिन शो शुरू होने के तीसरे हफ्ते में ही, व्योम कपूर ने नेशनल टेलीविजन पर, सारे देश के सामने, अपनी तथाकथित गर्लफ्रेंड सरगुन मेहता को, शादी के लिए प्रपोज कर दिया। और सरगुन ने भी इस रिश्ते के लिए हामी भर दी। यह सब टीवी पर देखकर सिद्धार्थ को तो बहुत ही गुस्सा आया। और वहीं अंश की मम्मी, अपने बेटे को होने वाली निराशा से दुखी हुई। दोनों ने ही इस बारे में अंश को फोन पर जानकारी दी। यह खबर सुनकर, अंश की परेशानी का सबब उसके चेहरे पर साफ देखा जा सकता था। जिस गर्लफ्रेंड के किस्से को वो अब तक, महज टीवी के लिए किए जाने वाला नाटक समझ रहा था। वह नाटक अब धोखे का रूप लेता जा रहा था। सिद्धार्थ और अपनी मम्मी की बात को सच ना मानकर, अंश ने खुद इंटरनेट पर उस शो को देखा। और हाथों में अंगूठी लिए, सरगुन के सामने घुटनों पर बैठे हुए व्योम को देखकर, अंश को अपने प्यार पर ही शक होने लगा। उसने तुरंत व्योम को फोन किया, लेकिन व्योम ने फोन नहीं उठाया। अंश अभी भी खुद को संभाले हुए, अपने ऑफिस में नॉर्मल तरीके से काम किए जा रहा था। वह एक बार व्योम से बात करके, इस नाटक की सच्चाई को खुद व्योम के मुंह से सुनना चाह रहा था। लेकिन व्योम और सरगुन की वह तस्वीर, तो उसके जहन से निकल ही नहीं रही थी। वह सारा दिन, थोड़ी थोड़ी देर बाद, लगातार व्योम को फोन करता रहा। लेकिन व्योम ने एक बार भी उसका फोन नहीं उठाया। देर रात जब व्योम, अंश के फ्लैट पर पहुंचा। तो फ्लैट में अंदर दाखिल होते ही, अंश ने उसके फोन ना उठाने का कारण व्योम से पूछा। जिसका उत्तर व्योम ने काम की व्यस्तता को बताया। उसने फिर सरगुन से शादी का सवाल भी व्योम से किया, तो अंश का इस तरह से सवाल जवाब करना व्योम को बिल्कुल भी रास नहीं आया।



व्योम :- (गुस्से में) "यार मैं दिन भर का थका हारा आया हूं। मुझे रिलैक्स कराने के बजाय, मुझसे सवाल पर सवाल किए जा रहे हो!!"


अंश :- "सवाल करने वाले काम ही कर के आए हो, तो सवाल ही होंगे!!!"


व्योम :- "हां किया है मैंने उसे प्रपोज!! और शादी भी करूंगा उससे!!! पता है, आज ही दो फिल्मों के ऑफर आए हैं, हम दोनों को। हीरो हीरोइन के तौर पर लेना चाहते हैं, हम दोनों को साथ में। मेरे करियर ग्राफ के लिए एकदम सही फैसला है यह।"


अंश :- (व्योम की बात सुनकर निराश होकर) "मैं क्या हूं तुम्हारे लिए व्योम??? उस दिन मुझे बोल रहे थे, कि मैंने अपने बारे में अपने घरवालों को बताने से पहले तुमसे क्यों नहीं पूछा!!! और आज मेरे साथ रिलेशन में होने के बावजूद, किसी लड़की से शादी करने का फैसला ले लिया तुमने, और मुझे इस बारे में एक बार बताना भी जरूरी नहीं समझा??"


व्योम :- (अंश को गले लगाने के लिए बढ़ते हुए) "अरे यार तो इसका हमारे प्यार पर कोई असर नहीं पड़ेगा!!"


अंश :- (व्योम को खुद से दूर करते हुए) "क्या??? व्योम मुझे ऐसा लग रहा है, कि मैं तुम्हें जानता ही नहीं हूं। तुम वह शख्स हो ही नहीं जिससे मैंने प्यार किया था।"


व्योम :- (अंश के हाथों को पकड़ते हुए) "मेरा विश्वास करो अंश!! जैसा अभी चल रहा है, शादी के बाद भी सब ऐसा ही चलता रहेगा। आई ऑलवेज लव यू!!"


अंश :- (व्योम के हाथों को झटकते हुए) "प्यार का मतलब भी जानते हो तुम??? घिन आ रही है मुझे तुमसे और तुम्हारी सोच से। चले जाओ यहां से, मुझे शक्ल भी नहीं देखनी तुम्हारी।"



      व्योम अंश को मनाने की बहुत कोशिश करता है, लेकिन वह जो भी दलीलें खुद को सही जताने के लिए, अंश को देता है। उनसे वह अंश की नजरों में गिरता ही जाता है। अपनी बात ना बनते देख, व्योम वहां से गुस्से में चला जाता है। और अंश अपने फ्लैट में अकेले में बस व्योम की कही बातों के बारे में सोच सोच कर रोता ही रह जाता है। यह दूसरी दफा था, जब अंश का दिल किसी ने तोड़ा था। उसे दर्दे दिल का गम दिया था। लेकिन पहले सिद्धार्थ उसके साथ था, उसका दर्द बांटने के लिए, उसके आंसू पोछने के लिए, उसे दिलासा देने के लिए। लेकिन अभी तो अंश बिल्कुल अकेला है। यह तन्हाई और व्योम की बातें, उसकी यादें, अंश के आंसुओं को सूखने का एक मौका तक नहीं दे रही है। अंश ने यूं ही रोते हुए सारी रात निकाल दी, और अगली सुबह के उगते सूरज का स्वागत भी, अपनी भीगी पलकों के साथ ही किया। नहा धोकर अंश ने ऑफिस जाना ही तय किया। क्योंकि घर पर रहकर तो वह सारा दिन, सिर्फ व्योम के बारे में ही सोचता रहता, और अकेले में आंसू ही बहता रहता। इसलिए ऑफिस जाकर, काम में मन को उलझाना ही उसे सही लगा। आफिस में सारा दिन, व्योम, सिद्धार्थ और मम्मी के आए तमाम कॉल और मैसेज का उत्तर देने का अंश का बिल्कुल भी मन नहीं हुआ। शाम को ऑफिस से आ जाने के बाद, रात भर ना सोने के कारण, बिस्तर पर लेटते ही उसकी नींद भी लग गई। और बिना कुछ खाए पिए ही, अंश शाम को ही सो गया। रात के करीब 12:30 पर दरवाजे पर हो रही आहट से उसकी आंख खुली। जब उसने दरवाजे पर जाकर आवाज लगाई, तो बाहर से व्योम के दरवाजा खोलने का उत्तर पाकर, उसे व्योम की वही सब बातें याद आने लगी, जो व्योम पिछली रात कह कर गया था। और अंश ने बिना दरवाजा खोले, व्योम को वापस जाने को कह दिया। और थोड़ी देर बाद, व्योम वहां से चला गया। कुछ देर वही दरवाजे के पास ही खड़े रहने के बाद, अंश वापस अपने कमरे में आया, और मोबाइल उठा कर देखा। मोबाइल में मम्मी, सिद्धार्थ और व्योम के कई, मिस कॉल और मैसेज पढ़े हुए थे, जिन्हें नजरअंदाज कर वो वापस से सो गया।


      अगली सुबह अंश की आंख फिर दरवाजे पर हो रही खटखटाहट से ही खुली। और उसने यही सोचा कि, व्योम ही वापस से आ गया होगा।



अंश :- (घर के अंदर से चिल्लाते हुए) "मुझे नहीं कोई बात करनी तुमसे। प्लीज कोई तमाशा मत बनाओ!!! और जाओ वापस अपनी उस नकली दुनिया में।"


सिद्धार्थ :- (दरवाजे को खटखटाते हुए) "दरवाजा तो खोल यार अंश । मैं सिद्धार्थ!!!"



      सिद्धार्थ की आवाज सुनते ही अंश ने फोरन दरवाजा खोला और सिद्धार्थ को जोर से गले लगा कर रोने लगा। सिद्धार्थ ने अंश को संभाला और उसे शांत कराने की कोशिश करने लगा। लेकिन अंश के दूसरी बार टूटे दिल को वापस से जोड़ पाना, इस बार सिद्धार्थ के लिए भी बहुत मुश्किल काम हो गया था। सिद्धार्थ कि कहीं किसी भी बात को, अंश सुनने को ही तैयार नहीं था। दोबारा प्यार में मिले धोखे को, अंश खुद की ही गलती माने बैठा था। उसने सिद्धार्थ को वापस उसे ग्वालियर ले जाने को कहा, और सिद्धार्थ ने भी उसकी बात मान ली। और अगले ही दिन सिद्धार्थ अंश को अपने साथ ग्वालियर ले आया। अंश के घर में सिर्फ उसकी मम्मी को छोड़कर, उसके टूटे दिल का हाल किसी को नहीं पता था। और अंश के पापा को छोड़कर, बाकी घरवालों में, अंश के शादी ना करने के फैसले से थोड़ा मनमुटाव बाकी था। सिद्धार्थ और अंश की मम्मी को 6 से 7 दिन का समय लगा, अंश के चेहरे पर मुस्कान वापस लाने में। लेकिन दिल की टीस अभी भी अंश को रात को चैन से सोने नहीं देती थी। और व्योम के बार-बार आते कॉल और मैसेज उसे सब कुछ भूलने भी नहीं देते थे। एक रात अंश सिद्धार्थ से फोन पर बात कर रहा था, कि......



अंश :- (फोन पर) "सिद्धार्थ थैंक्यू!!!! तू हमेशा मेरा साथ देता है यार!!! तेरे जैसा दोस्त सच में किस्मत से ही मिलता है।"


सिद्धार्थ :- "इसमें थैंकयू बोलने की कोई जरूरत नहीं है। मैं हमेशा तेरे आस पास रहूंगा तुझे संभालने के लिए।"


अंश :- "यार काश मैं तुझसे ही प्यार कर लेता, कम से कम मेरा दिल तो ना टूटता!!!"


सिद्धार्थ :- "अंश यार मैं एक बात बोलूं.....? चल रहने दे...!!! तू सो जा कल बात करते हैं।"


अंश :- "अरे नहीं यार!! नींद नहीं आ रही मुझे अभी। तू बता!! क्या कह रहा था???"


सिद्धार्थ :- "यार मुझे नहीं पता, कि यह सही समय है अपनी बात बोलने का या नहीं!!!  लेकिन यार मैं तुझे यह बात बहुत समय पहले ही बताना चाहता था। लेकिन मैं तुझे कुछ कह पाता, इससे पहले तू आदित्य के साथ रिलेशन में चला गया, और फिर मुंबई चला गया और फिर व्योम तेरी लाइफ में आ गया........"


अंश :- "क्या कहना चाहता है? बोल चुप क्यों हो गया??"


सिद्धार्थ :- "यार अंश मैं जब से तुझ से मिला हूं, मेरे दिल में तेरे लिए फीलिंग है। लेकिन यार मैं तुझे कभी कुछ कह ही नहीं पाया।"


अंश :- "देख अगर तू यह सब मजाक कर रहा है, या मेरा मूड ठीक करने के लिए कह रहा है, तो मेरा मूड पहले से ही ठीक है। और यह बहुत ही खराब मजाक है।"


सिद्धार्थ :- "नहीं यार!!! मैं बिल्कुल मजाक नहीं कर रहा। मैं सच बोल रहा हूं। मैं तुझे दोस्त से बढ़कर पसंद करता हूं।"


अंश :- "अच्छा अगर ऐसा है, तो जब मैंने तुझे उस दिन किले पर किस किया था, तो ऐसा रिएक्शन क्यों दे रहा था, कि मैंने कुछ गलत कर दिया हो??"


सिद्धार्थ :- "यार तब मुझे समझ नहीं आ रहा था, कि मैं क्या करूं, क्या कहूं। अगर मैं तब तुझे यह सब बोलता, या मैं भी आगे बढ़कर तुझे किस करने लगता। तो उस वक्त तेरा ब्रेकअप हुआ ही था, तो कहीं तुझे ऐसा ना लगता, कि मैं तेरा फायदा उठा रहा हूं। इसलिए उस समय मैंने खुद को काबू में कर लिया था। लेकिन मन तो मेरा हो रहा था तुझे किस करने का।"


अंश :- (हँसते हुए) "हां मुझे सब समझ आ रहा है, कि तू बस मजाक ही कर रहा है।"


सिद्धार्थ :- "देख यही तेरी दिक्कत है। मैं अपने मन की बात बता रहा हूं, तो तुझे मजाक लग रहा है। और कोई गलत इरादे से तुझे आई लव यू बोलेगा, तो तू हंस के उसके साथ चला जाएगा।"


अंश :- "यार मुझे नहीं समझ आ रहा, मैं क्या बोलूं।"


सिद्धार्थ :- "अरे तो मैं थोड़ी तुझे कुछ बोलने के लिए कह रहा हूं, मैं तो बस तुझे अपने दिल की बात बता रहा हूं। अच्छा सुन!!! कल कोई प्लान तो नहीं है ना तेरा??? और अगर हो तो कैंसल कर दे!!! कल मैं तुझे एक जगह ले चलूंगा, तुझे अच्छा लगेगा वहां।"


अंश :- "ऐसी कौन सी जगह ले जा रहा है?? नाम तो बता??"


सिद्धार्थ :- "कल चल कर ही देख लेना, मैं आ जाऊंगा 11:00 बजे लेने तुझे। तैयार रहना। चल अब सो जा, और हां मेरी बात के बारे में सोचना जरूर।  आई लव यू !!!"



      सिद्धार्थ अपनी बात कहकर फोन काट देता है। और अंश सिद्धार्थ कि कही सारी बातों के बारे में सोचने लगता है। अंश सोचता है, कि कहीं सिद्धार्थ मजाक तो नहीं कर रहा था??? लेकिन जितना अंश सिद्धार्थ को जानता है, तो सिद्धार्थ इतनी बड़ी बात का मजाक तो नहीं बनाएगा!!! तो क्या सच में सिद्धार्थ अंश से प्यार करता है??? इन्हीं बातों को सोचते हुए अंश की आंख लग जाती है। और अंश अपने सपने में भी सिद्धार्थ को ही देखता है। सिद्धार्थ के साथ हंसना मुस्कुराना, उसके साथ लड़ना झगड़ना, सिद्धार्थ का हर जरूरत के वक्त अंश का सहारा बन कर खड़ा होना, और सिद्धार्थ को किले की ऊंचाइयों पर, ढलते सूरज की लाली में, किस करना। इन सभी सपनों के साथ अंश मुस्कुराकर अगली सुबह उठता है। और तैयार होकर सिद्धार्थ से मिलने का इंतजार करने लगता है। उधर सिद्धार्थ भी तैयार होकर, फूलों का गुलदस्ता लेकर, अंश से मिलने उसके घर की ओर निकल पड़ता है।


       जैसे ही सिद्धार्थ अंश के घर के पास पहुंचता है, वहां काफी भीड़ इकट्ठी हुई होती है। कई न्यूज़ चैनल्स की गाड़ियां, अंश के घर के आसपास खड़ी हुई होती हैं। कई न्यूज़ रिपोर्टर हाथों में माइक, और कैमरामैन के साथ अंश के घर की ओर देख रहे होते हैं। भीड़ से निकलकर सिद्धार्थ जैसे ही अंश के घर में घुसता है, वहां अंश का सारा परिवार, व्योम कपूर की खातिरदारी में लगा हुआ होता है। सिद्धार्थ वहां से निकलकर किचन की तरफ जाता है, जहां अंश की मम्मी कुछ काम कर रही होती है। और वह उनसे सभी हाल जानने की कोशिश करता है। अंश की मम्मी सिद्धार्थ को बताती हैं कि, "कुछ देर पहले ही व्योम कपूर यहां आया है, और इसे देखकर ही, अंश ने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया है। ना तो वो बाहर आ रहा है, और ना ही व्योम कपूर यहां से जाने का नाम ले रहा है।" अंश की मम्मी की बात सुनकर, सिद्धार्थ अंश के कमरे की ओर जाता है, और अंश के कमरे का दरवाजा खटखटा ता है।



सिद्धार्थ :- (दरवाजा खटखटाते हुए) "अंश दरवाजा खोल, बाहर आ, या मुझे अंदर आने दे!!"


अंश :- (दरवाजा खोलकर सिद्धार्थ को अंदर बुला कर, वापस कमरे का दरवाजा बंद करते हुए) "क्यों आया है अब ये यहां??? और कोई इसे जाने को भी नहीं कह रहा है!!!"


सिद्धार्थ :- "वो यहां सिर्फ तेरे लिए आया है, तो तुझे ही उसे जाने के लिए कहना पड़ेगा ना!!!"


अंश :- "यार मुझे उसका चेहरा भी नहीं देखना है!!! तू उसे भगा यहां से।"


सिद्धार्थ :- "हां चल मेरे साथ, हम उसे जाने के लिए कहते हैं।"



        बड़ी मुश्किल से समझा-बुझाकर, सिद्धार्थ अंश को बाहर व्योम के सामने लेकर आता है। अंश को देखते ही व्योम आगे बढ़कर, अंश को अपने गले से लगा लेता है।



अंश :- (व्योम को खुद से दूर करते हुए) "क्यों आए हो तुम यहां??"


व्योम :- "मुझे अपनी गलती समझ आ गई है!! आज मैं अपनी गलती सुधारने और तुम्हें वापस अपने साथ ले जाने आया हूं।"


अंश :- "मुझे कहीं नहीं जाना है तुम्हारे साथ!!! तुम जाकर अपनी शादी की तैयारियां करो!!"


व्योम :- (अंश का हाथ पकड़ते हुए) "क्या हम अकेले में चल कर बात कर सकते हैं??"


अंश :- (व्योम का हाथ झटकते हुए) "मुझे तुमसे कोई भी बात नहीं करनी है!! चले जाओ तुम यहां से।"


व्योम :- "प्लीज अंश!!! मैं इतनी दूर से सिर्फ तुमसे बात करने आया हूं। क्योंकि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, और इतनी आसानी से तुम्हें अपनी जिंदगी से नहीं जाने दे सकता।"



     अंश के बाकी घर वाले, जो अब तक व्योम की खातिरदारी में लगे हुए थे। अंश और व्योम की बातें सुनकर, अब अपने नाक और भवै सिकोड़ कर, अपने-अपने कमरों में चले जाते हैं। वहां रह जाते हैं, तो बस अंश के मम्मी-पापा, और सिद्धार्थ। और वे तीनों ही अंश को व्योम की बात एक बार सुनने के लिए कहते हैं। और अंश उन लोगों की बात मानकर, व्योम को बोलने का इशारा करता है। 



व्योम :- "थैंक्यू अंश!!! में सच में यहां तुमसे अपने बर्ताव के लिए माफी मांगने आया हूं। और मैंने सरगुन को भी हमारे रिश्ते के बारे में सब सच बता दिया है। और उसे भी हमारे रिश्ते से कोई परेशानी नहीं है। हम दोनों मेरी शादी के बाद भी, साथ रह सकते हैं।"


सिद्धार्थ :- (आश्चर्य से) "क्या मतलब???"


व्योम :- (अंश के हाथों को पकड़ते हुए) "मैं एक एक्टर हूं अंश!! तो मेरी शादी और सरगुन का रिश्ता तुम एक्टिंग ही समझ लो बस। बस मीडिया के लिए हम शादी करेंगे, पति-पत्नी बनेंगे। लेकिन मैं हमेशा तुमसे ही प्यार करूंगा। तुम्हारे साथ ही रहूंगा।"


अंश :- "मुझे सच में विश्वास नहीं हो रहा है, कि तुम मेरे ही घर में खड़े होकर, मेरे मम्मी पापा के सामने, मुझे अपनी रखेल बनाने की बात कर रहे हो।"


व्योम :- "कैसी बातें कर रहे हो अंश!!! मैं तुमसे प्यार करता हूं। यह शादी तो बस एक नाटक होगी।"


अंश :- "तुम प्यार का मतलब ही नहीं जानते हो व्योम!!! तुम्हारे लिए यह सब बस एक खेल है। प्यार का सही मतलब भी जानते हो तुम??? जब तुम अपनी खुशी से ज्यादा, दूसरे की खुशी की परवाह करो, उसे कहते हैं प्यार। जब तुम दूसरे की आंखों में आंसू देख कर, खुद भी रोने लगो, उसे कहते हैं प्यार। दूसरे को तकलीफ में देख कर, तुम उस का सहारा बन जाओ, उसे कहते हैं प्यार। और अब मैं तुमसे बिल्कुल भी प्यार नहीं करता। मैं किसी और से प्यार करता हूं। तो अब तुम यहां से जा सकते हो। और ऐसा प्यार का नाटक करने वाले तुम्हें बहुत मिल जाएंगे। तो ऐसा प्यार तुम्हें ही मुबारक हो।"



        अंश की बातें सुनकर व्योम निराश होकर वहां से चला जाता है। और अंश के मम्मी पापा भी अपने कमरे में चले जाते हैं। और वहां रह जाते हैं, अंश और सिद्धार्थ। सिद्धार्थ अब अंश की आंखों में एक अलग ही चमक महसूस कर सकता था। जो उसने आज तक नहीं देखी थी। सिद्धार्थ कुछ कह पाता इससे पहले अंश सिद्धार्थ की ओर बढ़ा, और उसके होठों पर एक प्यारी सी किस की, और धीरे से उसके कानों में कहा.....


" किले पर चलें???"


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Lots of Love

Yuvraaj ❤️











Thursday, September 10, 2020

"दर्द-ए-दिल" - Part II

 Hello friends,     

                If you didn't read first part of this story than please read it, than you will get easily be connected with this second part.




    अब वापस से सब कुछ पहले जैसा हो गया था। वही ऑफिस के बाद अंश का सिद्धार्थ की दुकान पर आ जाना, घंटों तक साथ समय बिताना, घूमना फिरना, हंसी-मजाक। लेकिन 3 साल के आदित्य के साथ की यादें आज भी अंश को कहीं ना कहीं घेरे हुए थी। पहले प्यार को पूरी तरह से भुला पाना, शायद ही किसी के बस में हो। इसलिए अंश ने एक रोज अचानक ही तय कर लिया, कि वह ग्वालियर से बाहर ही नौकरी करने जाएगा। नया शहर, नए लोग, शायद यही सब बदलाव की अभी उसे जरूरत भी है। यहां ग्वालियर में सिद्धार्थ है उसका साथ देने के लिए, लेकिन सिर्फ अपनी खुशी के लिए सिद्धार्थ का सारा समय ले लेना, यह बात भी अंश को सही नहीं लगती थी। और किले की अंश की हरकत के बाद से, एक हल्की सी असहजता, सिद्धार्थ की आंखों में भी साफ साफ देखी जा सकती थी। सिद्धार्थ ने कुछ डेट्स भी, अंश के बहुत मना करने के बाद भी फिक्स कराई थी। और अंश उनसे मिलने भी गया था। लेकिन ग्वालियर में ज्यादातर लोगों को अंश और आदित्य के रिश्ते की जानकारी पहले से ही थी। तो सिद्धार्थ की ये कोशिशें भी किसी ना किसी तरह, अंश को आदित्य की यादों को भुलाने में सहायक साबित नहीं हो रही थी। इसलिए उसने अपने अचानक आए इस ख्याल पर तुरंत अमल भी किया। उसने अपने कॉलेज के सभी दोस्तों को जो ग्वालियर के बाहर नौकरी कर रहे थे, सभी को अपना रिज्यूम भेज दिया। और उन्हें अपने लिए कोई सूटेबल जॉब ढूंढने के लिए आग्रह किया। कुछ ही दिनों में अंश को उसके एक दोस्त ने मुंबई की Softlabs नाम की कंपनी की जॉब वैकेंसी के बारे में बताया। उसने भी बिना समय गवाएं अपना रिज्यूम उस कंपनी में भेज दिया। और कुछ ही घंटों में अंश का उस कंपनी के द्वारा टेलिफोनिक इंटरव्यू भी कर लिया गया। अगले ही दिन अंश से कुछ और डॉक्यूमेंट मांगे गए, जो सब अंश ने उस कंपनी को भिजवा दिए। शाम को जब अंश सिद्धार्थ से मिला, तो उसने इस पूरे घटनाक्रम को सिद्धार्थ को भी बताया। सिद्धार्थ यह सब सुन अंश के लिए खुश तो हुआ, लेकिन उसके चेहरे पर खुशी का कोई भी भाव अंश को नजर तो ना आया। लेकिन अंश ने इसे सिद्धार्थ के काम की व्यस्तता समझ नजरअंदाज कर दिया। अगले ही दिन मुंबई से Softlabs कंपनी से अंश को नौकरी दी जाने की खबर, अंश को दे दी गई। और अगले 7 दिनों में उसे मुंबई के ऑफिस में रिपोर्ट करने को भी कहा गया। ये खबर सुन अंश काफी खुश हुआ, उसने अपनी खुशी बांटने के लिए सिद्धार्थ को फोन कर यही बात बताई। सिद्धार्थ ने भी अंश को नए शहर की नौकरी के लिए बधाई दी।


        कुछ ही दिनों में अंश ने e-biz से नौकरी छोड़ने की कागजी कार्यवाही भी पूरी की, और मुंबई जाने की पैकिंग भी शुरू कर दी। अंश के घर में इस बात का मिलाजुला रूप था। घर के कुछ लोग खुश थे, कि अंश मुंबई में नौकरी करने जाएगा, तो कभी ना कभी वे लोग भी मुंबई घूम आया करेंगे। वहीं अंश के मम्मी पापा इस बात से बेहद नाराज थे। अपने शहर, अपने घर में रहकर, अच्छी खासी सैलरी की नौकरी छोड़कर, नए शहर, नए माहौल, किराए के घर में जाकर अकेले रहने तथा अन्य कई परेशानियों के बारे में सोचकर, अंश के मम्मी पापा उसके इस फैसले के बिल्कुल पक्ष में नहीं थे। उन्होंने तो सिद्धार्थ को भी अंश को समझा-बुझा कर, ग्वालियर ही रोकने को भी कहा। लेकिन अंश अपना मन पक्का कर चुका था। अब ना तो वह अपने मम्मी पापा की कोई भी बात सुनने को तैयार था, ना ही सिद्धार्थ की बेमानी हंसी का कारण जानने का इच्छुक। और सब को अलविदा कहकर, अंश कुछ ही दिनों में मुंबई के लिए रवाना भी हो गया।



        मुंबई!!!!! तेज रफ्तार से भागती जिंदगी और उसमें धड़कते सपनों का शहर, मुंबई!!!! लाखों की भीड़ में खो जाने का शहर, मुंबई!!!!  जैसा माहौल इस वक्त अंश को चाहिए था, उसके लिए बिल्कुल उपयुक्त शहर, मुंबई!!!! ना किसी को तुम्हारे आज की परवाह, ना ही किसी को तुम्हारा अतीत जानने की दिलचस्पी। मुंबई आकर कुछ ही दिनों में अंश यहां के माहौल में घुल मिल गया। अपने ऑफिस के पास ही एक फ्लैट भी किराए पर ले लिया। ग्वालियर में घर पर फोन से रोज बात हो जाया करती थी। और सिद्धार्थ को भी चैट पर सारी खैर खबर बता दी जाती थी। ऑफिस में भी कलीग्स से दोस्ती होती जा रही थी। नया शहर, नया माहौल, ठीक अंश के अनुरूप ही काम कर रहा था। आदित्य की यादों के बादल भी अब धीरे-धीरे अंश के जहन से छटते जा रहे थे। जैसा अंश चाहता था, सब कुछ ठीक उसी के मुताबिक हो भी रहा था। मुंबई शहर में अंश का ऐसा मन रमा, कि कुछ दिन, कुछ हफ्तों और कुछ हफ्ते, कुछ महीनों में पलक झपकते बदल गए। अब सबकुछ बिल्कुल ही साधारण सा हो गया था। ग्वालियर में घर का माहौल भी अब ठीक था। मम्मी पापा की नाराजगी भी अब दूर हो चुकी थी। और अब जब भी किले की उस घटना की याद आती थी, तो असहजता की जगह हंसी आ जाया करती थी। आदित्य की यादें पूर्णतः खत्म हो चुकी थी। अब आदित्य का ख्याल आते ही, आंसू और उसके साथ बिताए हंसी और प्यार के लम्हों की जगह, उसके कमीनेपन की याद आती थी। अभी तक अंश के मन में जो बोझ था, वह सब गायब हो चुका था। अंश अब एकदम हल्का महसूस करता था। नए शहर में अकेले रहना उसे काफी रास आने लगा था। अब अंश गे डेटिंग एप भी इस्तेमाल करने लगा था। मुंबई में कुछ लोगों से रेस्टोरेंट्स या नाइट क्लब या पब्स में मिलने भी जाने लगा था। लेकिन अभी वह किसी भी तरह के फिजिकल और मेंटल रिलेशन के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोच रहा था।


       कुछ ही दिनों में Softlabs के भारत में 10 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। जिस के लिए स्टेज परफॉर्मेंस करने वाले कलाकारों के कोआर्डिनेशन का कार्य अंश को सौंपा गया। 15 दिन पहले से ही इस आयोजन की तैयारियां भी शुरू कर दी गई। मुख्य परफॉर्मेंस के लिए टीवी एक्टर व्योम कपूर को बुक कर लिया गया था। रात के 9:00 से 1:00 के समय के लिए, जिसमें तीन गानों पर डांस परफॉर्मेंस और स्टाफ के साथ ऑफिस में सोशल मीडिया के लिए एक फोटो सेशन के लिए, उन्हें बुक किया गया था। लेकिन एक्टर की व्यस्तता के चलते, जो फोटो सेशन समारोह के दिन होना था, उसे आज ही करने की तैयारी कर दी गई। और अपने तय समय पर, व्योम कपूर अंश के ऑफिस भी आ गया, और फोटो सेशन शुरू हुआ। ऑफिस के सभी कोनों में, ऑफिस स्टाफ के साथ फोटो लेना शुरू किया गया। कुछ ही देर में अंश की भी बारी आई। अंश के साथ फोटो खिंचवाते समय, व्योम कभी उसके कंधे पर हाथ रखकर के सहलाता, तो कभी उसकी कमर पर। अंश को व्योम की यह हरकत समझ तो आ रही थी, लेकिन उसने इसे महज अपने दिमाग का वहम ही समझा। कुछ ही देर में फोटो सेशन खत्म हुआ, और व्योम को सारा ऑफिस घुमाया जाने लगा। जब व्योम स्टाफ सेक्शन में आया, तो सभी ने उसका तालियां बजाकर अभिवादन किया। व्योम ने भी सभी का अभिवादन स्वीकार किया।


व्योम :- "सॉरी!!! मेरी वजह से आप सभी को अगर थोड़ी सी भी परेशानी हुई हो तो। लेकिन मुझे आप सभी के साथ काम करके बहुत मजा आया।"



       व्योम बारी-बारी से सभी के पास जा जाकर, सभी से हाथ मिलाने लगा। जब बारी अंश की आई, तो व्योम ने एक हाथ से अंश से हाथ मिलाया, और दूसरे हाथ को अंश के हाथ के ऊपर रख, सहलाने लगा।



व्योम :- "अंशुमन जी!! काफी फोटोजेनिक चेहरा है आपका। कोई एक बार देखो तो बार बार देखने का मन करे। और पर्सनालिटी भी काफी शानदार है। कभी मॉडलिंग और टीवी में काम करने का मन हो तो बताइएगा।"



      अंश ने सिर्फ थैंक यू ही कहा, और व्योम आगे बढ़कर दूसरे स्टाफ के पास चला गया। व्योम के ऑफिस से जाने के बाद, सारा स्टाफ व्योम के बर्ताव और उसके इतना नामी होने के बाद भी, साधारण व्यवहार की तारीफ करने लगा। लेकिन अंश तो अभी भी व्योम की छुअन को अपने शरीर पर महसूस कर सकता था। अंश ने फिल्म इंडस्ट्री की कई बातें भी पहले सुन रखी थी। कि इस इंडस्ट्री में कैसे नामी लोग, छोटे लोगों का फायदा उठाते हैं, उनका यौन शोषण करते हैं। और व्योम की हरकतें भी अंश को उसी तरफ इशारा कर रही थी। और अंश तो यह सोचकर भी परेशान था, कि व्योम की देखभाल की जिम्मेदारी भी उसी के ऊपर है। तो व्योम से दूर रहना, तो बिल्कुल भी मुमकिन नहीं होगा। अंश ने तुरंत अपने मैनेजर से जाकर समारोह में मिली ड्यूटी को बदलने की बात की। लेकिन मैनेजर ने ऐसा करने से बिल्कुल मना कर, अंश को वापस उसके काम पर भेज दिया। शाम को जब अंश ऑफिस के बाद, अपने घर पहुंचा। तो वह सिद्धार्थ को फोन लगाकर, आज व्योम के साथ बिताए समय और अपने अनुभव को बयां करने लगा। तो सिद्धार्थ ने उसे समझाया कि "इसमें डरने या घबराने की क्या बात है?? वह कोई तेरा बलात्कार थोड़ी करेगा। अगर कोई जबरदस्ती करें भी, तो उसका वीडियो बनाने लगना, और उसे बदनाम करने की धमकी दे देना। अपनी इज्जत और काम बचाने के लिए फिर वह कुछ नहीं करेगा। और अगर तुझे वह पसंद आ रहा हो, तो तू भी इंजॉय कर। परेशान क्यों हो रहा है।" सिद्धार्थ से मिले सुझाव ने अंश की परेशानी को कुछ हद तक कम तो कर दिया था, लेकिन फिर भी अभी भी अंश के मन में, व्योम के व्यवहार को लेकर थोड़ी सी परेशानी बाकी थी। दरअसल अंश की परेशानी, व्योम के बर्ताव को लेकर नहीं थी, बल्कि व्योम की सोसायटी, उसकी शौहरत, उसकी बड़े-बड़े लोगों में हो सकने वाली पहचान से थी। उसने इस तरीके के हाईप्रोफाइल लोगों के लव अफेयर्स के कई किस्से सुन रखे थे। तो उसका भी यही डर था, कि अगर वह व्योम को नाराज कर देगा, या उसकी कोई बात नहीं मानेगा, तो कहीं व्योम उसके लिए मुश्किलें ना खड़ी कर दे।


      अगले दिन अंश जब ऑफिस पहुंचा, तो मैनेजर ने उसे बुलाकर, व्योम कपूर के घर जाने को कहा। जब अंश ने वहां जाने का कारण पूछा, तो समारोह की कुछ डिटेल्स व्योम को देना बताया गया। जितना अंश व्योम से दूर रहना चाह रहा था, उतना ही उसके पास जाना पड़ रहा था। और कोई बहाना देकर वह इस सब से बच भी नहीं सकता था। थोड़ा डरते हुए, थोड़ा घबराते हुए, सिद्धार्थ की बातों को याद करते हुए, वह व्योम के घर जा पहुंचा। व्योम के हाउस स्टाफ ने घर के हॉल में, अंश को इंतजार करने को कहा। और थोड़ी देर के बाद व्योम भी वहां आ गया।


व्योम :- (हॉल में घुसते हुए) "गुड मॉर्निंग अंशुमन जी!  सॉरी आपको थोड़ा इंतेज़ार करना पड़ा।"


अंश :- (खड़े होते हुए) "गुड मॉर्निंग सर! एंड इट्स ओके! नो प्रोब्लेम।"


व्योम :- "प्लीज मुझे सर मत कहिये! आप मुझे व्योम ही बोलिये, मुझे अच्छा लगेगा।"


अंश :- "ओके सर.....!! मतलब व्योम !!! ये फंक्शन की डिटेल की फ़ाइल है, जो आपने मंगवाई थी!!"


व्योम :- "ओके!!! चलिए!! हम इसे गाड़ी में डिस्कस कर लेते हैं। मुझे एक शूट के लिए फ़िल्म सिटी पहुंचना है, अगर हम यहाँ डिस्कस करेंगे, तो मैं लेट हो जाऊंगा।"


अंश :- "कोई दिक्कत नही है!!! मैं यह फ़ाइल यही छोड़ देता हूं, आपको जब समय मिले, आप इसे देख लीजियेगा।"


व्योम :- "फिक्र मत कीजिये अंशुमन जी! आपका सिर्फ 1:30 2:00 घंटे का समय ही मुझे चाहिए बस! फिर मेरा ड्राइवर आपको वापस, आपके आफिस छोड़ आएगा। ओके!!!! अब चलिए।"



      अंश के कुछ कहने से पहले ही, व्योम घर से निकल गया। और ना चाहते हुए भी, अंश को उसके साथ जाना ही पड़ा।



व्योम :- "लाइए!!! अंशुमन जी बताइए!!! क्या शेड्यूल है, आपके प्रोग्राम का??"



       अंश व्योम को फंक्शन की सारी डिटेल्स बताता है, लेकिन व्योम का ध्यान, अंश की बातों को सुनने से ज्यादा, अंश के ऊपर होता है। व्योम की नजरें, कभी अंश के गालों पर, आंखों पर, कभी उसके होठों पर, बाहों पर, कभी उसके सीने पर घूम रही होती हैं। अंश को भी व्योम की यह हरकत समझ आने लगती है। और वह थोड़ा असहज हो जाता है।



व्योम :- "क्या उम्र है आपकी अंशुमन जी?"


अंश :- "क्या??? 28!!"


व्योम :- "अरे! तो फिर तो तुम मुझसे छोटे हो। मैं 30 का हो जाऊंगा इस साल। तो मैं तुम्हे अंशुमन कह सकता हूँ, अगर तुम्हें बुरा ना लगे तो?"


अंश :- (असहजता से) "हाँ सर!! बिल्कुल कह सकते हो!"


व्योम :- "सर नही व्योम कहो मुझे। तो अंशुमन! मुंबई में फैमिली के साथ रहते हो??? वैसे तुम्हारी भाषा मुंबई की तो नही लगती।"


अंश :- "हाँ!! मैं यहाँ का नही हूँ। मैं ग्वालियर का......."


व्योम :- (अंश को बोलने से बीच में ही रोकते हुए) "क्या ग्वालियर???  अरे वाह!!! मैं भी भोपाल से बिलॉन्ग करता हूं। ग्वालियर में भी मेरे कई रिश्तेदार है। मेरा देखा हुआ है ग्वालियर, काफी अच्छा शहर है।"



     व्योम की बातें खत्म भी नहीं हुई होती, की फिल्म सिटी आ जाती है। और ड्राइवर गाड़ी रोक देता है। व्योम ने अंश को अपना मोबाइल थमाया और अपना मोबाइल नंबर उसमें सेव करने को कहा। अंश थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन वह ऐसा करने से मना भी तो नहीं कर सकता था। व्योम के साथ कोआर्डिनेशन का काम उसी को तो देखना था। अंश का नंबर लेकर उसे अलविदा कह, व्योम तो अपने काम पर चला गया, और ड्राइवर को बोलकर अंश को भी उसके ऑफिस ड्रॉप करवा दिया। कुछ ही देर में एक अनजान नंबर से, अंश को व्हाट्सएप पर कुछ फनी जोक्स आने लगे। उसने जब चेक किया तो यह व्योम का ही नंबर था। अंश ने तुरंत सिद्धार्थ को फोन कर सारी बात बताई।



सिद्धार्थ :- (फोन पर)  "यार तो तू परेशान क्यों हो रहा है!! मुझे यह नहीं समझ आ रहा?? तू पहली बार थोड़ी किसी ऐसे लड़के से मिल रहा, जो तेरी बॉडी को घूर रहा हो!!!"


अंश :- "यार बात वह नहीं है। क्या तूने नहीं सुना, इन सिलेब्रिटीज के बारे में??? यह लोग ऐसे ही लोगों का इस्तेमाल करते रहते हैं!!"


सिद्धार्थ :- "अरे तो वह कोई जबरदस्ती थोड़ी करेगा तेरे साथ। और करने की कोशिश करे तो मैंने जो कल बताया, वैसा ही करना उसके साथ। वैसे जब तूने उसके बारे में बताया, तो मैंने उसका टीवी सीरियल देखा। बहुत ही मस्त दिखता है यार वह तो, और शरीफ लगता है चेहरे से तो।"


अंश :- "हां अच्छा तो दिखता है। बातें भी ठीक ही करता है। और आज उसने बताया कि भोपाल का रहने वाला है। लेकिन यार उसकी हरकतें शरीफों वाली नहीं है।"


सिद्धार्थ :- "यार तू इतना सोच रहा है उसके बारे में जैसे तुझे शादी करनी है उसके साथ। अभी तेरा फंक्शन हो जाएगा, फिर थोड़ी मिलना है तुझे उससे। तो ज्यादा टेंशन मत ले, बस अपने काम पर ध्यान दें।"



      सिद्धार्थ से बात करके, अंश को थोड़ी तसल्ली मिली। हफ्ते भर बाद ही फंक्शन था, बस उसके बाद यह व्योम का किस्सा भी खत्म ही होना था। तो यही सोचकर अब अंश की परेशानी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी थी। लेकिन जब जब व्योम का कोई नया मैसेज मोबाइल पर आता था, तो एक परेशानी की शिकन अंश के माथे पर आ ही जाती थी। शाम को ऑफिस के बाद जब अंश अपने घर पहुंचा, तो कुछ ही देर बाद उसे व्योम का फोन आया। अंश ने कुछ देर सोचने के बाद, व्योम का फोन ना उठाना ही तय किया। और ऐसा उसने लगातार दो बार और आए फोन पर भी किया। लेकिन जब चौथी बार फिर से फोन बजा, तो अंश को ना चाहते हुए भी फोन उठाना ही पड़ा।



व्योम :- (फ़ोन पर) "अरे कहाँ बिजी हो अंशुमन?? कितने फ़ोन लगा चुका हूँ मैं।"


अंश :- "सॉरी सर!! फ़ोन साइलेंट मोड पर था, तो पता ही नही चला। आप बताइए!! कोई काम था???"


व्योम :- "यार कितनी बार बोलूं मुझे व्योम ही बुलाया करो। और हां एक जरूरी काम है, जल्दी से नीचे आ जाओ, मैं तुम्हारी बिल्डिंग के नीचे ही खड़ा हूं।"


अंश :- (हड़बड़ा कर) "क्या??  आप!!!  यहां!!! लेकिन..... आपको मेरा एड्रेस कैसे पता चला??"


व्योम :- "यार क्या फोन पर ही सारी बातें कर लोगे?? जल्दी नीचे आओ, मैं काफी समय से यहां तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।"



       इतना कहकर व्योम फोन काट देता है। अंश भी घबरा कर अपने फ्लैट की खिड़की से नीचे देखता है, तो व्योम की गाड़ी वहां नीचे ही खड़ी होती है। अब अंश थोड़ी टेंशन में आ जाता है। कि अगर वह व्योम के साथ चला गया तो, कहीं जो वह व्योम के बारे में सोच रहा है, वैसा ही ना हो। और अगर वह नहीं गया तो, कहीं व्योम यहां ऊपर उसके फ्लैट में ही ना आ जाए। अंश यह सब सोच ही रहा होता है, कि उसका फोन फिर से बजता है। और यह व्योम का ही कॉल होता है। अंश कॉल कट कर देता है, और घबराते हुए नीचे व्योम की गाड़ी के पास पहुंच जाता है। और उसने सिद्धार्थ के बताए अनुसार, अपने मोबाइल फोन पर वॉइस रिकॉर्डिंग चालू कर ली होती है। जब अंश गाड़ी के पास पहुंचता है, तो व्योम का ड्राइवर गाड़ी का पीछे वाला दरवाजा खोलकर, अंश को गाड़ी के अंदर बैठने का इशारा करता है। अंश अंदर बैठता है तो, व्योम मुस्कुरा कर अंश का स्वागत करता है। और गाड़ी वहां से आगे बढ़ जाती है।



अंश :- (गाड़ी में बैठे हुए व्योम को देखकर) "गुड इवनिंग सर!!! बताइए क्या काम था आपको??? और सर मेरा एड्रेस...."


व्योम :- (अंश को बीच में ही रोकते हुए) "प्लीज यार मुझे व्योम कहा करो बस ।और यार किसी को ढूंढना इतना भी मुश्किल नहीं है, बस सही जगह एक फोन करना होता है।"


    

      अंश समझ जाता है, कि उसका पता, व्योम को उसके ऑफिस से ही मिला होगा। और अंश के चेहरे की परेशानी, व्योम को साफ साफ नजर आने लगती है।



व्योम :- (अंश के कंधे पर हाथ रखते हुए) "चिंता मत करो! मुझे कोई काम नहीं है। वह तो मैं बस थोड़ा अकेला महसूस कर रहा था, और सुबह जब पता चला कि, तुम और मैं पास पास के ही शहरों से बिलॉन्ग करते हैं। तो लगा कि तुम्हारे साथ थोड़ा समय बिताना चाहिए। सुबह काम था, तो सुबह बिल्कुल समय नहीं मिला। अब जब फ्री हुआ तो, सबसे पहले तुम्हारा ही ख्याल आया। वैसे अगर तुम्हें कोई काम हो तो, कोई बात नही, मैं तुम्हें वापस वहीं छोड़ देता हूं।"



      अंश कहना तो यही चाहता था, कि उसे वापस उसके घर छोड़ दो। लेकिन इस ना का असर, उसकी नौकरी पर ना पड़े, इसलिए उसने बिना कुछ बोले, मुस्कुराकर बस अपना सर ना में हिला दिया।



व्योम :- (मुस्कुराकर) "ओके!! गुड!!! तो बताओ क्या हाल चाल हैं ग्वालियर के?? कितने समय से हो यहाँ मुम्बई में।"


अंश :- "बस कुछ महीने ही हुए हैं, यहां आए अभी तो।"


व्योम :- "कैसा लग रहा है यहां मुंबई में??? ग्वालियर की याद तो नहीं आती??"


अंश :- "घर की याद तो आती है सर। लेकिन यहां ज्यादा अच्छा लग रहा है मुझे।"


व्योम :- " फिर सर!!!  कहा ना यार सर मत बोला करो मुझे।"


अंश :- "ओके!! सॉरी!! आगे से ध्यान रखूंगा, व्योम!!!"


व्योम :- "Hmmmmmm.... !! गुड!!! वैसे अभी तो सब नया नया है, इसलिए सब अच्छा लग रहा होगा। लेकिन धीरे-धीरे बिल्कुल रास नहीं आएगा यह शहर तुम्हें। जब अकेलापन सताने लगेगा, तो मन करेगा, कि भाग जाओ यहां से। हां, अगर कोई प्यार करने वाला साथ हो, तो एक अलग बात है।"


अंश :- (मुस्कुराते हुए) "देखते हैं!!! फिलहाल तो यह अकेलापन मुझे काफी पसंद आ रहा है।"


व्योम :- "और तुम्हारी लव लाइफ!!!! वो कैसी चल रही है यहाँ??"


अंश :- "कुछ खास नही!! मैं सिंगल हूँ अभी तो।"


व्योम :- "ओके!!! मैं भी अभी सिंगल हूँ। लेकिन पहले मेरा एक बॉयफ्रेंड था यहाँ मुम्बई में।"



      व्योम के मुंह से यह बात सुनकर, अंश ने उसे थोड़ा आश्चर्यचकित होकर देखा।



व्योम :- "अरे इतना आश्चर्यचकित होने की जरूरत नहीं है। यहां मुंबई में तो यह बहुत ही नॉर्मल सी बात है। और हमारी इंडस्ट्री में तो और भी ज्यादा आम बात है। हां, बस हम मीडिया से बचकर रहते हैं। क्योंकि मीडिया में यह बात आने से, हमारी इमेज खराब हो सकती है। फिर हमारे कैरियर पर भी इसका असर पड़ सकता है।"


अंश :- "तो फिर आप यह सब मुझे क्यों बता रहे हो??"


व्योम :- "अरे तुम तो अपने से लगते हो। तुमसे यह बात बताने में कैसी शर्म!!!"


अंश :- "और मैंने यह बात किसी को बता दी तो??"


व्योम :- "इतने सालों से इस इंडस्ट्री में हूं, इंसानों को परखना सीख गया हूं। मैं जानता हूं, तुम ऐसे बंदे नहीं हो।"



        दोनों साथ में काफी देर मुंबई की सड़कों पे यहां वहां घूमते रहे। ग्वालियर, भोपाल और मुंबई की ढेरों बातें, दोनों ने आपस में सांझा की। व्योम ने डिनर के लिए अंश को किसी अच्छे रेस्टोरेंट मे साथ चलने को कहा। लेकिन अंश के मना करने के बाद, व्योम ने गाड़ी में ही चाइनीस फूड मंगवा लिया, और दोनों ने साथ में ही खाना खाया। कुछ देर बाद व्योम ने वापस अंश को उसकी बिल्डिंग के नीचे ड्रॉप कर दिया। व्योम से आज की मुलाकात ने, अंश के मन में बसी व्योम के लिए परेशानी, काफी हद तक खत्म कर दी थी। व्योम के आज के बर्ताव ने, अंश के मन में बनी खुद की छवि को ओझल कर दिया था। जहां आज शाम को व्योम से मिलते वक्त, अंश परेशान था। वही अब व्योम के घरवालों के बारे में, उसके मुंबई के स्ट्रगल और सक्सेस के बारे में, और उसकी पिछली लव लाइफ के बारे में जानने के बाद, अब काफी नॉर्मल महसूस कर रहा था। उसने अपने घर आकर सबसे पहले सिद्धार्थ को फोन कर, अभी की सारी बातें उसे बताई।


       अगले दिन भी जब व्योम के गुड मॉर्निंग के मैसेज का रिप्लाई अंश ने दिया, तो उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी। यह सब कल व्योम के साथ बिताए समय का ही नतीजा था। अब दोनों के बीच केवल फनी जोक्स के मैसेजेस ही नहीं हो रहे थे, बल्कि अब दोनों व्हाट्सएप पर घंटों चैटिंग कर रहे थे। और अब व्योम की बातों से भी, अंश को उसे सही से पहचानने का मौका मिल रहा था। अब अंश कि व्योम के प्रति सोच में, पहले के मुकाबले जमीन आसमान का अंतर आ चुका था। अंश की अब की सोच के मुताबिक, व्योम थोड़ा मुंहफट लेकिन केयरिंग नेचर का इंसान था। व्योम का पूरा नाम, व्योम कपूर नहीं बल्कि व्योम भार्गव था। जो कि उसने अपने पहले टीवी सीरियल के डायरेक्टर के कहने पर बदल लिया था। वह भोपाल के अरेरा कॉलोनी का रहने वाला था। भोपाल में बस उसके मम्मी पापा ही थे, वे दोनों सरकारी कर्मचारी थे। व्योम को एक्टिंग का शौक था। और वह हीरो बनने के लिए, भोपाल से, घर में बिना बताए भाग आया था। मुंबई में काफी धक्के खाने के बाद फिल्मों में तो नहीं, लेकिन टीवी सीरियल्स में अपना सपना पूरा करने का मौका उसे मिला। जिसके फलस्वरूप आज वो टीवी इंडस्ट्री का नामी ग्रामी एक्टर है। अब तक 2 सीरियस रिलेशनशिप में रह चुका है। और सेक्स ओरिएंटेशन से बायसेक्सुअल है। भोपाल में कॉलेज में एक गर्लफ्रेंड थी। जिसके साथ रिश्ता मुंबई आने की वजह से टूट गया था। और मुंबई में एक फैशन डिजाइनर के साथ रिलेशनशिप में रहा। उसने ही व्योम के टीवी इंडस्ट्री में कांटेक्ट बनाने में मदद की। लेकिन मीडिया में अपना नाम गे कम्युनिटी से जुड़ता देख, उसने व्योम से दूरियां बना ली। तब से ही व्योम सिंगल है, और एक अच्छे साथी की तलाश में है। यह सब बातें अंश को व्योम से इन 2 दिनों में जानने को मिली थी।



          कुछ ही दिनों में अंश के ऑफिस के फंक्शन का दिन भी आ गया। व्योम भी अपने तय समय पर, समारोह स्थल पर पहुंच गया। उस पूरी रात केवल अपनी परफॉर्मेस के समय के अलावा, व्योम ने अंश को खुद से दूर ही नहीं जाने दिया। पूरे समय कभी किसी काम में, तो कभी अपनी बातों में, अंश को अपने इर्द-गिर्द ही व्यस्त रखें रहा। स्टेज पर जब व्योम शर्टलेस होकर अपनी परफॉर्मेंस कर रहा था, तो व्योम को इस तरह नाचते हुए देख कर, अंश के मन में भी नए भाव जागने लगे। जो अंश अभी कुछ दिनों तक, व्योम द्वारा खुद के साथ दुर्व्यवहार से डर रहा था, आज व्योम को स्टेज पर, अर्धनग्न होकर डांस करते देख,  खुद ही उसका फायदा उठाना चाह रहा था। जब व्योम अपनी परफॉर्मेंस खत्म कर, वापस से अपने मेकअप रूम में गया। तो वहां उपस्थित अंश की बदली आंखों की चमक को देख कर, उसे 1 सेकंड नहीं लगा, अंश के मन के हाल को जानने में। और उसने तुरंत ही उस रूम में उपस्थित, अंश के अलावा, अपने स्टाफ को कोई ना कोई काम बता कर, वहां से बाहर भेज दिया। स्टाफ के जाते ही, व्योम अंश की ओर बढ़ा, और अंश कुछ समझ पाए उसके पहले ही, व्योम ने अपने होठों को अंश के होंठों से मिला दिया। अंश ने भी आगे बढ़कर इस काम क्रीड़ा में व्योम का साथ दिया। और दोनों ही उस बंद दरवाजे के पीछे, एक दूसरे के आगोश में खो गए।



       धीरे-धीरे दोनों के बीच का नया रिश्ता, नया रूप लेने लगा। दोनों प्यार के बंधन में गहराई से जुड़ते चले गए। जो अपनेपन, प्यार की तलाश व्योम को थी, वह तलाश अंश पर आकर खत्म हो चुकी थी। और अंश जिस मकसद से नए शहर में आया था, वह मकसद तो उसका पहले ही पूरा हो चुका था। लेकिन अकस्मात मिले इस नए रिश्ते को, अंश ने भी खुली बांहों से स्वीकार कर लिया था। अंश ने जब अपने इस बदले रिश्ते के बारे में, सिद्धार्थ को अवगत कराया, तो सिद्धार्थ ने अपनी खुशी का इजहार किया। लेकिन साथ ही साथ अंश को चेताया भी, कि वह ऐसा कुछ ना करें, जो वह पहले आदित्य के साथ कर चुका था। लेकिन अंश और व्योम के रिश्ते में ऐसी कोई बात थी ही नहीं। इस रिश्ते में व्योम की ज्यादा सहभागिता थी। व्योम दिन में समय निकालकर, अंश को फोन किया करता था। और व्हाट्सएप पर तो उन दोनों की चैटिंग, सारा दिन चला ही करती थी। रात को फ्री होने के बाद, व्योम सबकी नजरों से छुप छुपा कर, अंश से मिलने जरूर आता था। दोनों घंटों समय साथ गुजारा करते थे, और व्योम देर रात अपने घर वापस जाया करता था। वीकेंड पर अंश के ऑफिस की तो छुट्टी रहती ही थी, लेकिन जब कभी व्योम भी फ्री होता था, तो दोनों मुंबई से बाहर कहीं घूम आया करते थे। व्योम हर रोज कुछ ना कुछ गिफ्ट भी, अंश के लिए जरूर अपने साथ लाया करता था। और इन सब से कहीं ज्यादा, व्योम अंश का बहुत ख्याल भी रखता था, और बेशुमार प्यार भी करता था। धीरे-धीरे यह समय महीनों और महीनों से पूरे 1 साल में बदल गया।



       इस पूरे समय में अंश ने एक बार भी ग्वालियर जाने के बारे में नहीं सोचा था। पहले तो नए शहर, और 28 सालों में पहली बार अकेले रहने की एक्साइटमेंट, उसके बाद व्योम के साथ ने, कभी ग्वालियर की याद अंश को आने ही नहीं दी थी। लेकिन मम्मी पापा की जिद पर, अंश ने 3 दिन का ग्वालियर का प्लान बना ही लिया। व्योम इस ट्रिप से थोड़ा नाखुश था। उसका बस चले तो वह तो अंश को हमेशा अपने पास ही रखें और कभी खुद से दूर ना जाने दे। लेकिन अपने परिवार से दूर रहने के दर्द को बखूबी समझते हुए, उसने बिना अंश को बताए, उसके आने जाने के फ्लाइट के टिकट खुद ही बुक करवा दिए। यह बात अंश को बिल्कुल भी पसंद नहीं आई, और उसने व्योम को आगे से कभी फिर ऐसा कुछ भी करने से साफ इनकार कर दिया।


 

      ग्वालियर में आज भी सब कुछ वैसा ही था जैसा अंश साल भर पहले छोड़ कर गया था। वही लोग, वही माहौल, बस अब अंश  का बर्ताव इस माहौल के हिसाब से थोड़ा-सा बदल गया था। ग्वालियर में तो आज भी पड़ोस के घर में क्या हो रहा है, उनके बच्चे क्या कर रहे हैं, इस बात का जिक्र, खुद के पारिवारिक मुद्दों की तरह चर्चा का विषय बना हुआ था। घर के छोटे-छोटे निर्णयों के लिए घंटों विचार किआ जाता था। अंश की अब इन सब माहौल में रहने की आदत बिल्कुल ही छूट चुकी थी। ग्वालियर आए अभी अंश को ज्यादा समय नहीं हुआ था, लेकिन अपने ही घर वालों की सोच को देखकर, उसे उलझन होने लगी थी। और इसी उलझन से भागने के लिए, अंश जा पहुंचा सिद्धार्थ की दुकान पर। सिद्धार्थ ने अंश को देखते ही, दौड़कर अपने गले से लगा लिया, और अपनी नम आंखों से अंश का स्वागत किया। दोनों ने ही मुंबई और ग्वालियर की खैर खबरों का आदान प्रदान किया। अंश ने बड़ी ही प्रसन्नता के साथ, व्योम के बारे में भी सिद्धार्थ को अवगत कराया। सारा समय दोनों ने अपनी बातों में ही गुजार दिया। रात को अंश की मम्मी के फोन के साथ, दोनों की बातों का सिलसिला खत्म हुआ। अंश जब घर पहुंचा, तो वहां पहले से ही कुछ मेहमान, अंश के घर आने का इंतजार कर रहे थे। अंश के पापा ने उन सभी मेहमानों का परिचय अंश से कराया। और कुछ ही देर में उनकी बातों से, अंश को साफ-साफ समझ आने लगा, कि यह कोई साधारण मेहमान नहीं, बल्कि अंश के रिश्ते के लिए उसे देखने आए लड़की वाले हैं।



    आगे अंश और व्योम के जीवन मे क्या उथल पुथल मचाते है, यह मेहमान। क्या इस बार भी अंश के दिल को दर्द से गुजरना पड़ेगा?? क्या इस बार भी सिद्धार्थ अंश की कोई मदद कर पायेगा? और भी कई सवालों  के जवाब छुपे है, इस कहानी के आखिरी पार्ट में। जल्द ही इस कहानी का आखिरी पार्ट भी प्रस्तुत करूँगा। तब तक के लिए अपने विचार जरूर सांझा करे।













Shadi.Com Part - III

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