Sunday, February 7, 2021

क़सम - Final Part

Hello friends,

                       If you doesn't read the first and second part of this story than please read it first, than you will get easily be connected with this final part.



      समय पंछी के टूटे पंख सा धीरे धीरे हवा में बहता रहा, और साथ साथ ही रोहन और वेद का प्यार गहरा होता चला गया। इस कहानी में अब केवल रोहन और वेद ही अकेले नही थे, जिनका प्यार परवान चड़ रहा था, वेदिका भी अपने एकतरफा प्यार को अपने दिल की गहराइयों तक महसूस करने लगी थी। अब वो कई ऐसे काम भी करने लगी थी, जिससे वो वेद का ध्यान अपनी और खींच सके। अब वो रोज़ाना ही कुछ ना कुछ स्वादिस्ट खाना, कभी खुद या कभी अपनी माँ से बनवा कर सिर्फ वेद के लिए ही लाने लगी थी। कभी कभी कोई छोटा सा उपहार या फूलों का गुलदस्ता वेद को थमा दिया करती थी। जहां रोहन ये सब देख कर जल भुनता था, वहीं वेद पर इन सब का कोई असर नही था, लेकिन वो रोहन के चेहरे पर आने वाले भावों को देख कर हंसता जरूर था। धीरे धीरे यूँही समय बीता, और वेद ने 12वीं तो अच्छे अंकों से पास की ही, साथ ही साथ उसने AIPMT में भी अच्छी रैंक ला कर, ग्वालियर के ही GRMC में MBBS करने के लिए दाखिला भी ले लिया था। वेद के इतने अच्छे परिणाम के जश्न में उसके घरवालों ने एक छोटे से कार्यक्रम का आयोजन भी किआ।



वेदिका :- (रोहन से खुश होकर) "रोहन यार आज तू बस मुझे 5 मिनट वेद के साथ अकेले में दिलवा दे, मैं आज उसे पृपोज़ करना चाहती हूँ।"


रोहन :- (आँखे बड़ी करके) "तू पागल हो गयी है क्या??? मैंने कितनी बार कहा है तुझसे, की वो नही है तुझमे इंटरेस्टेड, तुझे समझ नही आता क्या??"


वेदिका :- "यार तुझसे जितना कह रही हूँ ना, तू बस उतना ही कर, मैं वेदिका हूँ, वेद की वेदिका, वो मुझे कभी मना नहीं कर पायेगा।"


रोहन :- (वहाँ से जाते हुए) "कोशिश करूंगा!!"


वेद :- (रोहन को उदास जाता देखकर, उसके पास आकर) "क्या हुआ???? अब तो मैंने जो वादा किया था, की नही जाऊंगा ग्वालियर से, वो भी पूरा किया, फिर भी उदास हो???"


रोहन :- "यार वेदिका ने मेरा दिमाग खराब किआ हुआ है।"


      वेद कुछ कह पाता इससे पहले ही उसे उसकी मम्मी ने आवाज़ लगाई। और वेद रोहन को 10 मिनट बाद ऊपर छत पर आने का बोलकर वहां से चला गया। 


वेदिका :- (रोहन के पास वापस आते हुए) "क्या बात हुई वेद से, मिलेगा वो मुझसे??"


रोहन :- "नहीं यार वेदिका!!! मैंने अभी उससे कोई बात नहीं कि है।" (वेदिका से तंग आकर रोहन वहां से जाने लगा)


वेदिका :- "अरे तो जा कहाँ रहा है??? वेद से बात कर पहले जाकर, फिर कहीं जाना।"


रोहन :- (खिसियाते हुए) "यार ऊपर बाथरूम जा रहा हूँ, जाऊं या नहीं???"


वेदिका :- "चल मैं भी चलती हूँ तेरे साथ, मैं वेद के रूम में चली जाऊंगी और तू वेद को वहीं भेज देना।"



      दोनों वेद के घर मे अंदर चले गए, वेदिका वेद के रूम में गयी और रोहन बाथरूम में। कुछ देर बाद वेद भी अपने घर की छत पर रोहन से मिलने के लिए गया। वेदिका ने वेद को ऊपर छत पर जाते हुए देखा, और वो भी उसके पीछे पीछे चली गयी। वेद ने जब छत पर अपने ठीक पीछे किसी की आहट सुनी, तो उसने सोचा कि ये रोहन ही होगा, और उसने I Love You कहते हुए पलट कर उसे गले लगा लिया। जैसे ही वेद ने उसे गले लगाया, उसे फौरन इल्म हुआ कि ये रोहन नही है और वो तुरंत ही पीछे हट गया। वेद ने जिसे I Love You कहकर गले लगाया था, वो कोई और नही वेदिका ही थी। वेदिका के वेद के मुँह से खुद के लिए I Love You सुनना तो जैसे सातवे आसमान पर पहुंचने के बराबर था। वेदिका की तो अब खुशी का कोई ठिकाना ही नही था। और वेदिका ने भी वक़्त ना गंवाते हुए फौरन ही वेद को I Love You Too कहते हुए उसके होंठों पर किस कर दिया और वेद को अपने गले से भी लगा लिया। और ये सब होते हुए, रोहन ने अपनी आँखों से देख भी लिया। रोहन को वहां देख कर वेद ने तुरंत ही खुद को वेदिका से दूर किया और रोहन के पास उसे समझाने के लिए पहुंचा।


वेद :- "रोहन ऐसा कुछ भी नही है जैसा यहाँ दिख रहा है।"


वेदिका :- (वेद और रोहन के पास आते हुए) "रोहन से डरने की कोई जरूरत नही वेद, इसे तो पहले से पता है कि मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। और ये हर बार यही कहता था कि तुम मुझसे प्यार नही करते, अब अच्छा हुआ कि इसने अपनी आँखों से देख लिया।"


वेद :- "ऐसा नहीं है वेदिका, मुझे लगा कि वहां......"



        लेकिन वेद कुछ कहने की वजाय खामोश हो गया। और वेद की उस खामोशी ने जहां रोहन के दिल को एक गहरा दर्द तो दिया ही, साथ ही साथ वेदिका के दिल मे वेद के लिए प्यार को गहरा भी कर दिया। रोहन वहां से बिना कुछ कहे, अपनी आँखों से निकलते आँसुओ को थामे अपने घर वापस लौट आया। और कुछ ही देर बाद वेद भी उसे मनाने उसके घर आ पहुंचा।



वेद :- "यार प्लीज रोहू, मुझे गलत मत समझ, मैं सिर्फ तुझसे ही प्यार करता हूँ, और वहां भी मुझे लगा कि तू ही है मेरे पीछे इसलिए मैंने I Love You बोला था। मैंने वेदिका के लिए नही कहा था।"


रोहन :- (आँखों मे आँसू लिए) "बात वेदिका की या मुझे तुम पर भरोसे की है ही नही वेद।"


वेद :- "तो फिर तू क्यों यहां आ गया और यहां बैठ कर आँसू बहा रहा है??"


रोहन :- "तुमने वेदिका को क्यों नही बोला कि तुम मुझे I Love You कहना चाहते थे???  क्या तुम्हें मुझसे शर्मिंदगी होती है??"


वेद :- "नहीं यार ऐसा कुछ भी नही है, वो तो मैं बस इसलिए चुप हो गया था, की अगर मैं वेदिका को अपने बारे में बता देता तो वो सब जगह ढिंढोरा पीट देती, और फिर उसके बाद कि सिचुएशन हम दोनों के लिए बिल्कुल भी अच्छी नही होती। तू जनता है रोहू, हमें अभी कुछ और समय सबसे छुप कर ही रहना होगा, वही हमारे लिए सही रहेगा। समय आनेपर मैं खुद सबको हमारे बारे में बताऊंगा।"


रोहन :- "मैं जानता हूँ तुम्हे वेद, वो समय तुम्हारे हिसाब से कभी नही आएगा। तुम आज की तरह ही हर वक़्त खामोश रहोगे। और ये दर्द मेरा दिल बार बार नही सह पायेगा।"


वेद :- "ऐसा बिल्कुल भी नहीं होगा रोहू। (रोहन के सर पर हाथ रखकर) मैं तेरी क़सम खाता हूं रोहू,मैं समय आने पर सबको हमारे बारे में बताने से बिल्कुल पीछे नही हटूंगा।"



    ये दूसरी क़सम थी जो वेद ने खाई थी। अब उसने अपनी इस क़सम को पूरा किया या नही, ये तो आपको आगे की कहानी में पता लग ही जायेगा। लेकिन उस दिन के बाद से रोहन और वेद के बीच मे थोड़ी सी दूरियां आ गयी थी, जो दोनों कबूलना नही चाहते थे। एक तो अब वेद कॉलेज में आ चुका था, तो उसकी समय सारणी बिल्कुल बदल चुकी थी, और उस नए बदलाव का असर उन दोनों के रिश्ते पर भी पड़ रहा था। वहीं दूसरी ओर, वेदिका ने भी अब वेद के बारे में बाते कर कर के रोहन को परेशान कर रखा था। जिसकी वजह से रोहन भी अब वेद के बारे में कम ही सोचना पसंद करता था। और अपने आप को अपनी पढ़ाई में ही उलझाए रखता था। 12वीं के साथ साथ वो AIPMT की तैयारी भी कर रहा था, आखिर उसे भी तो वेद के साथ GRMC में अपना दाखिला करवाना था। इन सब के बीच मे, रोहन और वेद प्रत्येक रविवार को, सारा दिन साथ ही बिताया करते थे। कभी शहर में, कभी शहर के आस पास घूम फिर आया करते थे। दोनों का रिश्ता छोटे मोटे मनमुटावों के साथ अच्छे से फलफूल भी रहा था। लेकिन दोनों के रिश्ते में एक बड़ी उथल पुथल तब आयी, जब वेद की दादी की तबियत अचानक खराब हो गयी। और उन्होंने ज़िद पकड़ ली कि अब तो वो अपने पोते की बहू की शक्ल देखेंगी तभी इस दुनिया से मुक्ति लेंगी।



      वेद के लाख समझाने के बाद भी उसके घरवालों ने उसकी एक बात ना सुनी, बल्कि वेद को ही इस बात पर राज़ी करवालिया की अभी बस इंगेजमेंट कर लेते हैं, और शादी जब उसकी पढ़ाई और नौकरी हो जाएगी, उसके बाद ही करवाएंगे। जब रोहन तक ये बात पहुंची, तो उसके लिए तो ये सब किसी बड़े सदमे से कम नही था।



वेद :- "रोहू प्लीज मेरी बात समझने की कोशिश कर यार!!! मेरे पास कोई और रास्ता ही नही बचा था, मैं आखिर क्या करता?"


रोहन :- "तुम उन्हें हमारे बारे में बता सकते थे, तुम अपने बारे में बता सकते थे, लेकिन तुम किसी लड़की से शादी करने के लिए तैयार कैसे हो गए वेद???"


वेद :- "यार बात शादी तक नही पहुँचेगी प्लीज् मेरा भरोसा करो!!'


रोहन :- "कैसे करूँ तुम्हारा भरोसा??? कोई वजह तो हो तुम पर भरोसा करने की???"


वेद :- "रोहू मैं जानता हूँ कि इस वक़्त मैंने ही तेरा दिल दुखाया है, और मैं ही तुझे ख़ुद पर भरोसा करने के लिए भी बोल रहा हूँ। लेकिन तू बस अभी मेरे प्यार पर भरोसा करले और कुछ समय के लिए अपनी आँखें बंद करले। जैसे ही मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊंगा, फिर तू जैसा कहेगा, मैं वैसा ही करूँगा। लेकिन अभी हम इस लायक नहीं है, की हम अपने घरवालों को अपने मन की बात बता सके। अभी के लिए जो मैं कर रहा हूँ, वही सही है।"


रोहन :- "और तुमने जो मुझे कसमें दीं थीं उनका क्या??"


वेद :- "मैं अपनी कोई क़सम नहीं तोड़ रहा हूँ रोहू, मैं तुझसे ही प्यार करता हूँ और हमेशा तुझसे ही करता रहूंगा। और मैं समय आने पर अपने रिश्ते के बारे में सबको खुद ही बता भी दूंगा। और ये इंगेजमेंट तो बस एक दिखावे के लिए है, इससे ज्यादा कुछ नही।"



      वेद ने अभी तो रोहन को समझा दिया था, और वेद से बात करके रोहन का भी कुछ मन हल्का हो गया था। लेकिन शायद ये तूफान के आने से पहले वाली शांति महज़ थी। समय दोनों के ही जीवन मे जो बदलाव लाने वाला था, इसका अंदाजा दोनों को ही नही था। जिस बदलाव की नींव, वेद की दादी की ज़िद से पड़ चुकी थी, उस नींव को मजबूत किआ, इंगेजमेंट रिंग की खरीददारी ने। रोहन के बार बार मना करने के बाद भी वेद उसे अपने साथ जबरदस्ती सराफा बाज़ार ले ही आया, इंगेजमेंट रिंग खरीदने के लिए। वहां पहले से ही वेद की मम्मी और वेदिका मौजूद थी। जब रोहन ने वेदिका के वहां उपस्थित होने का कारण वेद से पूछा। तब उसे मालूम हुआ कि वेदिका  ही वो लड़की है जिससे वेद की इंगेजमेंट तय की गई है। और वेद की मम्मी की बाते सुनकर तो जैसे रोहन के तन बदन में आग ही लग गयी थी।


वेद की मम्मी :- "हमे तो अपने वेद की पसंद पर बहुत नाज़ है, वरना इतनी जल्दबाज़ी में हम पता नही वेद के लिए कोई अच्छी लड़की ढूंड भी पाते या नही। वो तो अच्छा हुआ कि वेद ने अपने मन की बात हमें बताई, और फिर वेद की पसंद हमें कैसे पसंद ना आती।"



      ये सब सुनकर जहां वेदिका शर्म से लाल हुई जा रही थी, और वेद रोहन को देख कर मंद मंद मुस्कुरा रहा था, और वहीं रोहन का ये सब सुनकर इतना बुरा हाल था, की उसका मन तो कर रहा था कि वो वेद और वेदिका दोनों के बाल ही नोच डाले। खैर  फिर सभी ने अँगूठी देखना शुरू किया। और वहीं वेद ने धीरे से एक पतली सी अँगूठी उठाई, और चुपके से रोहन की और बड़ाई। लेकिन रोहन तो अभी भी वेद की मम्मी की बातों से आग बबूला हुआ बैठा था, तो उसने वेद का हाँथ झटक दिया। वेद समझ गया था कि रोहन फिरसे थोड़ा सा गुस्सा है। इस बार उसने रोहन का हाँथ का पकड़ा और उसकी बाएं हाँथ की अनामिका में वह अँगूठी पहना दी और धीरे से उसके कान में कहा।


वेद :- "मम्मी की बात को ज्यादा दिल पर मत लो, अगर मैं इन लोगों को वेदिका के बारे में नही बताता तो ये लोग पता नहीं किसे ढूढ़ कर ले आते। और वेदिका को तो मैं बचपन से जनता हूँ, तो उसे समझाना मेरे लिए ज्यादा आसान होगा, बस इसलिए मैंने उसका नाम इन लोगों को बता दिया। अब करने दो इन लोगों को अपने मन का, मुझे तो जिसे अँगूठी पहनानी थी, उसे पहना दी।"


    अपनी बात पूरी करके वेद ने चुपके से ही रोहन के अँगूठी पहनाए वाले हाँथ को चूम भी लिया। वेद की इस हरकत ने जहां रोहन के चेहरे पर एक मुस्कान ला दी थी, वहीं वेद की मम्मी ने भी ये सब होते देख लिया था। और बस यही वो अंश था, जो रोहन और वेद के जीवन के बदलते समय रूपी हवन में आखिरी आहुति का काम करने वाला था। कुछ देर बाद ही अँगूठी की खरीददारी के बाद, वेद की मम्मी ने वेद और वेदिका को इंगेजमेंट के कपड़े खरीदने के लिए साथ मे भेज दिया, और ख़ुद रोहन को लेकर वापस घर लौट आईं। उन्होंने घर वापस आकर, रोहन के मम्मी पापा को घर के बाहर बुलाया, और भरे मोहल्ले में उनको खरी खोटी सुनाना शुरू कर दिया। जब रोहन के घरवालों ने उनसे इस बदतमीज़ी का कारण जानने की कोशिश की तो उन्होंने उनलोगों की और बेज्जती करना शुरू कर दी।


वेद की मम्मी :- "अरे तुम छोटी जाती वालों की आदत को अच्छे से जानती हूँ मैं, पहले तो ये सब काम अपने घर की लड़कियों से करवाते थे तुम लोग, अब लड़कों से भी करवाने शुरू कर दिए। तुमने अपने लड़के को यही सीखा पड़ा कर भेजा था मेरे घर, की मेरे घर के इकलौते बेटे को फंसा सको। उसे लूट सको। तो देखो शुरुआत करदी है तुम्हारे लड़के ने। आज ये अँगूठी लूटी है मेरे बेटे से कल को ना जाने क्या क्या लूटोगे।"


रोहन की मम्मी :- "बहनजी आपसे कोई गलतफहमी हो गयी होगी, दोनों बच्चे बचपन से साथ खेलते आये हैं, हम वेद को अपने बच्चे जैसा ही मानते है।"


वेद की मम्मी :- (रोहन का हाँथ पकड़ के खिंचते हुए) "तू बताएगा या मैं बताऊं तेरी माँ को तेरी करतूतें। जितना तुम लोग दिखावा कर रहे हो ना, इतने शरीफ़ हो नहीं तुम लोग। घिन आ रही मुझे तो ये सोचते हुए भी की ये सब काम तुम अपने लड़के से करवा रही हो।"


रोहन :- (आँखों मे आँसू लिए) "आँटी आप गलत समझ रही हैं। ये अँगूठी वेद ने खुद पहनाई है मुझे।"


वेद की मम्मी :- (रोहन के गाल पर तमाचा मारते हुए) "मुझे तो सब पता है, अपने माँ बाप को बता की क्यों पहनाई है उसने तुझे ये अँगूठी।"


रोहन :- (रोते हुए) "मैं और वेद प्यार करते हैं एक दूसरे से।"


वेद की मम्मी :- (रोहन को मारते हुए) "सुन लिया अपने लाडले के मुँह से, अब ये नया तरीका निकाला है अमीर घर के लड़कों को फसाने का तुम लोगों ने। (रोहन के मम्मी पापा को उंगली दिखाते हुए) अगर मेरे बेटे की शादी में या उसकी इंगेजमेंट या उसके जीवन मे तुम्हारे इस लड़के का साया भी पड़ा ना, तो कहां गायब करवाउंगी इसे, सारी उम्र नहीं खोज पाओगे। इसलिए अच्छा होगा कि इसे लेके खुद ही यहां से चले जाओ। तुम जैसे नीच लोगों की इस शरीफ़ मोहल्ले में रहने की जगह भी नही है। (उन्होंने रोहन के हाँथ से वो अँगूठी उतारी और उसे धक्का देकर वहां से चली गईं।)"



    वेद की मम्मी द्वारा की गई इस बेज्जती का रोहन के मम्मी पापा पर बहुत ही गहरा असर पड़ा था। वो लोग ज्यादा पैसे वाले तो नही थे, लेकिन अपनी मेहनत के बल पर पुरानी बस्ती के छोटे से घर को छोड़कर, इस कॉलोनी में घर खरीदा था। चैन और इज्जत के साथ अपनी बसर कर रहे थे, और बस अपने बेटे को शान से शहर का एक अच्छा डॉक्टर बनता देखना उनका एक सपना मात्र था। लेकिन आज की इस घटना ने उस सपने तक चलने को तो छोड़ो, सहारे की इज्ज़त की बैसाखी को भी तोड़ दिया था। रोहन की मम्मी रोहन को घर के अंदर लेकर गईं और उससे पूछा।


रोहन की मम्मी :- "ये सब क्या सुनने को मिला हमे रोहन??"


रोहन :- (रोते हुए) "I am sorry मम्मी, लेकिन मैं और वेद सच मे एक दूसरे से प्यार करते हैं।"


रोहन की मम्मी :- "कैसा प्यार रोहन??? तुम दोनों लड़के हो??"


रोहन :- "मम्मी हम दोनों गे हैं। और काफी समय पहले से एक दूसरे को चाहते हैं।"


रोहन की मम्मी :- "वो अपनी पसंद की लड़की से शादी करने जा रहा है। और तुम उसे गे कह रहे हो?"


रोहन :- "नहीं मम्मी वो तो बस दिखावा कर रहा है, वो मुझसे ही प्यार करता है।"


रोहन की मम्मी :- (अपने माथे पर हाथ पीटते हुए) "उसकी शादी दिखावा है, और उसकी मम्मी ने जो अभी सारे मोहल्ले के सामने हमारी नाक काट दी वो क्या है फिर???"


रोहन :- "मम्मी मुझे एक मौका दो, मैं अभी वेद से बात करके सब सही करने की कोशिश करता हूँ।"


रोहन की मम्मी :- (रोहन को रोकते हुए) "कहीं जाने की जरूरत नहीं है अब तुम्हें। जितनी हमारी शान बढ़ानी थी तुम बड़ा चुके हो। अब उस वेद के पीछे जाकर उसकी माँ को फिरसे मौका देने की कोई जरूरत नही, की वो फिरसे सबके सामने हमे जलील करे। (रोहन के पापा से बोलते हुए) आप आज ही इंतेज़ाम कीजिये की हम अपने पुराने घर जा सके, अब इन मोहल्ले वालों से नज़रें ना मिलाई जाएंगी हमसे।"


रोहन :- "मम्मी प्लीज् मेरा विश्वास करो, वेद आँटी को समझाएगा, वो खुद आकर आपसे माफ़ी मांगेगी।"


रोहन के पापा :- (रोहन के आँसू पोंछते हुए) "बेटा जो लड़का अपने घरवालों को अपने प्यार के बारे में नही बता सकता, गे होकर भी एक लड़की से शादी करने को तैयार हो गया, तुझे लगता है कि वो अपने घरवालों से तेरे लिए लड़ेगा???"


रोहन :- "नहीं पापा, मुझे वेद पर भरोसा है, वो मेरा साथ कभी नही छोड़ेगा। (अपनी मम्मी के हाँथों को पकड़ते हुए) मम्मी उसने भगवान के सामने मेरे सर पर हाँथ रख कर क़सम खाई की वो हमेशा मुझसे प्यार करेगा।"


रोहन की मम्मी :- "तुम लोग अभी बच्चे हो रोहन, और ये सब तुम लोगों का बचपना। लेकिन जो आज हमारे साथ हुआ है, वो कोई बचपना नही है जिसे हम भुला दें। इस अपमान के साथ जीने से अच्छा तो हम मर जाए।"


रोहन :- (अपनी मम्मी के आँसू पोंछते हुए) "नहीं मम्मी ऐसी बातें मत कीजिये। देखिएगा जब वेद को ये सब पता चलेगा तो वो सब ठीक कर देगा।"


रोहन की मम्मी :- "रोहन क्या तू बस मेरी एक बात मानेगा??? उस वेद से दूर रह बस।"


रोहन :- "मम्मी मैं उससे प्यार करता हूँ, और आज से नहीं, जबसे मैंने होश संभाला है बस उसी को चाहता हूँ, मैं उसके बगैर नही रह सकता। आप मेरा विश्वास करो, मैं एक बार वेद से बात करलूँ, फिर वो खुद ये सब सही कर देगा।"


रोहन की मम्मी :- "तू कब समझेगा, अगर वो तुझसे प्यार करता, तो जैसे तू बिना हिचके अपने प्यार के बारे में बता रहा है, वो भी बताता। लेकिन उसने एक लड़की से शादी करना चुना है तुझे नही।"


रोहन :- "मम्मी वो तो बस उसका दिखावा है, इसीलिए तो उसने मुझे आज ही वो अँगूठी पहनाई थी....."


रोहन की मम्मी :- (रोहन को बीच मे रोकते हुए) "बस..... मुझे कुछ और नही सुनना। तुझे मेरी क़सम है जो तूने आजके बाद वेद के पास जाने के बारे में सोचा भी। अगर मैंने तुझे उसके साथ देख लिया ना, तो तू मेरा मरा मुँह देखेगा।"



      अब किसी के लिए भी प्यार की क़सम के आगे उसकी माँ की दी क़सम की ही जगह होगी। और वही हमारे रोहन के साथ भी हुआ। उसने भी अपनी माँ की दी क़सम को ही मानना जरूरी समझा। और बिना वेद से मिले वो मोहल्ला और फिर कुछ दिनों बाद वो शहर भी छोड़ दिया। और फिर कभी उसने ग्वालियर शहर की ओर पलट कर नही देखा। ना ही कभी वेद के बारे में जानने की कोशिश की। वेद को जब इस सब के बारे में पता चला तो पहले तो उसे अपनी मम्मी पर ही गुस्सा आता रहा, और वो अपनी मम्मी को ही रोहन से दूर होने का कसूरवार मानता रहा। और बहुत कोशिशों के बाद, रोहन और उसके परिवार का पुराना पता खोज निकाला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रोहन अब वो पुराना घर भी छोड़ कर जा चुका था, और वेद की कई मिन्नतों का असर, रोहन के मम्मी पापा पर बिल्कुल भी नहीं पड़ा, और उनलोगों ने रोहन की जानकारी कभी भी वेद को नही लगने दी। धीरे धीरे समय गुजरने के साथ अब वेद रोहन से जुदा होने की वज़ह को अपनी मम्मी के साथ साथ, रोहन को भी मानने लगा, की रोहन ने उसके प्यार पर भरोसे की वजह उससे दूर हो जाने को ही सही माना। यही वो महज़ एक क़सम थी जिसने दो प्यार करने वालों को एक दूसरे से दूर तो किआ था, लेकिन कोई भी क़सम किसी के लिए पनपे प्यार को कैसे खत्म कर सकती है। जैसा कि वेद के पास से मिले, रोहन के द्वारा दिये गए पर्स, और उस अँगूठी ने साफ साफ दिखा दिया था, की भले ही अब वेद रोहन से दूर है, भले ही वो रोहन को भी इस जुदाई के लिए कसूरवार मानता है, लेकिन उसका रोहन के लिए प्यार इन सब से कहीं ऊपर भी है, और किसी क़सम का मौहताज भी नहीं है।



     अब उधर मुम्बई में वेद के मम्मी पापा, वेदिका और दिव्यांश उस हॉस्पिटल में पहुंच चुके थे, जहाँ सभी वेद के ऑपरेशन के बाद होश में आने का इंतज़ार कर रहे थे। वेद अभी भी ICU में ही डॉक्टरों की निगरानी में था, और कुछ ही समय बाद उसे होश भी आने लगा।



ICU नर्स :- "वेद सारस्वत को होश आया गया है, आप में से कोई एक अभी मेरे साथ चल कर उनसे मिल सकता है।"


वेदिका :- "माँ आप जाइए, पहले आप मिल आइए, फिर हम लोग चले जायेंगे।"


ICU नर्स :- "वो किसी रोहू का नाम ले रहे थे नींद में, तो अगर पहले रोहू उनसे मिलले तो ज्यादा अच्छा रहेगा, बाकी आपकी मर्जी।"


वेदिका :- "आपने कुछ गलत सुना होगा, रोहू तो उनके परिवार में किसी का भी नाम नहीं है। माँ आप ही जाइए।"



      वेद की माँ जब वेद को देखने पहुँची, तो अपने इकलौते बेटे को यूँ पट्टियों में, इतनी सारी मशीनों के साथ लेटा हुआ देख पाना, उनके लिए बहुत ही कठिन था। और वो भी तब, जब 2 सालों से उनका वही बेटा, ना जाने किस बात पर नाराज़ होकर उनकी आँखों से दूर चला गया था। जिसके वापस लौट आने की उन्होंने कई मन्नतें भी मानी थी, और कई देवी देवताओं की भी पूजा अर्चना की थी, लेकिन उसी बेटे को इस तरह से वापस पाने पर उन्हें खुशी भी थी, और दुख भी। जब वे वेद के नज़दीक पहुँची तो उन्होंने ने भी वेद की मुँह से बार बार आती एक आवाज़ को गौर से सुना.... "रोहू...." "रोहू...." "रोहू..." उनके लिए ये अंदाजा लगाना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं था कि कहीं ये रोहू वही रोहन तो नहीं। जिसको सालों पहले उन्होंने वेद की ज़िंदगी से बाहर निकाल फेंका था, और कहीं यही तो वो कारण नहीं, जिसकी वजह से उनका अपना बेटा 2 सालों से अपने ही घर से गायब था। इन्हीं सब अंदाजों के बीच वेद की मम्मी के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी, जब वेद ने अपनी आँखें खोली। वेद ने इधर उधर देखा और बोलने लगा।


वेद :- (बिस्तर से उठने की नाकाम कोशिश करते हुए) "रोहू..... रोहू..... रोहू....."


वेद की मम्मी :- (वेद को बिस्तर पर लिटाते हुए) "नहीं है रोहन यहां बेटा, देख मैं हूँ, तेरी मम्मी!!"


वेद :- "नहीं मम्मी मैने देखा है उसे, वही था। आखिरकार मुझे मिल गया वो। (अपनी मम्मी को देखते हुए, फिर अपने आस पास, अपने हाँथ, पैरों, और सर पर बंधी पट्टी को छूते हुए) आप यहां कैसे आयी, और ये सब क्या है???"


वेद की मम्मी :- "तेरा एक्सीडेंट हुआ था बेटा, और तेरा एक छोटा सा ओपरेशन भी हुआ है। तुझे अभी आराम करना चाहिए, हम बाद में करेंगे ये सब बातें। सबसे पहले तेरा ठीक होना जरूरी है ना।"


वेद :- (कुछ सोचते हुए) "एक्सीडेंट!!!! हाँ मुझे याद है, रोहू ने ही मुझे गाड़ी से निकाला था। कहाँ है वो!!! रोहू..... रोहू..... रोहू.... (चिल्लाते हुए)"


ICU नर्स :- (वेद को चिल्लाता देख वहां आते हुए) "मैंने आपसे कहा था ना कि पहले रोहू को ही भेजिए इनके पास। (वेद को संभालते हुए) सर आप लेट जाइए और चिल्लाईये नहीं, आपको अभी आराम की जरूरत है।"


वेद :- (नर्स की बात सुनकर) "रोहू बाहर है क्या नर्स??? आप उसे भेजिए ना मेरे पास!! मुझे पता है वो बाहर ही होगा, उसने ही तो मुझे एक्सीडेंट के बाद गाड़ी से निकाला था। आप भेजिए ना उसे।"


ICU नर्स :- "सर अभी तो ऐसा कोई व्यक्ति बाहर नहीं है, मैं कोशिश करती हूं उन्हें ढूढने की, तब तक आप आराम कीजिये। माताजी अब आप भी बाहर आ जाइये, इन्हें आराम करने दीजिए। 



     नर्स वेद की मम्मी को वहां से बाहर ले जाती है। और वेद की मम्मी की आँखों मे आँसू के साथ साथ चेहरे पर एक मायूसी भी होती है। वो वेद की रोहन के लिए ऐसी तड़प को देखकर अचंभित भी थीं, और खुद पर खुद ही के द्वारा लिए गए फैसले के लिए आक्रोशित भी। वेद की रोहन को देखने की ये ललक उन्हें ये जताने के लिए काफी थी, की उन्होंने जो रोहन और उसके परिवार के साथ इतने सालों पहले किआ, वही फैसला उनके बेटे की 2 सालों से घर से गायब होने की वजह बना था। अब उनके सामने वेद के पिछले कुछ सालों के रूखे व्यहवार का कारण एक दम साफ था। क्यों वेद कुछ सालोँ से इतना उखड़ा हुआ, इतना बेचैन, इतना परेशान रहता था। इसकी वजह बस रोहन का उससे दूर होना ही था। और उसी दूरी से व्यथित होकर, 2 सालों से वेद ने ग्वालियर शहर भी छोड़ दिया था। अब वेद की मम्मी को रोहन की उस दिन की कही बात साफ साफ सुनाई दे रही थी, "हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। हम एक दूसरे के बिना नहीं रह पाएंगे।" अब वेद की हालत देख कर उन्हें खुद पर शर्म भी आ रही थी और गुस्सा भी। एक माँ होते हुए, अपने इकलौते बेटे को खुशियों से भरा संसार देने के वजह, उन्होंने अपने ही बेटे के जीवन मे ये वियोग लिख दिया था। जब वे ICU के बाहर आई, तो वेद के पापा ने उनसे पूछा कि "वेद ठीक तो है ना??" तो वे उनके गले लगकर फुट फुट कर रोने लगीं।


वेद की मम्मी :- "इस सब की वजह मैं हूँ सारस्वत जी! मैंने ही सब जानते बूझते हुए उन दोनों को अलग कर दिया था। मैंने ही सब देखते हुए अपनी आँखें बंद करलीं थीं। और अपने बेटे को ना समझने की गलती मैंने कि, और इसका दोष मैने रोहन पर लगा कर, उन दोनों को अलग कर दिया। दोनों को जुदा करने का पाप मैंने ही किआ है सारस्वत जी!!! उसकी सज़ा भी मुझे मिल रही है। 2 सालों से मेरा बेटा मुझसे दूर है, और जब आज वो मुझसे मिला है, तो वो मेरी शक्ल तक नही देखना चाहता। मैं एक बुरी माँ साबित हो गयी आज सारस्वत जी!! मुझसे गलती हो गयी।"



     वेद की मम्मी को रोता देख, और उनकी बातें सुन, वेदिका को भी अब कुछ कुछ पुरानी यादें आने लगीं थीं। की क्यों रोहन और वेद हमेशा साथ ही रहा करते थे, क्यों रोहन हमेशा यही कहा करता था कि वेद उससे प्यार नही करता, क्यों वेद ने बस एक बार I Love You कहने के बाद दोबारा कभी भी अपने प्यार का इज़हार नहीं किया, क्यों वेद रोहन के चले जाने के बाद से ही उदास और मायूस सा रहता था, और क्यों वेद पिछले 2 सालों से ग्वालियर शहर से दूर था। अब वेदिका को भी अपने कई सवालों के जवाब मिल चुके थे। तभी वहां हॉस्पिटल स्टाफ़ का एक आदमी आया, और उनमें से किसी एक को कैश काउंटर पर जाकर कुछ जरूरी कागज पर दस्तखत करने और कुछ जरूरी पैसे जमा करने को बोलकर चला गया। वेद के मम्मी पापा की हालत को देखते हुए, वेदिका और दिव्यांश कैश काउंटर की ओर चले गए। वहां जाकर, वेदिका ने बतौर वेद की मँगेतर, सभी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए, और हॉस्पिटल स्टाफ़ द्वारा बताए गए रुपये भी वहां जमा किये। जब वे लोग वहां से वापस जाने लगे, तो वहां के स्टाफ़ ने वेदिका को वो सभी सामान लौटाया जो वेद के साथ ही इस हॉस्पिटल में आया था। वेदिका ने सभी सामान को देखा, और वो पर्स और एक अँगूठी जो हमेशा वेद अपने पास ही रखता था, वेदिका वो देखकर पहचान गयी कि ये सब वेद का ही सामान है। वेदिका ने लेकिन जब उस पर्स को खोला तो उसमें हमेशा से लगी एक तस्वीर ग़ायब थी। और जितना वेदिका वेद को समझ पाई थी, तो उसके लिए वो तस्वीर बहुत ही ज्यादा ख़ास थी, और अब वो उस तस्वीर के इतने ख़ास होने की वजह भी जान चुकी थी। उसने तुरंत ही उस स्टाफ़ से उस गायब तस्वीर के बारे में पूछा, तो स्टाफ़ की तरफ से उसे यही जवाब मिला कि मरीज के साथ उन्हें बस यही सामान मिला था। तभी वेदिका की नज़र वहां लगे स्टाफ ड्यूटी बोर्ड पर गयी, और वो समझ चुकी थी कि अब उसे क्या करना है। उसने वो सभी सामान दिव्यांश को थमाया, और उसे वेद के मम्मी पापा के पास जाने को कहा। और खुद चल दी जनरल वार्ड 5 की ओर, जहां आज इंचार्ज डॉक्टर रोहन परसेडिया था, जैसा कि उसने स्टाफ़ ड्यूटी बोर्ड पर पड़ा था। जब वो उस जनरल वार्ड में पहुँची तो उसका अंदाजा एक दम सही निकला,  ये वही रोहन, वेद का रोहू ही था, जिसकी वजह से ये सब वेदिका को सहना पड़ रहा था। रोहन ने जब वेदिका को अपने सामने देखा, तो उसे समझ ही नही आ रहा था कि वह कैसी प्रतिक्रिया दे, लेकिन रोहन को कुछ कहने की जरूरत ही नही पड़ी, और वेदिका ने आगे बड़ कर, रोहन को एक जोर से थप्पड़ उसके गाल पर दे मारा।



वेदिका :- (गुस्से में) "वेद से पहले तू मेरा दोस्त था रोहन, मैने तुझे अपना सबसे अच्छा दोस्त माना था, मैंने तुझे अपने मन की हर वो बात बताई थी, जो मैंने अपने मम्मी पापा भाई तक को नही बताई कभी। और तूने ऐसा किआ मेरे साथ।"


रोहन :- (आँखों में आँसू लिए, और अपने गाल पर हाँथ रखे हुए) "मैं क्या बोलता तुझे वेदिका???"


वेदिका :- "यही की तुम और वेद प्यार करते हो एक दूसरे से, और मैं तुम दोनों के बीच आ रही हूँ। तूने मुझे कुछ कहे बिना ही ग्वालियर और वेद को भी छोड़ दिया। तुझे कम से कम एक बार वेद के बारे में तो सोचना चाहिए था ना, वो कैसे रहा है इतने सालों तेरे बिना रोहन। तूने किसी का नहीं, लेकिन वेद का ही दिल तोड़ दिया है। देख उसकी हालत चल कर वो आज भी बस तेरा ही नाम पुकार रहा है, उसे बस तुझसे ही मिलना है। (रोहन का हाँथ पकड़ कर खिंचते हुए) तू चल मेरे साथ अभी बस।"


रोहन :- (वेदिका को रोकते हुए) "मैं नहीं जा सकता वेदिका उसके पास।"


वेदिका :- (रोहन की ओर देखते हुए) "क्यों???? क्यों नहीं जा सकता तू??? क्या हुआ है ऐसा तुम दोनों के बीच जो सालों से तू घर वापस नहीं आया, और पिछले 2 सालों से वेद भी ग्वालियर से दूर है। आखिर क्या चल रहा है तुम दोनों के बीच ये सब??"


रोहन :- (आँखों में आँसू लिए) "क्या बताऊँ मैं तुझे वेदिका, जब वेद की मम्मी ने सभी के सामने मेरे और वेद के रिश्ते पर सवाल उठाए, और मेरे मम्मी पापा की बेज्जती की, तो मेरी मम्मी ने मुझे वेद से दूर रहने की क़सम दी थी, अब मैं अपनी मम्मी की क़सम कैसे तोड़ू।"


वेदिका :- "क़सम!!! बस एक क़सम के लिए तूने वेद को छोड़ दिया?? अपने प्यार को छोड़ दिया?? अपना शहर, अपनी सारी खुशियां छोड़ दीं??? तू ये कैसे कर सकता है रोहन? वेद वहां तड़प रहा है तेरे लिए।"


रोहन :- "मैं नहीं जा सकता वेदिका!!!"


वेदिका :- (गुस्से से) "ठीक है, तू अपनी क़सम निभा, मैं वेद को संभालती हूँ।"



     इतना कह कर वेदिका गुस्से से वहां से चली जाती है। और रोहन बस रोते हुए, अपनी माँ के द्वारा दी गयी क़सम को याद करके, रोते बिलखते वेदिका को वहां से जाते हुए देखता रह जाता है। कुछ देर बाद उससे रहा नहीं जाता, और वो वेद के ICU इंचार्ज को फ़ोन करके वेद का हाल जनता है। तो ICU इंचार्ज उसे बताता है कि, वेद बहुत बेचैन है, और बार बार किसी रोहू को बुला रहा है, अगर वो शांत नहीं हुआ तो उन्हें उसे नींद का इंजेक्शन देना ही होगा, नहीं तो वेद अपनी तबियत और ख़राब कर लेगा। रोहन फ़ोन पर ये सब सुनकर फिरसे रोने लगता है, और तभी वेदिका फिरसे उसके पास आती है, और उसे अपना फ़ोन पकड़ा कर, फ़ोन पर किसी से बात करने को कहती है। रोहन अपने आँसू पोंछ कर फोन को अपने कान से लगाकर हेलो बोलता है, और सामने से उसे अपनी ही मम्मी की आवाज सुनाई देती है।



रोहन की मम्मी :- (बुझी आवाज़ में) "बेटा मैंने अभी वेद की मम्मी से बात की, कैसी तबियत है अब उसकी??? और मुझे वेदिका ने भी बताया कि तू वेद से मिलने भी नही जा रहा है???"


रोहन :- (अपनी आवाज को संभालते हुए) "हाँ मम्मी वो मुझे थोड़ा काम ज्यादा है ना तो समय नहीं मिल पा रहा।"


रोहन की मम्मी :- "बेटा मैं तुझे अच्छे से जानती हूँ, तू ऐसा सिर्फ मेरी वजह से नही कर पा रहा है, वरना तू अंदर से इस समय कितना बिखरा हुआ है, ये मैं तेरी नक़ली आवाज से ही भांम्प गई हूँ। मैं जानती हूँ कि इन सब मे तुम दोनों बच्चों की कोई गलती नहीं थी। लेकिन हमारे लिए फैसलों का सबसे ज्यादा बुरा असर तुम दोनों पर ही पड़ा है। आज मुझे जब वेदिका ने समझाया और जब मैंने वेद की मम्मी से बात की, तब मुझे इस बात का एहसास हुआ, की हम दोनों माँओ की गलती की सज़ा तुम दोनों बच्चे भुगत रहे हो....."


रोहन :- (रूआंसी आवाज़ में) "नहीं मम्मी, इसमें आपकी कोई गलती नहीं।"


रोहन की मम्मी :- "मुझे मत टोक बेटा आज बोलने से, ये हमारी ही गलती है, जो तुम दोनों बच्चे आज दुखी हो। बेटा!!! आज मैं तुझे अपनी दी हर क़सम से मुक्त करती हूँ। तू जा अपने वेद के पास, और सम्भालले अपने प्यार को। और मेरा आशीर्वाद तुम दोनों बच्चों के साथ है। तुम दोनों हमेशा खुश रहो, और जल्द ही अपने घर वापस आ जाओ।"



     अपनी मम्मी की बात सुनते ही रोहन तुरंत भाग पड़ा ICU की ओर, जहां उसका वेद उसका इंतेज़ार कर रहा था। और ICU के बाहर उसे पहले मिले वेद के मम्मी पापा। उन्हें देखकर रोहन के पैर खुदबखुद ही रुक गए।



वेद की मम्मी :- (भागकर रोहन को गले से लगाकर) "रोहन!!! वेद तेरा ही इंतेज़ार कर रहा है बेटा। मुझे माफ़ करदे बेटा, मैंने तेरी एक ना सुनी, और तुम दोनों को अलग कर दिया। मुझे माफ़ कर दे बेटा।"



     रोहन ने वेद की मम्मी की आँखों से बहते आँसुओ को पोंछा और आगे बड़ते हुए ICU में दाख़िल हुआ। वेद ने जैसे ही रोहन को अपने सामने देखा तो वो अपने बिस्तर से उठने लगा। रोहन आगे बड़ कर उसे बिस्तर से उठने से रोका और वेद को अपने गले से लगा लिया। वेद ने भी रोहन को अपनी बाहों में भर लिया। आँखों से आँसू और चेहरे पर मुस्कान लिए दोनों ही बहुत देर तक बिना कुछ बोले बस एक दूसरे के गले से लगे रहे। 


रोहन :- (वेद के गले लगे हुए ही) "अब तो वो पर्स बदल लो, फट गया है अब तो वो।"


वेद :- (मुस्कुराकर और जोर से रोहन को अपनी बाहों में जकड़ते हुए) "तो ला देना नया।"


रोहन :- (वेद की बाहों से अलग होते हुए) "वैसे एक बात बताओ, वहां उस दिन रोड पर तो ऐसा कुछ नहीं था कि तुम्हारा एक्सीडेंट हो जाये, तो क्या गाड़ी के ब्रेक फैल हो गए थे???"


वेद :- "जिसे ढूढना ही मैंने पिछले 2 सालों से अपना लक्ष्य बना लिया था, मुझे वो दिख गया था। इसलिए मेरा खुदपर काबू ही नही रहा, और मेरी गाड़ी ने भी अपना आपा खो दिया, और ये एक्सीडेंट हो गया। लेकिन जो भी हो अच्छा हुआ, कम से कम इस एक्सीडेंट की वजह से ही तो तू मेरे पास तो आया।"


रोहन :- "वैसे मैं नहीं आता यहां, लेकिन तुम्हारी मँगेतर ने मुझे मजबूर कर दिया तुम्हारे पास आने पर!!"


वेद :- "मँगेतर!!! वेदिका भी आई है क्या???? यार वो अभी भी खुद को मेरी मँगेतर कहती है क्या??? पता है तेरे जाने के कुछ दिनों बाद ही दादी का देहांत हो गया था, और हमारी इंगेजमेंट फिर हो ही नही पाई। और उसके बाद मम्मी पापा ने कोशिश तो बहुत की मुझे मनाने की लेकिन मैंने फिर शादी करने के लिए साफ मना कर दिया था। और जब उनका शादी के लिए जोर देना ज्यादा ही शुरू हुआ, तो मैंने एक बार सोचा कि मैं उन्हें सब सच बता दूंगा, लेकिन तभी मुझे कहीं से तेरे बारे में पता चला कि तू अपना MBBS पूरा करने वाला है, तो बस मैं सभी MBBS कॉलेजेस में तुझे ढूढने निकल पड़ा, हाँ मुझे इसमें 2 सालों के समय जरूर लगा लेकिन मैंने तुझे ढूंड ही लिया। (रोहन का हाँथ पकड़ते हुए) अब एक काम कर, सभी को मेरे पास भेज, मुझे अपनी एक क़सम पूरी करनी है, और सभी को अपने रिश्ते की सच्चाई के बारे में बताना है।"


रोहन :- "नहीं!!! अब किसी को कुछ समझाने की जरूरत नही पड़ेगी, सबको सब कुछ समझ आ गया है अब।"



    दोनों के बीच मे कुछ सालों की दूरियां जरूर आई थीं, लेकिन तब ना तो उनका प्यार अधूरा रह गया था, और ना ही अब उनके दोबारा मिल जाने पर उनका प्यार पूरा हो जाएगा। प्यार तो बस प्यार होता है, जो हमेशा दो लोगों को बांधे रखता है, एक दूसरे का बनाये रखता है। चाहे जितने भी उतार चढ़ाव, कितनी भी क़समें आपके प्यार के रास्ते मे बाधा बनने की कोशिश करें, लेकिन अगर आपका प्यार सच्चा है, तो वेद और रोहन की तरह, वो प्यार की ताकत ही होगी जो आपको फिरसे एक दूसरे से मिलवा ही देगी। तो अगर आपकी ज़िंदगी मे भी कभी सच्चा प्यार दस्तक़ दे, तो आप ये सभी सोच के बारे में ध्यान ना दें, की आपका प्यार पूरा होगा या अधूरा रह जायेगा। आप बस सच्चे दिल से उस प्यार की इबादत करें, वो प्यार सभी परिस्थितियों को पार कर अपनी मंज़िल पा ही लेगा। 



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Lots of Love

Yuvraj ❤️


      



       


     










Saturday, January 23, 2021

क़सम - Part - II

 Thank-you friends for your appreciations. It realy feel good, when your work gets such applauds. Now here the second part of this story, hope you all like this as well.



       तो अभी तक आपने इस कहानी के आज के वक़्त के बारे में थोड़ा बहुत जाना है। तो चलिए अब आपको ले चलते हैं, उस बीते कल में, जहां रोहन की किस्मत को आज भी कई कसमों ने बाँध कर रखा हुआ है। ये बात है ग्वालियर के जवाहर कॉलोनी के परसेडिया और सारस्वत परिवार की। जो एक ही मोहल्ले में रहते हैं, घरों की दीवारें तो आपस मे नही जुड़ीं हैं। लेकिन उनके बच्चों रोहन परसेडिया और वेद सारस्वत ने दोनों परिवारों को आपस मे जोड़ कर रखा हुआ है। उम्र में यूं तो वेद रोहन से 1 साल बड़ा है, लेकिन बचपन से ही साथ मे खेल कूद, उठना बैठना, हंसना रोना दोनों का साथ ही होता है। और दोनों की इस गहरी दोस्ती के चलते, दोनों के परिवार भी आपस मे जुड़े हुए ही हैं। रोहन और वेद की दोस्ती में थोड़े बदलाव आने तब शुरू हुए, जब वेद की अच्छी पढ़ाई के लिए, सारस्वत परिवार ने उसे पुराने स्कूल से निकाल कर, शहर के अच्छे "दिल्ली पब्लिक स्कूल" में उसका दाखिला करवा दिया। रोहन ने भी वेद के साथ नए स्कूल में जाने की कई मिन्नते अपने घरवालों से की, लेकिन उनके घर से स्कूल की दूरी को देखते हुए, रोहन की उसके घरवालों के सामने एक ना चली। और ये नई दूरी, रोहन और वेद की दोस्ती के बीच भी आने लगी। धीरे धीरे दोनों का साथ मे मिलना और खेलना सिर्फ रविवार के दिन तक सिमट कर रह गया। और फिर धीरे धीरे बढ़ती कक्षाओं और बढ़ती पढ़ाई के दबाव में, वो रविवार भी अब कई हफ्तों में एक बार ही आने लगा। अब वेद के भी कई नए दोस्त बन चुके थे, जिनके लिए भी थोड़ा बहुत समय निकालना उसकी मजबूरी भी हो गया था, और उसको अच्छी लगने वाली आदत भी। वेद के नए स्कूल और उसके नए दोस्तों के बीच का माहौल, उस जवाहर कॉलोनी के मोहल्ले से बिल्कुल ही अलग था। उसके नए स्कूल में सभी सिर्फ अंग्रेजी भाषा का ही प्रयोग करते थे, और उसके नए दोस्तो का रहन सहन भी थोड़ा अलग और मॉडर्न ही था। 


      एक रोज़, वेद के जन्मदिन पर, उसके घरवालों ने एक छोटी सी बर्थडे पार्टी का आयोजन किया। जिसमें वेद के सभी नए दोस्तों को भी बुलाया गया था। और वेद का बचपन का दोस्त रोहन भी उस पार्टी में आमंत्रित था। रोहन द्वारा साथ लाये गए उसके छोटे से तोहफे, और उसके बोलने के लहज़े का, वेद के सभी दोस्तों ने बहुत मज़ाक बनाया, और रोहन को खूब चिढ़ाया भी। वेद के दोस्त की छोटी बहन, जो रोहन की हम उम्र ही थी, उसने सभी को रोहन का मजाक उड़ाने से रोका भी, लेकिन वहाँ सभी ने उसकी नाज़ुक सी आवाज़ को नज़रंदाज़ किआ। तभी वेद ने वहाँ आकर, सभी को चुप कराया, और रोहन की आँखों से बहते आँसुओ को पोंछा भी। 



वेद :- "I am sorry rohan!!! इन लोगो की बातों का बुरा मत मानना, ये लोग ऐसे ही है। पता है जब मैं पहली बार स्कूल गया था, तो मेरा भी सबने ऐसे ही मज़ाक बनाया था। और देखो आज ये सभी मेरे अच्छे दोस्त भी बन गए हैं।"


वेदिका :- "रो मत रोहन! मैं घर जा कर सबकी शिकायत करूंगी, और स्कूल में भी मैडम से शिकायत करके, इन सभी की डांट भी पडवाऊंगी।"


वेद :- "और तुम बिल्कुल भी मत सोचो इन लोगों के बारे में, अबसे तुम रोज़ मेरे घर आना, और मैं तुम्हें इंग्लिश बोलना सिखा दूंगा। फिर देखना, अगली बार जब तुम मेरे इन दोस्तों से मिलोगे, तो ये तुम्हे कुछ नही कह पाएंगे।"



      इस बर्थडे पार्टी ने रोहन की आँखों मे आँसू जरूर लाये थे, लेकिन उसे उसका पुराना, बचपन का दोस्त भी लौटा दिया था। अब रोज़ 1 - 2 घण्टे बाकी की पढ़ाई के साथ साथ वेद रोहन को अंग्रेजी बोलना भी सिखाया करता था। जो दोस्ती धीरे धीरे खत्म होती जा रही थी, उस एक घटना ने उस दोस्ती में फिर से जान फूंकने का काम कर दिया था। अब तो वेद के इस बर्ताव ने रोहन के मन मे एक अलग ही घर कर लिया था। अब तो हर वक़्त रोहन को बस वेद के इर्द गिर्द ही रहना अच्छा लगता था। जहाँ धीरे धीरे समय के साथ दोनों की दोस्ती गहरी होती जा रही थी, वहीं रोहन इस दोस्ती को अपनी ओर से एक कदम और आगे बड़ा चुका था। जिस कच्ची उम्र में बच्चों के दिल और दिमाग मे बस खेल कूद और मस्ती करने के ही ख्वाब छाए रहते थे। उस उम्र में रोहन के दिल मे प्यार का फूल खिलने लगा था। वो वेद को मन ही मन अपना सबकुछ मानने लगा था। अब वो बस वेद के ही ख्यालों में खोया रहता था। और वहीं वेद के लिए अभी भी इस रिश्ते का नाम बस दोस्ती ही था। रोहन के साथ किये बुरे व्यवहार के लिए वो अपने स्कूल के दोस्तों से भी अभी तक थोड़ा नाराज़ ही था। लेकिन उसके दिमाग मे अभी तक बस रोहन उसके लिए उसका सबसे अच्छा और खास दोस्त ही था। लेकिन रोहन के प्रति वेद की भावनाओं ने भी उस रात कुछ अंगड़ाइयां लीं, जब वेद रोहन को उसकी 8 वीं की बोर्ड की परीक्षाओं की तैयारी करवा रहा था।


वेद :- "अरे रोहू, तुम्हारा ये MP बोर्ड का सिलेबस तो बहुत ही आसान है। मैं परीक्षा से पहले ही तेरी सारी तैयारी करवा दूंगा।"


रोहन :- "इसीलिए तो आया हूँ तुम्हारे पास, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है।"


वेद :- "अब अपने मम्मी पापा को बोल ना कि मेरे ही स्कूल में ट्रांसफर करवा दें तेरा, बड़ा मजा आएगा फिर, हम दोनों साथ ही स्कूल आएंगे जाएंगे।"


रोहन :- "कितनी बार तो डाँट खा चुका हूं यार इस चक्कर में, लेकिन वो लोग मानते ही नही।"


वेद :- "चल कोई नहीं। वो तो अच्छा है कि मेरी मम्मी ने तेरे साथ पढ़ाई करने के लिए हां करदिया, वरना मुझे बहुत बेकार लगता था तुझसे ना मिलने पर।"


रोहन :- (आँखों मे अलग ही चमक लिए) "तुम्हे अच्छा लगता है मेरे साथ??"


वेद :- "हाँ!!! तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त है।"


रोहन :- "मुझसे भी अच्छा कोई दोस्त है तुम्हारा स्कूल में???"


वेद :- "दिव्यांश मेरा अच्छा दोस्त बन गया था, लेकिन जब उसने तेरा मज़ाक बनाया था, तो अब वो मुझे उतना अच्छा नही लगता।"


रोहन :- "और कोई गर्लफ्रैंड??"


वेद :- (हँसते हुए) "क्या बोल रहा है रोहू, मम्मी ने अगर सुन लिया ना, तो बहुत मार पड़ेगी, और हमारा साथ मे पड़ना भी बंद हो जाएगा। (थोड़ी देर शांत रहने के बाद) वैसे तेरी कोई गर्लफ्रैंड है क्या?"


रोहन :- "नहीं!!! एक बॉयफ्रेंड है मेरा।"


वेद :- (आश्चर्य से) "बॉयफ्रेंड!!!! उसे बस दोस्त कहते हैं रोहू, बॉयफ्रेंड तो लड़कियों के होते हैं।"


रोहन :- "जरूरी नहीं है, कुछ लड़कों को भी लड़कों से प्यार होता है, जैसे मुझे है।"


वेद :- "सच में ऐसा भी होता है??? कोन है तेरा बॉयफ्रेंड??"


रोहन :- "तुम!! तुमसे प्यार करता हूँ मैं, जैसा tv में दिखाते हैं, हीरो हेरोइन वाला प्यार, वैसा ही प्यार करता हूँ मै तुमसे!!"



       वेद रोहन की यह सब बातें सुनकर बहुत ही स्तब्ध रह गया था। उसने रोहन से इस तरीके के शब्दों को सुनने की कभी भी कल्पना नहीं की थी। वह रोहन को तो सिर्फ अपना एक अच्छा दोस्त, सबसे अच्छा दोस्त ही समझता था। लेकिन रोहन के इस प्यार के इजहार ने वेद को भी, रोहन को देखने, उसे समझने का एक नया नज़रिया जरूर दे दिया था। उस रात के बाद से दोनों के ही बीच में कुछ बदलाव तो जरूर आए थे। लेकिन वेद ने अपनी तरफ से किसी भी तरीके का ऐसा इजहार या अपने व्यवहार में ऐसा कोई बदलाव नहीं लाया था, जिससे रोहन को यह समझ आ सके, कि क्या वेद भी वैसा ही रोहन के लिए महसूस करता है या नहीं। वेद पहले की तरह ही रोहन के साथ व्यवहार करने की पूरी कोशिश करता था। बिल्कुल पहले की तरह ही उसके साथ दोस्ती का रिश्ता भी निभाता था। लेकिन हां उसकी नजरों में थोड़ा सा बदलाव जरूर आया था। अब रोहन से नजरें मिलाने में वो थोड़ा सा कतराता था। रोहन को भी यह बात साफ समझ आती थी। लेकिन वह यह समझता था, कि शायद वेद उसके लिए वैसी भावनाएं नहीं रखता, जैसी रोहन उसके लिए रखता है। इसलिए शायद वह उस से नजरें नहीं मिलाता। वेद के इस बदले अंदाज को देखकर रोहन ने भी फिर कभी दोबारा अपने मन की बातों को या यूं कहें कि अपने प्यार का इजहार फिर कभी वेद से नहीं किया। धीरे-धीरे समय यूं ही बीतता गया, रोहन के आठवीं की परीक्षाएं भी खत्म हो चुकी थी और उनका परिणाम भी आ चुका था। रोहन वेद की कराई हुई मेहनत पर एकदम खरा उतरा था, और उसने फर्स्ट डिवीजन में आठवीं कक्षा को पास किया था। और साथ ही साथ अब उसे अंग्रेजी बोलना भी बहुत अच्छे से आ चुका था। यह सब वेद द्वारा दिए गए समय का ही असर था। 



     रोहन के घरवाले जहां रोहन की बेहतर होती पढ़ाई के लिए इतने खुश थे, वही रोहन इससे बहुत निराश। और रोहन की निराशा का कारण था, अब वेद से ना मिल पाना। क्योंकि इस साल वेद की 10वीं कक्षा शुरू होनी थी, और उसकी मम्मी ने गर्मियों की छुट्टियों से ही उसकी पढ़ाई शुरू करवा दी थी। जिसके चलते ना तो वेद अपने घर के बाहर ज्यादा खेलने आ पाता था, और ना ही अब रोहन के पास कोई ऐसा कारण था, जिससे वो वेद के घर जाकर, वेद के आस पास रह सके। रोहन ने एक बार फिर अपने घरवालों से, वेद के स्कूल में ही उसका एडमिशन कराने की जिद्द की, लेकिन इस बार भी उसके घरवालों ने इस बात को नजरअंदाज किया। रोहन अब बहुत ही चिड़चिड़ा रहने लगा था। एक तो उसके घरवाले उसकी बस एक ख्वाईश को पूरा करना तो छोड़ो, उसे ठीक से सुनते भी नहीं थे, और दूसरी ओर, वेद भी उसकी भावनाओं को नही समझता था। और वो तो वेद के साथ बस दोस्त बन कर भी अच्छा वक्त गुजरने को तैयार था, लेकिन अब उस दोस्ती का रिश्ता निभाने के लिए भी वेद बस रविवार को कुछ घंटों का ही समय रोहन को दिया करता था। वक़्त ने फिर अंगड़ाइयां लीं, और धीरे धीरे दोनों ही वापस से अपने अपने स्कूल और पढ़ाई लिखाई में व्यस्त हो गए। और फिर आया प्यार का महीना यानी फरवरी!! ये फ़रवरी रोहन के लिए कुछ खास तोहफे भी साथ ले कर आई थी। फरवरी की 14 तारीख को, वैलेंटाइन्स डे के दिन, रोहन के साथ वो हुआ, जिसकी उसने कभी कल्पना ही नही की थी, और वेद के बदले व्यवहार के बाद तो उसने ऐसा सपनों में भी सोचना छोड़ दिया था। जी!!! आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं। इस बार अपने प्यार का इज़हार करने की बरी वेद की थी। 14 की शाम को, वेद रोहन को उसके घर मिलने गया, और रोहन को अपने साथ, रोहन के घर की छत पर ले आया। फरवरी की हल्की हल्की सर्दी थी, अंधेरा भी हो ही चला था, वेद ने अपनी जैकेट की जेब से अपने घर से तोड़ कर लाये एक छोटे से गुलाब के फूल को निकाला, और रोहन के हाँथों में पकड़ाते हुए कहा।


वेद :- "मैं तुम्हारी तरह बेबाक़ नहीं हूं रोहन। और ना ही मैं कभी अपनी दोस्ती की सच्चाई को पहचान पाता, अगर उस दिन तुम मुझसे अपने दिल की बात ना करते। (मुस्कुराते हुए) और मैं थोड़ा स्लो भी हूँ! मुझे अपने ही दिल की बात समझने में थोड़ा ज्यादा समय भी लगा। लेकिन आज के दिन से अच्छा कौन सा दिन होगा, अपने प्यार का इज़हार करने के लिए। I Love You रोहन! मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। क्या तुम अभी भी मुझसे प्यार करते..........."


     वेद अपनी बात पूरी कर पाता, रोहन ने उससे पहले ही अपने प्यार का इज़हार वेद के होंठों पर अपने होंठों से कर दिया। वो 14 फरवरी की शाम, दोनों के लिए ही बहुत ही यादगार शाम थी। कहने को तो अभी दोनों बच्चे ही थे, लेकिन आज के समय मे इस उम्र के बच्चे भी वयस्कों से कम नही हैं। अपनी पसंद नापसंद का चुनाव वे बख़ूबी कर सकते हैं। जैसे कि वेद और रोहन ने इतनी कम उम्र में ही अपने अपने जीवन के पहले प्यार को इतनी आसानी से पा लिया था। और पहला प्यार किसी भी उम्र में आपके जीवन में आये, लेकिन वो बाकी के जीवन भर के लिए, अपनी एक खास छाप ठीक वैसे ही छोड़ जाता है, जैसे कि आपके शरीर पर पड़ी कोई बचपन की गहरी चोट।



       उस 14 फरवरी के बाद से, रोहन और वेद के लिए मानो दुनिया जैसे बदल ही गयी थी। एक तो कच्ची उम्र, और उस पर पहले प्यार का नशा, दोनों के सर चड़ चुका था। अब तो बस दोनों ही किसी ना किसी बहाने से एक दूसरे के आस पास बने ही रहते थे। लेकिन रोहन जितना बेफिक्र और बेरोकटोक वेद को बस प्यार करना चाहता था, प्यार की सारी हदें छू लेना चाहता था, वहीं वेद इस मामले में बहुत ही संजीदगी से बर्ताव करता था। जहां रोहन को बाकी के लोगों की कोई परवाह ही नही थी, वही वेद इस रिश्ते को, सबकी नजरों से छुपा कर ही रखना चाहता था। क्योंकि वेद को अपने स्कूल में इस तरह के प्यार के ना जाने कितने गंदे और बुरे नाम सुनने को मिलने लगे थे। इसलिए वेद नहीं चाहता था, की कोई उसपर भी उंगली उठाए। शायद रोहन के प्रति अपने प्यार को क़ुबूल करने में जो वेद ने इतना समय लिया, उसके पीछे भी यही एकमात्र कारण था। वेद जब अकेले में रोहन के साथ होता था, तो उसका एक अलग ही रूप देखने को मिलता था, और वहीं सबके सामने, वो रोहन की ओर देखता भी नही था। वेद की यह बात रोहन को कुछ खास पसंद भी नहीं थी। लेकिन जब भी रोहन वेद से ऐसे बर्ताव का कारण पूछता था, तो वेद उसे यही बात हर बार कहता था कि, "मैं नहीं चाहता कि कोई हमारा मज़ाक बनाये, इसलिए हमें सबसे छुप कर ही रहना होगा।" अब रोहन को वेद की यह बात पसंद तो नही थी, लेकिन अकेले में ही सही वेद रोहन से अपने प्यार का इज़हार तो करता था, रोहन के लिए खुश रहने की यही एक वजह काफी थी। 



    कुछ ही समय बाद वेद के 10वीं के एग्जाम भी खत्म हुए और वेद के पढ़ाई में अच्छे से ध्यान देने की वज़ह से, वह अच्छे नंबरों से पास भी हुआ। अब बारी थी उसकी अपने विषयों को चुनने की, और गणित में कम रुचि होने की वजह से वेद ने विज्ञान को चुना, और 11वीं कक्षा में दाखिला लिया। वहीं रोहन के सर इस साल पढ़ाई का अधिक बोझ आया, क्योंकि ये उसका 10वीं बोर्ड का एग्जाम था। एक बार फिर रोहन को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी वेद ने उठाई। और स्कूल के बाद का सारा समय अब दोनों साथ ही अपनी अपनी किताबों के साथ, एक साथ ही बिताने लगे। कभी रोहन के कमरे में, कभी वेद के कमरे में, कभी रोहन के घर की छत, तो कभी कॉलोनी का पार्क ही, दोनों की पढ़ाई करने की जगह बन जाया करता था। जब दोनों के आस पास कोई होता था, तब तो सारा ध्यान सिर्फ पढ़ाई पर ही लगाया जाता था, लेकिन जैसे ही दोनों को कुछ समय अकेले में बिताने का मौका मिलता था, तो वो समय किताबों से ज्यादा गौर एक दूसरे के शरीरों पर दिया करते थे। ये पूरा साल दोनों ने पढ़ाई भी की थी, लेकिन साथ साथ, दोनों के बीच का प्यार, शारीरिक रिश्तों के साथ ही, गहरा भी हो चला था। दोनों ने ही इस बार भी, अच्छे अंको के साथ अपनी अपनी परीक्षाएं उत्तरीण की थीं। लेकिन रोहन के इतने अच्छे परिणाम के लिए, सभी ने वेद को ही शाबाशी दी। और रोहन के घरवाले, वेद के इतने अच्छे साथ को देखते हुए, इस साल रोहन का एडमिशन, वेद के ही स्कूल में कराने के लिए भी तैयार हो गए थे। इस बात से रोहन की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नही था, लेकिन वेद इस बात को सुन कर ज्यादा प्रफुल्लित नही नजर आ रहा था।



रोहन :- (अपने घर की छत पर) "क्या हुआ तुम्हे??? खुश नही लग रहे?"


वेद :- "नहीं ऐसी कोई बात नहीं। बस थोड़ा परेशान हूँ।"


रोहन :- "वही तो पूछ रहा हूँ, किसलिए??"


वेद :- "यार जब तुम मेरे सामने होते हो, तो मैं खुद को नही रोक पाता, और अब स्कूल में भी जब तुमसे मिलूंगा, तो पता नही कैसे खुद पर काबू कर पाऊंगा।"


रोहन :- "लेकिन खुद को रोकना ही क्यों है, मुझे आज तक तुम्हारी ये बात समझ ही नही आई। हम कुछ गलत थोड़ी कर रहे हैं।"


वेद :- "ऐसा बस तुम्हे लगता है। बकी सभी के लिए ये गलत ही है। और मैं नही चाहता यार की हमारा मज़ाक बनाये सभी। और फिर बात सिर्फ हमारी होती तो कोई बड़ी बात भी नही थी, हमारे बाद ये बात यहीं नही रुकेगी, हमारे घर तक भी आएगी, और मैं अपने घरवालों की बेज्जती होते नही देख सकता।"


रोहन :- (मायूस होकर) "तुम कुछ ज्यादा ही सोचते हो। चलो ठीक है, मैं मम्मी पापा को मना कर दूंगा तुम्हारे स्कूल में एडमिशन करने के लिए, ठीक है??"


वेद :- (रोहन का चेहरा अपने हाथों में भरते हुए) "नहीं ऐसा कुछ नही करना है। वहां तुम्हे ज्यादा अच्छा सीखने को मिलेगा, वो जरूरी भी है। बस स्कूल में हमें दोस्तों की तरह ही रहना होगा। मुझे भी खुद पर काबू रखना होगा, और तुम्हे भी।"


रोहन :- "ठीक है। लेकिन कम से कम लंच में तो मुझसे मिल लिया करना, वरना नए स्कूल में अकेले मैं कैसे एडजस्ट कर पाऊंगा।"


वेद :- "अरे उसकी बिल्कुल भी चिंता मत करो, वेदिका है ना, वो तुम्हारे ही क्लास में है। वो मेरे दोस्त दिव्यांश की छोटी बहन है, एक बार तुम मिले भी हो उससे मेरी बर्थडे पार्टी में, अगर तुम्हें याद हो तो। मैंने उसे बोल दिया है तुम्हारे बारे में, वो तुम्हारा ख्याल रखेगी वहां।"



      अबसे दोनों के लिए ही एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा था। जवाहर कॉलोनी से dps तक कि दूरी अब दोनों साथ ही एक ही bike पर तय करने लगे थे। सुबह का वो समय, चड़ते सूरज की चमक, वेद को पीछे से अपनी बाहों में पकड़ने का एहसास, वेद के कांधे का वो सहारा, रोहन के लिए अपनी अलग ही ख्वाबों की दुनिया को बसाने में भरपूर मदद कर रहे थे। जहाँ रोहन अपने बेपनाह प्यार का एहसास हर रोज़ वेद को कराने से नही हिचकता था, वहीं वेद, अपनी बनाई एक भी सीमा को रोहन को लांघने नही देता था। वो स्कूल पहुँचने से थोड़ी दूरी पर ही, रोहन से एक दूरी बना लेता था, और ये दूरी दोपहर में स्कूल से निकलने के बाद ही वापस उसी bike पर ही आकर खत्म होती थी। स्कूल में वेद रोहन के साथ बस एक अच्छे दोस्त की तरह ही बर्ताव किया करता था। केवल लंच के समय ही रोहन के साथ समय बिताया करता था, और वो भी अकेले में नही। दिव्यांश और वेदिका की मौजूदगी में ही। हाँ कभी कभी, लाइब्रेरी में अगर उसे रोहन अकेले में मिल जाया करता था, तो वेद उसे जोर से गले लगा कर उसके होंठो पर अपनी एक छाप छोड़ने से पीछे भी नही हटता था। रोहन को भी अब धीरे धीरे, वेद के इस चोरी छुपे प्यार से एतराज़ खत्म हो चला था। अब रोहन भी इस आँख मिचौली में वेद का भरपूर साथ निभाने लगा था। शाम को भी वेद के साथ समय बिताने को मिले, इसलिए उसने भी वेद की ही तरह विज्ञान को भी चुन लिया था। और अब दोनों सुबह से लेकर रात तक एक दूसरे के साथ ही समय बिताया करते थे। यूँही धीरे धीरे दोनों का प्यार भी परवान चड़ने लगा था, और दोनों एक दूसरे के बेहद करीब आते जा रहे थे।



वेदिका :- (स्कूल का एक दिन) "यार लंच हुए बहुत टाइम हो गया, वेद आया नही अभी तक??"


रोहन :- "आजायेग, कुछ काम मे लग गया होगा।"


वेदिका :- "यार तुम दोनों शाम को भी साथ मे पढ़ते हो ना??"


रोहन :- "हाँ!!! वेद मेरी हेल्प कर देता है।"


वेदिका :- "मैं भी आ जाया करूँ क्या?? भाई को भी ले आऊंगी, वो भी आज कल पढ़ाई में बहुत लापरवाही देता है, और इस साल 12 है उसका।"


रोहन :- "मैं क्या बोल सकता हूँ यार, तुझे वेद से ही पूछना पड़ेगा। शायद उसकी मम्मी परमिशन ना दें।"


वेदिका :- "यार सच बताऊँ!!! मुझे वेद बहुत अच्छा लगता है। लेकिन मेरी हिम्मत नही होती उससे कुछ कहने की। तू तो हम दोनों का ही अच्छा दोस्त है, तू कुछ मदद कर ना मेरी।"


रोहन :- (आश्चर्य से) "लेकिन वेद तुझे पसंद नही करता।"


वेदिका :- "उसने कभी बात की मेरी तुझसे??? तुझे कैसे पता??"


रोहन :- "नहीं!!! हम लोग ऐसी बातें नहीं करते, लेकिन मुझे पता है कि वो तुझे पसंद नही करता।"


वेदिका :- "तू ना ज़्यादा अपना दिमाग मत चला और मेरी मदद करदे बस, बाकी सब मैं देख लुंगी।"



    वेदिका के मन की बात जानकर रोहन थोड़ा हैरान भी था और परेशान भी। उसे अपने प्यार पर पूरा भरोसा तो था, लेकिन वेदिका के बस इस छोटे से एकतरफा प्यार के इज़हार ने, रोहन के सामने उसके और वेद के प्यार के भविष्य के कई सवाल खड़े कर दिए थे। और अगले ही दिन से दिव्यांश और वेदिका ने भी शाम के समय वेद के घर पर आकर पढ़ाई करना शुरू कर दिया था। जिससे रोहन को अपने मन मे उठते सवालों को वेद के सामने रखने का मौका भी नही मिल पा रहा था। और उसके और रोहन के प्यार के आसमान में छाए इन वेदिका और दिव्यांश नाम के बादलों की वजह से, रोहन अब सभी पर खिसियाने भी लगा था। 



वेद :- (bike पर स्कूल जाते समय) "क्या हो गया है आज कल तुझे, इतना चिड़चिड़ा क्यों रहा है सभी से?? उस दिन आँटी भी बोल रही थी, की घर मे भी सबसे ढँग से बात नही कर रहा आज कल?"


रोहन :- "मैं वैसे ही बहुत परेशान हूँ यार, मुझे और मत परेशान करो।"


वेद :- (bike को स्कूल के रास्ते की वजाय मोरैना कि तरफ ले जाते हुए) "जब तक तेरा मूड ठीक नही हो जाता, आज हम घर नही जाएंगे।"


रोहन :- "कहाँ ले जा रहे हो ये??? Half yearly exam आने वाले हैं यार, काम है स्कूल में बहुत।"


वेद :- "मैं करवा दूँगा तेरी सारी तैयारी, लेकिन आज तो स्कूल नहीं जा रहे हैं हम।"


रोहन :- "हाँ ठीक है, लेकिन अगर किसी को पता चला ना कि स्कूल का बोल कर कही और घूम रहे थे, तो ऐसे साथ मे स्कूल आना भी बंद हो जाएगा। अब बस यही टाइम तो बचा है तुम्हारे साथ बिताने का, बाकी पर तो वो दोनों भाई बहन राहू केतु की तरह मँडराते ही रहते हैं।"


वेद :- (खिलखिलाकर हँसते हुए) "अच्छा तो चिड़ने की वज़ह ये है। अब समझ आया मुझे, तो क्या हुआ, मैं मम्मी को बोल कर उनका घर आना बंद करवा दूंगा। फिर तो ठीक है?"


रोहन :- "नहीं यार बात वो भी नहीं है, ये तुम्हारा आखिरी साल है स्कूल में, फिर तुम पता नही कहाँ जाओगे, क्या करोगे, मुझे याद भी रखोगे या नहीं।"


वेद :- (रोहन के हाँथ को खींचकर, उसे अपनी पीठ के करीब खिंचते हुए) "बस इतनी सी बात रोहू??? इतनी छोटी सी बात से तूने इतने दिनों से अपना मुँह सड़ाया हुआ है। मुझे तो छोड़, तेरी अपनी मम्मी को भी तेरा ये बुरा से चेहरा नही पसंद आ रहा। वो मुझे बोल रही थीं कि रोहन को समझा उससे बात कर, कुछ परेशान है आज कल??? (Bike को सड़क के एक किनारे पर रोकते हुए, और रोहन के दोनों हाँथों को अपने सीने के इर्द गिर्द जकड़ते हुए) रोहू, मैं कहीं भी चला जाऊं, कुछ भी करूँ, लेकिन मैं कभी भी तुझे अपने दिल से नही निकाल पाउँगा। तू जान है मेरी। हाँ मैं बार बार तुझे थोड़ा कंट्रोल करने को कहता हूँ, मुझसे थोड़ी दूरी बनाए रखने को कहता हूँ, लेकिन मेरा यकीन मान, मैं इन सब से कहीं ज्यादा तुझसे प्यार भी करता हूँ। और मैं पूरी कोशिश करूंगा कि मुझे GRMC में ही दाखिल मिल जाये MBBS के लिए, लेकिन अगर मुझे कहीं बाहर भी जाना पड़ा, तो अगले साल मैं तुझे अपने साथ ही ले जाऊंगा। फिर तो कोई दिक्कत नही है ना?"


रोहन :- (वेद की बातें सुनकर उसे जोर बाहों में भरते हुए) "मुझे पता है कि तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो, मुझे तुम पर खुद से भी ज्यादा यक़ीन है, लेकिन बाकी लोगों पर तो मुझे रत्तीभर भी भरोसा नही है ना!!"


वेद :- "कौन बाकी के लोग रोहू??? तू क्या बोल रहा है??"


रोहन :- "कुछ नहीं!!! अब मेरा मूड बिल्कुल ठीक है, अब हम स्कूल वापस चले क्या??"


वेद :- (बाइक को स्टार्ट कर आगे बड़ाते हुए) "नहीं!!! आज का पूरा दिन बस तू और मैं!!! No school, no tenssion, only you and me।"


रोहन :- "ठीक है, लेकिन जा कहाँ रहे हैं हम???"


वेद :- "मितावली!!!! बहुत अच्छी जगह है, कल ही एक दोस्त होकर आया था, तो बस सोचा कि तुझे भी ले चलू। थोड़ा घूमना फिरना भी हो जाएगा। तेरा मूड भी ठीक हो जाएगा। और काफी दिनों से साथ मे वक़्त नही मिल पाया, तो वो कमी भी दूर हो जाएगी।"


       

      सारे रास्ते भर रोहन बिना कुछ बोले बस वेद के कंधे पर सर रखकर, उसे अपनी बाहों में भरकर गुमसुम सा बैठा रहा। मितावली पहुंचकर जब वेद और रोहन ऊपर पहाड़ी पर पहुंचे, वहाँ पूरे प्रांगण में उन दोनों के सिवा कोई और नहीं था। दोनों ने अंदर जाकर शिव जी के दर्शन किये, और आस पास बने बरामदे में घूमने लगे। लेकिन रोहन अभी भी चुप ही था। वेद को देखकर मुस्करा जरूर रहा था, लेकिन अभी भी उसके मन मे कुछ ऐसा था, जो उसने वेद से छुपा कर रखा था।



वेद :- "क्या हुआ है तुझे रोहू??? क्या बात है??? तू अभी भी मुझे परेशान ही लग रहा है।"


रोहन :- "नहीं कुछ खास नही।"


वेद :- (रोहन का हाँथ पकड़ते हुए) "अब बताएगा भी??"


रोहन :- "वेदिका तुमसे प्यार करती है!!!!।"


वेद :- (हँस कर) "तो??? तो तू क्यों परेशान है??? तुझे उससे जलन हो रही है क्या??"


रोहन :- (वेद के हाँथ को झटकते हुए) "तुम्हे बस सब मज़ाक ही लगता है।"


वेद :- (वापस से रोहन के हाँथों को पकड़ते हुए) "अरे मज़ाक नहीं कर रहा यार मैं। अब ये उसकी फीलिंग्स है, तो मैं उसे तो कंट्रोल नही कर सकता ना। लेकिन मेरी फीलिंग्स को तो तू जानता है ना??"


रोहन :- "यार बात वेदिका की भी नही है।"


वेद :- "रोहू तो बात है क्या?? कभी बोल रहा है कि मैं अगले साल दूर ना चला जाऊं, फिर वेदिका, और अब वेदिका की भी बात नही है!!! तो आखिर बात क्या है?"


रोहन :- "वेद बात हमारी है!! हमारे रिश्ते की है!! हमारे भविष्य की है!"


वेद :- "क्या बोल रहा है रोहू यार, मुझे कुछ नही समझ आ रहा है??"


रोहन :- "यार जब वेदिका ने मुझे अपनी फीलिंग्स बताई, तब मुझे समझ आया, की वेदिका ना ही सही, लेकिन एक टाइम तो ऐसा आएगा ना, जब तुम शादी कर लोगे। तब हमारा, हमारे इस रिश्ते का क्या होगा?"


वेद :- (हँसते हुए) "यार रोहू तू कितनी दूर की सोच रहा है, अभी हम केवल स्कूल में हैं। उसके बाद कॉलेज फिर नौकरी, तब जाकर ये बात सामने आएगी हमारे, और तू उस बारे में अभी से ही सोच रहा है??"


रोहन :- "तुम्हें हँसी आ रही है इस बात पर, मुझे पता है, आज से 6 7 साल बाद ही सही, लेकिन तुम तो सबके डर के कारण कर लोगे शादी, फिर मेरा क्या होगा? मैं कैसे रहूंगा तुम्हारे बिना।"


वेद :- (रोहन के चेहरे को अपने हाँथों में भरते हुए) "सॉरी रोहू, मैं बस तू जो इतनी दूर की सोच कर अभी से परेशान है, उस बात पर हंस रहा था। ना कि तेरे और मेरे रिश्ते पर। अभी इन सब बातों में बहुत समय है, हम अभी से उस वक़्त के बारे में क्यों सोचें जो शायद कभी आए ही ना।"


रोहन :- (वेद के हाँथों पर अपने हाँथ रखते हुए) "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ वेद, मैं इस ख्याल से भी डर जाता हूँ कि तुम मुझसे कभी दूर भी हो सकते हो।"


वेद :- (रोहन के माथे को चूमते हुए) "तुझे बिल्कुल भी डरने की जरूरत नही है रोहू। मैं कभी तुझे छोड़ कर नही जाऊंगा।"


रोहन :- "मुझे तुम्हारे प्यार पर बिल्कुल भी शक नही है वेद, लेकिन मैं तुम्हे अच्छे से जानता हूँ। जब तुम्हारे घरवाले तुम पर शादी के लिए प्रेशर डालेंगे, तो तुम चुप चाप उनकी बात मान लोगे, और मुझसे दूर हो जाओगे।"


वेद :- (रोहन को शिव मंदिर की ओर ले जाते हुए) "अगर तुझे इस बात का डर है, तो मैं आज शिव जी के सामने, तेरे सर पर हाँथ रख कर कसम खाता हूँ, की मैं कभी तेरा साथ नही छोडूंगा, चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े। मैं हमेशा तुझसे, और केवल तुझसे ही प्यार करता रहूंगा।"




    ये तो बस एक क़सम थी, जो वेद ने खाई थी। लेकिन क्या वो अपनी इस कसम को निभा पाया था?? क्यों वेदिका 2 सालों से वेद का इंतेज़ार कर रही थी? क्यों रोहन 6 सालों से अपने घर, अपने शहर ग्वालियर वापस नही लौटा था? ऐसे कई सवालों, और बाकी की कसमो को जानने के लिए, इंतेज़ार कीजिये इस कहानी के अंतिम भाग का, जो मैं जल्द ही आप सबके सामने प्रस्तुत करूँगा।





Monday, January 11, 2021

क़सम

Hello friends,

                      I am again here to present my new story "कसम".  Hope you like my this creation as well. 




प्यार!!! एक ऐसा शब्द जिसे ना तो किसी तरीके से नापा जा सकता है, और ना ही तौला। एक ऐसा एहसास जो हर रिश्ते के साथ अपनी अलग अलग भूमिका निभाता है। माँ के साथ ममता बन जाता है, दोस्त के साथ दोस्ती और प्रेमिका के साथ प्रेम। दिल से दिल तक का एक अनदेखा और अनोखा रिश्ता, प्यार!!! इस रिश्ते से ही सृष्टि की शुरुआत भी हुई, और आज के आधुनिक युग तक आते आते, इस रिश्ते की कई अनेकों रूप हम सब को देखने और सुनने को भी मिले। सभी ने अपनी सहूलियत, अपने रहन सहन, अपने आस पड़ोस के माहौल के हिसाब से, इस प्राकृतिक रिश्ते को कई पाबंदियों में भी कैद किया। इस रिश्ते के इर्द गिर्द घूमते, कई कहानी - किस्से भी सुनने को मिले। अधूरे और मुकम्मल प्यार की दुहाइयाँ भी सुनने को मिली। लेकिन क्या आपको लगता है, की इस सुंदर से रिश्ते को किसी भी तरीके की दीवारों में कैद करना सही होगा?? और कैद करने के बाद भी, क्या यह प्राकृतिक रिश्ता, उस कैद से बाहर आने का अपना अलग रास्ता नहीं खोज पायेगा??? चलिए मानते हैं कि इस विषय पर हर किसी के अपने अपने अलग मत हो सकते हैं। लेकिन क्या कोई मुझे अधूरे और मुकम्मल प्यार की परिभाषा बता सकता है। क्या कोई बता सकता है, की दो इंसानों के बीच पनपा यह खूबसूरत रिश्ता कब अधूरा रह जाता है? उनके अलग हो जाने पर, उनके बिछड़ जाने पर?? क्या प्यार की कोई सीमा होती है?? अगर प्यार की कोई सीमा ही नही है, तो दो लोगों के अलग होने पर भी उनके बीच का प्यार अधूरा कैसे? और अगर प्यार की सीमा होती है, तो वो आखिरी सीमा क्या है? ये कई ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर देने के लिए जरूरी नही की आपको भी प्यार के रिश्ते में बंधना जरूरी हो। प्यार ही तो एक ऐसा एहसास है, जो हर किसी को अपने हिसाब से उसे परखने की अनुमति देता है। इसी प्यार और ऐसे ही कई सवालों को उठाती मेरी ये कहानी " कसम " आपके सामने प्रस्तुत है। मैं आशा करता हूँ, की आपको मेरी यह कोशिश भी पसंद आएगी।



       मुंबई जितना अपनी तेज रफ्तार से भागती जिंदगी के लिए प्रसिद्ध है, उतना ही शांत और खामोशी के साथ, भीड़ में खो जाने के लिए भी मशहूर है। अगर कोई अपनी पिछली जिंदगी को भुला कर, नई जिंदगी को शुरू करने के लिए, सारे रिश्ते नातों को पीछे छोड़, नए रिश्तो की तलाश में, मुंबई शहर में खो जाना चाहता है, तो यह शहर भी उसका अपनी खुली बाहों से स्वागत करता है। ऐसा ही स्वागत इस शहर ने किया था, रोहन का। रोहन कुछ सालों पहले ही मुंबई के G M C कॉलेज में अपनी MBBS की पढ़ाई के लिए आया था। MBBS पूरी करने के बाद, GMC से ही अब अपनी 1 साल की इंटर्नशिप भी पूरी करने वाला था। ये उसके इस शहर में 6 साल खत्म होने को थे, और शायद उसकी किस्मत का एक नया अध्याय शुरू होने को। रोहन को कुछ हफ्तों में ही प्लेसमेंट में बैठना था, और इसी घबराहट में वो कैंपस से बाहर निकल कर कुछ देर के लिए टहलने चला आया था। जब उसने वापस अपने होस्टल की और जाने का सोचा, तो बहुत देर हो चुकी थी। देर रात होस्टल से बाहर रहने के लिए अगर वार्डन ने पकड़ लिया, तो आज तो रोहन की खैर नही थी। होस्टल की ओर वापसी के लिए रोहन ने अभी कुछ कदम ही लिए थे कि, उसे एक तेज़ रफ़्तार से आती हुई कार की आवाज़ सुनाई दी। उसने सर उठा कर चारों तरफ देखा, तो एक कार बड़ी ही तेजी से, उसके सामने वाली रोड से चली आ रही थी। कार की आवाज़ और उसकी स्पीड को देख कर साफ समझ आ रहा है कि इसके ड्राइवर ने कार पर से कंट्रोल खो दिया है, और कार का एक्सीडेंट होना तय है। रोहन के देखते देखते ही वो कार रोहन को पार करके कुछ ही दूरी पर बने रोड डिवाइडर से, बुरी तरह जा टकराई। टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि, कार डिवाइडर से टकराते ही 2 - 3 फुट ऊपर उछल कर रोड के दूसरी ओर उल्टी जा गिरी। कार की हालत को देखते हुए, उसे चलाने वाले कि हालत का अंदाजा लगा पाना ही मुश्किल था। देर रात की वज़ह से कम ही लोग उस समय रोड पर मजूद थे, वरना इस घटना में जख्मियों की संख्या भी बढ़ सकती थी। रोहन ने अपनी सूझ बूझ से तुरंत एम्बुलेंस को फ़ोन कर, घटनाक्रम और इमएजेंसी का व्यख्यान किआ। और अपनी प्राथमिक चिकित्सा की योग्यता का सही उपयोग किया।


     रोहन भाग कर उस कार तक पहुंचा, और कार के अंदर बैठी सवारियों की हालत का जायज़ा लिया। उसे ड्राइवर सीट के अलावा कोई और व्यक्ति उस कार में नज़र नही आया। वो तुरंत ड्राइवर सीट की तरफ भागा, और कार का उस तरफ का गेट खोलने की कोशिश की। इतनी बुरी टक्कर के बाद वो दरवाज़ा जाम हो चुका था, लेकिन वहाँ मौजूद लोगों की मदद से, रोहन वो दरवाजा खोलने में सफल हुआ। दरवाजा खुलते ही ड्राइवर का हाल सबके सामने था। ड्राइवर ने सीट बेल्ट लगाया हुआ था, जिससे उसके बाकी के शरीर मे तो कोई बाहरी चोट रोहन को नही दिखाई दी, लेकिन शायद स्टेरिंग व्हील से सर टकराने की वजह से, उसके सर में गहरी चोट साफ नजर आ रही थी, उसके माथे से खून भी बह रहा था, और वो बेसुध सी हालात में कार की ड्राइविंग सीट पर उल्टा लटका हुआ था। रोहन ने उस ड्राइवर की बॉडी का जल्दी से चेकअप किआ, उसके हाथ की कलाई को पकड़ कर, उसकी धड़कनों का जायज़ा लिया। और लोगो की मदद से उसे कार से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा। जब रोहन ने उसके सीट बेल्ट को खोलकर, ड्राइवर को बाहर निकलने की कोशिश की, तब रोहन के नज़र उस ड्राइवर के चेहरे पर पड़ी। रोहन के मुँह से, भरभराई सी आवाज़ निकली..... "वेद!!!!!"। कुछ पल को उसके हाँथ काँपने लगे। उसकी आँखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा। अभी तक वो जो महज़ डॉक्टर बन कर अपना काम बड़ी ही निपूर्णता से कर रहा था, लेकिन अब इस शख्स को पहचानने के बाद, उसके हांथों ने काम करना ही बंद कर दिया था। उसकी आँखों से आँसुओ की धार बह चली थी। उस शख़्स की नाज़ुक हालत को समझते हुए भी, अगर उसे जल्द जल्द नीचे ना उतारा गया, तो उसके दिमाग मे खून का प्रेशर बढ़ने से उसकी जान बचाने में आने वाली मुश्किलों को भी अच्छे से जानते हुए भी, रोहन का दिमाग एक दम सुन्न हो चुका था। गनीमत हुई कि, एम्बुलेंस वहाँ पहुंच गई, और ड्राइवर को कार से बाहर निकाल लिया गया। रोहन को रोते हुए देख, एम्बुलेंस अटेंडर ने उसे भी साथ हॉस्पिटल चलने को कहा, और रोहन भी रोते हुए बेहवास सा उसी एम्बुलेंस में जा बैठा, जिससे उस ड्राइवर को स्ट्रेचर पर लिटा कर ऑक्सिजन दी जा रही थी। एम्बुलेंस अपनी फुल स्पीड से हॉस्पिटल की ओर दौड़ पड़ी। एम्बुलेंस अटेंडर रोहन से, मरीज के बारे में सवाल पर सवाल किए जा रहा था, लेकिन रोहन बुत बना बस वेद को देखे जा रहा था, और रोये जा रहा था। एम्बुलेंस अटेंडर ने इसे PTSD समझते हुए, जब रोहन की आँखों मे टोर्च की रोशनी से देखा, तो रोहन को एक पुराना किस्सा याद आया।


Flash Back :- 8 साल पहले, आधी रात को, ग्वालियर में रोहन के घर की छत पर।


रोहन :- "यार ये मोबाइल की टॉर्च सीधे मेरी आँखों पर मत डालो, मुझे वैसे ही कुछ नही दिखाई दे रहा है।"


वेद :- "shhhhhhhhhh..... सभी को उठाना है क्या??" (फुसफुसाते हुए)


रोहन :- (धीमी आवाज़ में) "तो किसने बोला था तुम्हे इस वक़्त यहाँ रोमियो जूलिएट खेलने को?? कल से मैं तुम्हारे स्कूल में ही तो आने वाला हूँ, वहीं मिल लेते।"


वेद :- (रोहन के गालों पर अपने हांथ रखते हुए) "मेरा बस चले तो मैं कभी तुमको खुद से दूर ना जाने दूं।"


रोहन :- (हँस कर वेद के हाँथो को झटकते हुए) "सबके सामने मेरा हाँथ तो पकड़ने में डर लगता है, और बाते सुनो बड़ी बड़ी।"


वेद :- "यार मूड मत खराब करो, तुम जानते हो, सब मज़ाक उड़ाएंगे हमारा। चलो अब मुझे एक किस दो जल्दी से।"



      रोहन अपने ख्यालों से तब बाहर आता है, जब उस घायल व्यक्ति को एम्बुलेंस से बाहर निकाला जा रहा होता है। GMC के एमरजेंसी वार्ड के लिए ये कोई नई घटना नहीं थी। यहाँ तो ना जाने कितने ऐसे एक्सीडेंट के मरीज रोज़ लाये जाते हैं। कुछ की हालत गम्भीर और कुछ की बहुत ज्यादा नाज़ुक भी होती है। अब इस घटना ने कितना बुरा असर डाला है मरीज के ऊपर उसी की जांच तुरंत हॉस्पिटल में जाते ही शुरू कर दी जाती है। उधर एमरजेंसी वार्ड के नाईट शिफ्ट का कुछ स्टाफ रोहन को पहचान लेता है। और उससे पूछताछ करने लगता है। "ये कैसे हुआ??" "आपको तो कहीं चोट नही आई है??" "क्या आप मरीज को जानते हो??" इस तरह के कुछ और भी सवाल, बार बार रोहन से पूछे जाते हैं। लेकिन रोहन अपनी आँखों में बस अतीत के आँसू लिये वहाँ चुप चाप खड़ा रहा। तभी वहाँ एक नर्स, उस मरीज के कपड़ों से निकले कुछ सामान को लेकर वहाँ आयी। जिसमे था उसका पर्स, एक रुमाल, एक डाइमंड की रिंग, एक लाइटर और एक सिगरेट की डिब्बी, और एक मोबाइल। रोहन के लिए वो समान देख पाना भर ही बहुत मुश्किल होता जा रहा था। क्योंकि इन सामानों में से कुछ को वो बहुत ही अच्छे से जनता था, और कुछ को उसने खुद खरीदा और खरीदवाने में मदद भी की थी। वो पर्स जिसपे बड़े से अच्छर में V बना हुआ था, उसके उड़ते हुए रंग और उसके निकलते धागों से काफी पुराना सा नज़र आता था। पुराना नज़र आये भी क्यों ना, क्योंकि सच में यह पर्स 7 साल पुराना था। जो कि रोहन ने ही वेद को उसके जन्मदिन पर गिफ्ट दिया था। जैसे ही रोहन ने वो पर्स को अपने हाँथ में लिया उसे वो ग्वालियर के किले की रात याद आ गयी, जब रोहन ने ये पर्स वेद को दिया था।


 

Flash Back :- 7 साल पहले, फरवरी की रात 8 बजे, ग्वालियर किले पर।


वेद :- (आँखे बंद किये हुए) "अरे बाबा!! अब खोलू क्या में अपनी आँखें???"


रोहन :- (हांथों में एक छोटा सा केक और उर पर लगी एक जलती हुई कैंडल लिए) "हैप्पी बर्थडे टू यू, हैप्पी बर्थडे डिअर वेद, हैप्पी बर्थडे टू यू..... "


वेद :- (मुस्कुराकर कैंडल को फूँक मारकर बुझाते हुए) "थैंक्यू मेरी जान!!!! (केक काट कर रोहन को खिलाते हुए) और मेरा बर्थडे गिफ्ट???"


रोहन :- (वेद को केक खिलाते हुए) "सब्र करो, वो भी है, पहले ये केक तो खालो......... हाँ तो ये है आपका Customize Gucci Wallet"


वेद :- (पर्स को घुमा फिरा कर देखकर) "इतने रुपये खर्च करने की क्या जरूरत थी रोहू???? मैं तो अपने बाड़े वाले पर्स से भी खुश हो जाता।"


रोहन :- (हँसते हुए) "बात पैसों, ब्रांड और लोकल वाली नही है वेद, तुम्हारे लिए ये एक छोटी सी चीज लाने में मैंने जितनी मेहनत की है, तुम तो बस उससे मेरे प्यार का अंदाज़ा लगाओ।"


वेद :- "कैसी मेहनत रोहू??"


रोहन :- "तुम्हें याद है मैं अभी कुछ दिनों पहले एग्जाम के लिए दिल्ली गया था??"


वेद :- "हाँ!!!! अच्छे से याद है, और मेरा इतना कहने के बाद भी मुझे साथ नही ले गए थे।"


रोहन :- "अरे मैं ये वॉलेट लेने ही तो गया था। यहाँ भी मिल रहा था, लेकिन मैंने स्पेशली तुम्हारे लिए ये V शब्द वाला वॉलेट बनवाना था, तो मुझे दिल्ली ही जाना पड़ा इसे लेने।"


वेद :- (रोहन को गले लगाते हुए) "थैंक्यू सो मच रोहू। मुझे तुम्हारा ये गिफ्ट बहुत ज्यादा पसंद आया। मैं इसे हमेशा अपने साथ ही रखूंगा।"



      रोहन का ख्याल उसके हाँथो से वो पर्स लिए जाने पर टूटा। एक नर्स उस पर्स के अंदर कोई ऐसा कागज़ ढूंढना चाहती थी, जिससे इस लाये गए मरीज की पहचान के बारे में, उसके घर परिवार के बारे में पता लगाया जा सके। क्योंकि उस घायल मरीज को बेहोशी छाई हुई थी, और उसके साथ मे आये रोहन ने भी अब तक कुछ नही बोला था। तभी रोहन की नज़र पड़ी उस डाइमंड रिंग पर, जो उसे अच्छे से अभी तक याद थी।


Flash back :- 7 साल 6 महीने पहले, रात के 9 बजे, बैजाताल ग्वालियर।


वेद :- "देखो मैं ये तुम्हारे लिए लाया हूँ।"


रोहन :- (दुखी मन से) "किसे बहलाने की कोशिश कर रहे हो, मुझे पता है ये किसके लिए है।"


वेद :- "अच्छा लाओ अपना हाँथ तो दो, पहना कर तो देखू कैसी लगती है ये रिंग तुम्हारी उंगलियों में।"


रोहन :- "मत परेशान करो यार वेद, मुझे नही अच्छा लग रहा अब ये मज़ाक।"


वेद :- (मायूस होकर) "मज़ाक तो मेरा बना रहे हैं। वहाँ मेरे घरवाले और यहाँ तुम।"


रोहन :- "मैं मज़ाक बना रहा हूँ तुम्हारा??? वहाँ तो चुप चाप सबकी हाँ में हाँ मिलाते रहते हो। इतनी बड़ी स्माइल के साथ सारी शॉपिंग, और ये अपनी सगाई की अँगूठी खरीद रहे हो, और बोल रहे हो मैं मज़ाक बना रहा हूँ। मज़ाक तो तुमने हमारे रिश्ते का बना दिया है वेद!!"


वेद :- "तो क्या करूँ मैं?? आत्महत्या करलूँ या भाग जाऊं घर से?? बोलो क्या करूँ मैं??"


रोहन :- (वेद के चेहरे को अपने हाँथों में पकड़ते हुए) "उन्हें सब सच बता दो वेद, थोड़ा गुस्सा करेंगे, हो सकता है कुछ दिन हम दोनों से नाराज़ भी रहें, लेकिन फिर सब ठीक हो जाएगा।"



     रोहन का ख्याल उस नीचे गिरी सिगरेट की डिब्बी और लाइटर की आवाज़ से टूटा। जो कि एक नर्स के हाँथ से छूट कर नीचे गिर गई थी। रोहन ने उसे ज़मीन से उठाया।



Flash back :- 7 साल पहले, जनवरी की दोपहर के 2 बजे, ग्वालियर मेले में।


रोहन :- (वेद के जेब पर हाँथ लगाते हुए) "ये सिगरेट और लाइटर क्यों रखते हो साथ, सिगरेट तो नही पीते तुम?"


वेद :- "अरे कॉलेज में थोड़ा दिखावा करना पड़ता है।"


रोहन :- "सिगरेट का दिखावा, सबके सामने मुझसे दूर रहने का दिखावा और क्या क्या करोगे दिखावे के लिए?"


वेद :- "यार तुम हमेशा यही सब बातें क्यों करने लगते हो?"


रोहन :- "क्योंकि तुम मुझे कभी सही जवाब ही नही देते हो। कहीं तुम्हे मेरे साथ शर्म तो नही आती??"


वेद :- "फिर बकवास शुरू करदी। यार समझो बात को, आज कल सभी नोटिस करते हैं, तुम्हे अच्छा लगेगा क्या, की लोग हमारा मज़ाक उड़ाए?"


रोहन :- "यार इतनी लोगो की परवाह करोगे, तो मेरी परवाह कब करोगे?"



   रोहन का ख्याल एक बार फिर टूटा, जब एक नर्स ने उस पर्स में से निकली एक फोटो को रोहन को दिखा कर बोला,


नर्स 1 :- "रोहन सर!! ये आप ही हैं ना इस फ़ोटो में??"



     जो फ़ोटो उस पर्स में से निकली थी, उसमे 4 लोग थे। रोहन, वेद, दिव्यांश और वेदिका। रोहन को वो फ़ोटो देख कर, वो सभी पुराने किस्से, वो बातें याद आने लगे, की कैसे ये चारों दोस्त हुआ करते थे। और कैसे सारे दिन स्कूल और एक दूसरे के घरों में मस्ती किआ करते थे। लेकिन आज की हक़ीक़त भी ज्यादा देर रोहन से दूर न रह सकी। जब एक नर्स ने आकर उन सभी को घायल मरीज की हालत के बारे में अवगत कराया।


नर्स 2 :- "आप लोगो को मरीज के बारे में कोई जानकारी मिली??? आप लोग जल्दी पता कीजिये, उसकी हालत बहुत नाजुक है। डॉ मजूमदार का कहना है कि, उसे अंदरूनी गहरी चोट है। अगर खून का बहना नही रोका तो वो कोमा में भी जा सकता है। डॉ ने मुझे आपको सूचना देने के लिए ही भेजा है। हम उसे आपरेशन के लिए तैयार कर रहे हैं। आप लोग पुलिस को सूचना दीजिये, और जल्द से जल्द उसके घरवालों को ढूंढने की कोशिश कीजिये।"



      नर्स की ये बातें, रोहन को भीतर तक आघात पहुंचा चुकी थीं। रोहन का दिमाग फिरसे सुन्न हो चुका था, उसे कुछ समझ ही नही आ रहा था कि उसने जो कुछ भी अभी नर्स के मुँह से सुना, वो एक बुरा सपना है या हक़ीक़त। रोहन बेसुध होकर गिरने ही वाला था, की वहां उपस्थित स्टाफ ने उसे संभाला और उसे सुरक्षित स्थान पर ले जाकर बैठाया। उसे पीने के लिए पानी से भरा ग्लास भी दिया। पानी पीने के बाद रोहन ने थोड़ा अपना होश संभाला। उसने तुरंत अपने हाँथो को जोड़, आँखें बंद कर, मन ही मन भगवान को याद किया, और भगवान से मांगा की वो कैसे भी वेद को बिल्कुल ठीक कर दें। उसने अपनी आँखे खोली और वेद के घरवालों को इस घटना की सूचना पहुंचाने के बारे में सोचने लगा। उसने वेद के सामान में से उसका फ़ोन निकाला। उस मोबाइल को खोलने के लिए एक पासवर्ड की जरूरत थी। रोहन ने थोड़ी देर सोचा, फिर वेद की जन्मतिथि उस मोबाइल में अंकित की, लेकिन वो गलत पासवर्ड निकला। फिर रोहन ने वेद की सगाई की तारीख अंकित की, लेकिन यह भी गलत पासवर्ड निकला। रोहन ने थोड़ी देर सोचा, वेद सबसे ज्यादा अपनी मम्मी को चाहता है, तो उसने वेद की मम्मी की जन्मतिथि उस मोबाइल में अंकित की, लेकिन यह भी एक गलत पासवर्ड निकला। कुछ देर और सोचने के बाद, रोहन एक और तारीख उस मोबाइल में अंकित की, और इस बार वो मोबाइल खुल चुका था। यह एक सही पासवर्ड था, जिससे रोहन की आँखों मे आँसू भर आते हैं, क्योंकि उसने जो तारीख़ मोबाइल में डाली, वो वही तारीख़ थी, जब वेद ने उसके सामने अपने प्यार का इज़हार पहली बार किआ था। 



    मोबाइल खुलते ही, मोबाइल के वॉलपेपर पर अपनी ही एक हंसती हुई फ़ोटो को देख कर, रोहन के चेहरे पर भी एक हल्की सी मुस्कान छा गयी थी। उसने तुरंत ही कांटेक्ट लिस्ट खोली, और रोहन के घरवालों के नंबर खोजने लगा। लेकिन रोहन को उस मोबाइल की कांटेक्ट लिस्ट देख कर बड़ा ही आश्चर्य हुआ, उसमे ना तो वेद की मम्मी, ना ही उसके पापा और ना ही उसके किसी और रिश्तेदार का नंबर उस लिस्ट में नही था। रोहन ने एक बार फिर, वेदिका का नंबर ढूंढने की कोशिश की, लेकिन उसे बड़ा ही ताज़्जुब हुआ, क्योंकि उस लिस्ट में ना ही वेदिका का नंबर था, और ना ही उसमें दिव्यांश का नंबर था। और उस कांटेक्ट लिस्ट में जितने भी नंबर थे, वो सभी डॉ के नाम से ही संजोए हुए थे। और उनमें से कोई भी नंबर ऐसा नही था, जो रोहन पहचानता हो। अब वेद के घरवालों को खबर पहुंचाने का रोहन को बस एक ही रास्ता नज़र आ रहा था। कि वो ग्वालियर में अपने घर फ़ोन करके, वेद के घर तक इस हादसे की खबर पहुंचाए। लेकिन उसे वो वक़्या भी याद आता है, की उसके मुम्बई आने से पहले कैसे वेद के घरवालों ने सारे मोहल्ले के सामने, रोहन के घरवालों को ज़लील किआ था, और उन्हें अपना खुद का पुश्तैनी घर छोड़कर जाने पर मजबूर कर दिया था। इसी उधेड़बुन में 2 घंटे बीत चुके थे। और वेद का आपरेशन भी सफलतापूर्वक खत्म हो चुका था, और ज्यादा गंभीर चोट ना होने की वजह से अब वेद खतरे से भी बाहर आ चुका था। इस बात की जानकारी उसी नर्स ने रोहन और बाकी के स्टाफ को आकर दे दी थी। रोहन ने भी अब चैन की सांस ली थी, की वेद सही सलामत है, और किसी भी खतरे में नही है, की तभी उसके दिमाग मे दिव्यांश का एक पुराना मोबाइल नंबर याद आया। उसने वो फ़ोन नंबर तुरंत अपने मोबाइल से डायल किआ और 2 सेकंड बाद ही उस नंबर पर फोन लगने की घंटी भी सुनाई देने लगी। रोहन मन ही मन भगवान से मिन्नत करने लगा कि, दिव्यांश अभी भी यही नंबर इस्तेमाल करता हो, तो उसे उसके घरवालों को इन सब मे नही खींचना पड़ेगा। और जब उसे दूसरी तरफ से एक जानी पहचानी आवाज सुनाई दी, तब उसे थोड़ी तसल्ली हुई। फिर भी उसने धीमी सी आवाज में पूछा "क्या ये दिव्यांश अग्निहोत्री जी का नंबर है?" और जब उसने सामने से हाँ का प्रतिउत्तर सुना, तो उसने फ़ोन काट दिया।


     इन सभी बातों के बाद रोहन के चेहरे से मायूसी खत्म होकर हल्की सी मुस्कान आयी ही थी, की उसने पुलिस को हॉस्पिटल में आते देखा, और उसकी वो हँसी तुरंत ही गायब भी हो गयी। उसने दिव्यांश का मोबाइल नंबर स्टाफ को दिया, और उस नंबर पर वेद के बारे में सारी जानकारी देने को बोला। उसने वहां उपस्थित सभी स्टाफ को पुलिस को इस केस में अपनी भागीदारी के बारे में कुछ भी ना बोलने के लिए मना लिया। और वेद के पर्स से निकली उस तस्वीर को अपने साथ लेकर वहां से अपने होस्टल की तरफ निकल आया। उधर ग्वालियर में दिव्यांश को हॉस्पिटल की तरफ से वेद के बारे में सारी जानकारी दे दी गयी, और वेद के परिवारजनों को जल्द से जल्द मुम्बई आने के लोए भी बोल दिया गया।



      दिव्यांश जहाँ वेद के हुए एक्सीडेंट और उसके आपरेशन के बारे में जानकर दुखी तो था ही, लेकिन 2 सालों के बाद वेद के बारे में मिली ये पहली जानकारी के बारे में जानकर, बेहद खुश भी था। ये खबर मिलते ही उसने ग्वालियर में 2 फ़ोन किये, एक तो वेद के मम्मी पापा को, और उन्हें तुरंत मुंबई चलने को तैयार होने के लिए भी कहा। और दूसरा फ़ोन उसने किआ वेदिका को।


दिव्यांश :- (फ़ोन पर ख़ुशी और दुख के मिलेजुले एहसाह के साथ) "बहन!!! वेद मिल गया!!! मिल गया मेरा दोस्त!!"


वेदिका :- (खुशी से रोते हुए) "भाई प्लीज कह दो की ये मज़ाक नहीं है। मुझे मेरे कानों पर भरोसा नही हो रहा है भाई!!"


दिव्यांश :- "हाँ बहन!! यही सच है, वो मिल गया है, लेकिन एक बुरी खबर भी है, उसका एक्सीडेंट हो गया है, उसका आपरेशन हुआ है...."


वेदिका :- (बीच मे ही दिव्यांश को रोकते हुए) "क्या एक्सीडेंट??? ऑपरेशन??? भाई वो ठीक तो है ना??"


दिव्यांश :- "हाँ वेदु वो ठीक है, तू तैयारी कर ले, मैंने अंकल-आंटी को भी खबर दे दी है, सुबह यहाँ से डायरेक्ट फ्लाइट है मुम्बई के लिए, हम सुबह ही निकल जाएंगे।"


वेदिका :- "मुम्बई!!! वेद मुम्बई में क्या कर रहा होगा भाई?? वहाँ क्यों गया होगा वो??"


दिव्यांश :- "अब ये तो वहाँ जाके, और उससे बात करके ही पता चलेगा ना, की आखिर उसने ऐसा क्यों किआ!! चल अब तू तैयारी कर, मैं सुबह आजाऊँगा तुझे लेने।"


    

   वेदिका खुशी खुशी फ़ोन रख देती है, और पास ही मेज़ पर रखी एक तस्वीर उठाती है। ये वही तस्वीर होती है जो मुम्बई में वेद के पर्स से मिली होती है। उस तस्वीर को वेदिका अपने गले से लगती है।


वेदिका :- "आख़िरकार तुम मिल ही गए वेद, अब देखना अब मैं तुम्हे कभी खुद से दूर नही जाने दूंगी। ये 2 साल मैंने कैसे बिताए हैं तुम्हारे बिना, ये बस मैं ही जानती हूँ। अब मैं तुम्हे इतना प्यार दूंगी, की तुम उसे हमेशा के लिए भूल जाओगे, और बस मेरे ही बन कर रहने पर मजबूर हो जाओगे।"



     उधर मुम्बई के GMC कैंपस के होस्टल के अपने कमरे की खिड़की पर खड़े होकर, रोहन भी उस फ़ोटो को अपने गले से लगा कर रो रहा होता है। अपने घरवालों, ग्वालियर, अपने दोस्तों, और अपने पहले प्यार के साथ बिताए हंसी पलों को याद कर रहा होता है। और उस कसम को याद कर रहा होता है, जिस कसम ने सब कुछ बदल दिया होता है।



      

  क्या थी वो कसम जो वेद और रोहन के बीच की दूरियां बन गयी थी। दिव्यांश और वेदिका का इस कसम से क्या संबंध था। आगे की कहानी या यूं कहें, की बीती ज़िंदगी की कहानी को जानने के लिए बने रहिये रोहन के साथ। 


      






      









Tuesday, December 8, 2020

एक किस्सा पुराना - Final Part

If you didn't read the first part of this story than please read it first, than you will get easily be connected with this final part.


     पुराने किस्सों को भूलकर, नीरज ने अपनी आंखों से बहते आंसुओं को पोंछा, और आगरा जाने की तैयारी करने लगा। दरअसल आगरा से उसने अपना संबंध, अपनी शादी के बाद से खत्म ही कर लिया था। उसने अपना ट्रांसफर दिल्ली के विश्वविद्यालय में करवा लिया था। और अब वह एक दिल्ली के विश्वविद्यालय के कॉलेज में प्रोफेसर के तौर पर कार्य करता था। आगरा से मम्मी पापा भी अब उसी के साथ आकर रहने लगे थे। तो उनका आगरा से अब संबंध पूरी तरह से खत्म ही हो चला था। पर आज मधुर की ज़िद में उसे फिर से उस शहर में जाने को विवश कर दिया था, जिसके साथ दर्द जुड़ा हुआ था। दरअसल मधुर को अंदाजा ही नहीं था, कि इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद भी उसके सीने में चिंगारी बनकर वह यादें आज भी धधक रही होंगी।


"हाय मधुर!!!" उसे देखकर मधुर चहक पड़ा।


मधुर :- (नीरज को गले लगाते हुए) "कब से इंतजार कर रहा था तेरा!!! मुझे यकीन था कि तू मुझे निराश नहीं करेगा!"


नीरज :- (मुस्कुरा कर) "तुझे कैसे इंकार करता??"


    मधुर उसका हाथ पकड़कर अंदर ले गया। अधिकतर रिश्तेदार आ चुके थे। घर में खूब गहमागहमी दिख रही थी।


मधुर :- "नीरज देखना!! तुझे बहुत अच्छा लगेगा। जितने भी फ्रेंड्स इस शहर में है, आज सब से मुलाकात हो जाएगी तेरी। आज फिर कॉलेज की यादें ताजा हो जाएगी।"


     वह जोश में बोलता जा रहा था, पर नीरज का दिल आशंका से सहम गया।


नीरज :- (धड़कते दिल से प्रश्न करते हुए) "कौन-कौन आ रहा है मधुर??


मधुर :- "एकता, श्वेता, प्रियंक, प्रदीप...!"


नीरज :- "और????"


मधुर :- (अनजान बनते हुए) "और किसे बुलाना था???"


     मधुर शरारत से हंस पड़ा, उत्तर में नीरज खामोश रह गया।


मधुर :- "लगता है कोई चिंगारी अभी भी दबी पड़ी है, तेरे सीने में!!"


नीरज :- "मैंने उसे जुनून की हद तक चाहा था मधुर, वो ज़ख्म आज भी नासूर बनकर टीस देता है मुझे!!"


मधुर :- "मुझे लगता था कि वक्त बड़े से बड़ा घाव भर देता है, तू अब अपनी ज़िंदगी मे व्यस्त हो चुका है, तो वह निशान बाकी नहीं रहे होंगे। (मधुर किसी आशंका में डूब गया) ये इश्क नहीं आसान बस इतना समझ लीजिए एक आग का दरिया है, और डूब कर जाना है।" (मधुर के चेहरे पर भी अफसोस के भाव उभर आए थे।)"


     दिनभर आपाधापी में गुजर गया। शाम को सभी सहपाठी आ चुके थे। उनसे मिलकर बहुत खुशनुमा एहसास हो रहा था। रह रह कर ठहाके लग रहे थे। कितनी ही यादें ताजा हो गई थी। लगता था कि वक्त ठहरा हुआ है। 20 वर्ष का लंबा अंतराल कभी गुजरा ही नहीं था। जयमाला हो रही थी, कि तभी गहरे नीले रंग के सूट और सुर्ख टाई में अविनाश आता नजर आया। अब उसने फ्रेंच कट दाढ़ी रख ली थी। आंखों पर चश्मा भी था। आज भी वह नीरज को बहुत हैंडसम लग रहा था। नीरज की आंखों में पल भर को एक चमक सी उभरी, फिर गम के बादलों ने उसे घेर लिया। वह झट से उसकी तरफ पीठ फेर कर खड़ा हो गया। मुश्किल से संभाला हुआ दिल फिर से मचलने लगा। उसे देखकर जी चाहा कि सब कुछ भूल जाए, और दौड़ कर उसके पास चला जाए।


      अविनाश की नजरें भी बेचैनी से नीरज को तलाश रही थी। आखिर हल्के पीले रंग के, पटोला प्रिंट सिल्क के कुर्ते में, उसकी ओर पीठ किए, नीरज को उसने तलाश ही लिया। नीरज के लिए ही तो वो आज बरसों बाद किसी फंक्शन में आया था। "अब कैसा दिखता होगा??" वह जानने की उत्सुकता थी, पर वह जल्दी में ना था। चुपचाप बैठ गया। कई सहपाठी उसे नजर आए पर किसी से बात करने का दिल नहीं किया। थोड़ी देर बाद नीरज पलटकर मधुर के साथ कहीं चल दिया। शरीर थोड़ा भर गया था, चेहरे पर बढ़ती वयस की परिपक्वता दिख रही थी। बालों में आई हल्की सी सफेदी, और वही सादगी भरा अंदाज, अविनाश को अपनी ओर खींच रहा था। नीरज जब तक उसे दिखाई देता रहा, वह अपनी आँखों मे गहरी चाह लिए, उसे देखता रहा।


मधुर :- (नीरज के कानों में फुसफुसाते हुए) "नीरज, अविनाश शायद तुझसे बात करना चाहता है।"


नीरज :- (व्याकुल होकर) "नहीं!!! मैं उससे नही मिलना चाहता।"


मधुर :- "क्यों??? क्या हर्ज़ है मिलने में??"


नीरज :- "तू समझ सकता है यार।"


मधुर :- "इतना बड़ा फ़ैसला लेने वाला, अब इतने सालों बाद इतना कमज़ोर क्यों पड़ रहा है??"


नीरज :- "मैं सचमुच कमज़ोर पड़ जाऊंगा उसके सामने मधुर, प्लीज उसे रोक दे।"


मधुर :- (जोर देते हुए) "कैसे रोक दूं यार??? कोई वाज़िब वज़ह भी तो हो!! देख, तेरे कसम देने पर, मैंने उसे आज तक तेरे बारे में कुछ नही बताया। तू एक बार उससे मिल तो ले। उससे बात करके तुझे भी अच्छा लगेगा और उसे भी।"


नीरज :- "उससे मुलाकात के डर से ही मैं आगरा नहीं आना चाहता था।"


मधुर :- "यार मुझे लगा कि इतने सालों के बाद तुम दोनों एक दूसरे को देख कर, मिल कर बहुत खुश होगे। इसीलिए मैंने उसे भी इन्वाइट किआ था, और देख, वो बस एक फ़ोन कॉल पर ही यहां आ भी गया।"


      कुछ देर और नीरज को समझाने के बाद, मधुर उसका हाँथ पकड़ कर उसे एक टेबल तक ले आया, जहां अविनाश पहले से ही बैठा हुआ था।


मधुर :- "थैंक्यू अविनाश, तुम मेरे एक फ़ोन करने पर ही यहाँ आ गए।"


अविनाश :- (नीरज को देखते हुए) "मुझे तो आना ही था मधुर।"


मधुर :- (नीरज को वहां पड़ी कुर्सी पर बैठा कर) "चलो तुम दोनों बातें करो, मैं थोड़ा काम निपटा कर आता हूँ।"


अविनाश :- (भारी मन से) "कैसे हो??"


नीरज :- (आँखे चुराते हुए) "अच्छा हूँ। तुम कैसे हो?"


अविनाश :- (मुस्कुरा कर) "जैसा छोड़ कर गए थे, वैसा ही हूँ। और बताओ, घर मे सब कैसे है। मैंने सुना, अंकल आंटी भी अब दिल्ली ही शिफ्ट हो गए हैं।"


नीरज :- "हाँ, मेरे जाने के बाद वो लोग काफी अकेले पड़ गए थे, तो फिर मैंने उन्हें भी वहीं बुला लिया!!! तुम बताओ, घर मे सब कैसे हैं???"


अविनाश :- "हाँ सब ठीक हैं। बड़े भैया को मथुरा में नौकरी मिल गयी थी, तो मम्मी पापा उनके साथ ही चले गए थे।"


नीरज :- "आंटी अभी भी नाराज़ हैं क्या??"


अविनाश :- "नहीं अब नहीं!!! अब सब पहले जैसा ही है।"


नीरज :- "सुनकर अच्छा लगा। और तुम्हारा बिज़नेस कैसा चल रहा??"


अविनाश :- "हाँ, सब अच्छा चल रहा है।"


नीरज :- (हिचकिचाते हुए) "और शादी????"


अविनाश :- "हाँ, वो भी अच्छी चल रही है। बहुत अच्छा और समझदार है मेरा लाइफ पार्टनर।"


नीरज :- (छनाक से टूटे दिल को संभालते हुए) "साथ ले कर क्यों नही आये, हम सब से भी मिल लेती वो।"


अविनाश :- "मैं सबकी नजर से बचा कर रखता हूँ उसे। तुम भी तो अकेले ही आये हो??"


नीरज :- (आँखों मे आयी नमी को छुपाते हुए) "हाँ वो, मम्मी पापा को अकेला नही छोड़ सकता था ना।"



     कुछ देर और यूँही दोनों इधर उधर की बातें करते रहे। और दोनों ही एक दूसरे का मन टटोलते रहे। लेकिन अब तक नीरज ने अपनी नज़रे झुकाए रखीं थीं, या वह इधर उधर देख कर ही अविनाश से बातें कर रहा था। उसने अब तक अविनाश की आँखों मे देख कर एक बार भी बात नही की थी। 


अविनाश :- "चलो नीरज अब मैं चलता हूँ। मैं तो बस यहां तुम्हें देखने चला आया था। लेकिन शायद मैं इस लायक भी नही, की तुम नज़रें उठा कर मुझसे बात कर सको।"


     अविनाश ये कह कर, बिना नीरज को कुछ और कहे, वहां से उठकर चला गया। उसके वहां से जाने के बाद, नीरज अविनाश जाते ही देखता रहा, जब तक वह उसकी नज़रों से ओझल ना हो गया। इस वक़्त तक नीरज की आँखों से आँसुओ की धारा बह चुकी थी। अविनाश से बात करते समय उसने एक बार को तो सोचा कि वह अपने बारे में अविनाश को सब सच बता दे, लेकिन अविनाश के लाइफ पार्टनर के बारे में जानने के बाद, उसने कुछ भी कहना उचित नही समझा था। कुछ देर बाद मधुर नीरज के पास आया।


मधुर :- "अविनाश कहाँ गया नीरज???'


नीरज :- (अपने आँसू पोंछते हुए) "वो चला गया।"


मधुर :- "तूने उसे सब बता दिया या नहीं???"


नीरज :- "मुझे जरूरी नही लगा उसे बताना, इसलिए नही बताया!!"


मधुर :- "लेकिन क्यों यार!! मैंने तुम दोनों को इसीलिए तो बुलाया था यार, की कम से कम अब तो तुम दोनों एक दूसरे को सब सच बताओगे, और शायद इसके बाद सब ठीक हो जाएगा!!"


नीरज :- "अब हमारे बीच कुछ ठीक नही हो सकता मधुर!!"


मधुर :- "लेकिन क्यों यार??? तूने मुझे कसम दी, इसलिए आज तक ना ही मैने उसे तेरे बारे में कुछ बताया, और ना ही तूने मुझे उसके बारे में कुछ बताने दिया। लेकिन यार आज तो सही मौका था, तुझे सब सच बता देना चाहिए था। मैंने ऐसा करने की कितनी बार कोशिशें की, लेकिन तूने एक नही सुनी। लेकिन मुझे यकीन था कि जब तुम लोग आज मिलोगे तो सब सही हो जाएगा। फिर तूने उसे क्यों नही कुछ बताया यार नीरज??"


नीरज :- "कैसे बताता यार, मैने पूछा उसके बारे में, वो खुश है अपनी ज़िंदगी मे, अपने लाइफ पार्टनर के साथ!!"


मधुर :- "कौनसा लाइफ पार्टनर???"


नीरज :- "मतलब???'


मधुर :- " उसने शादी नहीं कि है नीरज, और अंकल आंटी के जाने के बाद तो वो बिल्कुल अकेला सा पड़ गया है। तूने मुझे कभी बताने भी तो नही दिया उसके बारे में। इसीलिए तो मैं तुझे हर बार यहां आने के लिए कहता था। ताकि तू खुद देख ले आकर। और तूने भी ना जाने किस उलझन में, यहां वापस आने में 20 साल लगा दिए।"


नीरज :- "ये तू क्या कह रहा है मधुर?? अवि ने खुद मुझसे कहा है, की वो खुश है अपने लाइफ पार्टनर के साथ।"


मधुर :- "अब मुझे नहीं पता कि उसने ऐसा क्यों कहा तुझसे, लेकिन जहाँ तक मुझे पता है, उसने अपने बारे में तेरी शादी के वक़्त ही अपने घर मे बता दिया था। बहुत लड़ाई झगड़ा भी हुआ उसके घर मे इस बात को लेकर। और बदनामी के डर से, उसके मम्मी पापा और भाई, ये शहर भी छोड़ कर चले गए। और तब से वो अकेला ही रहता है।"


नीरज :- "तो उसने मुझसे जो कहा वो सच था या झूंठ!!"



     इसी उधेड़बुन को अपने दिल मे लिए, मधुर के कहने पर, नीरज निकल पड़ा अविनाश के घर की ओर। आखिर इस बात का सही जवाब तो उसे अविनाश से ही मिल सकता था, की वो सच बोल रहा था, या मधुर। और फिर नीरज को भी तो उसे अपना सच बताना था। इसी कश्मकश में नीरज जा पहुंचा अविनाश के घर। और बहुत ही असहजता से अविनाश के घर का दरवाज़ा भी खटखटा भी दिया।


अविनाश :- (दरवाजा पर नीरज को खड़ा देखकर) "मैंने इस दिन की कभी उम्मीद भी नही की थी।"


नीरज :- "अंदर आने को नही कहोगे??"


अविनाश :- "अपने ही घर मे आने के लिए इजाजत की जरूरत नही होती। ये तुम्हारा ही घर है।"


नीरज :- (घर मे अंदर आकर, यहाँ वहाँ देखते हुए) "तो कहाँ छुपा रखा है, अपने लाइफ पार्टनर को??"


अविनाश :- (मुस्कुरा कर) "वो तो हमेशा से मेरे दिल मे ही है। उसे कहीं छुपाने की जरूरत ही नहीं।"


नीरज :- (अविनाश की ओर मुड़ते हुए) "अविनाश क्या तुम मुझे एक बात सच सच बताओगे??"


अविनाश :- (नीरज से नज़रे चुराते हुए) "मुझे पता है नीरज तुम क्या जानने आये हो यहाँ। लेकिन जिस रास्ते जाना नही, उसका पता पूछ कर क्या करना। तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि हम इस बारे में कभी बात ही ना करें।"


नीरज :- (मुस्कुरा कर) "चलो ठीक है, तुम ना बताना चाहो, लेकिन मैं कुछ बताना चाहता हूं। (थोड़ी देर की खामोशी के बाद) मैंने जो तुमसे फंक्शन में कहा, वो सब झूठ था। मैं अब शादी शुदा नहीं हूँ। मेरा तलाक शादी के 2 महीने बाद ही हो गया था। क्योंकि मैं अपनी बीवी को पति का कोई भी सुख नही दे पाया था। और फिर तलाक के कुछ समय बाद, मम्मी पापा ने दूसरी शादी के लिए कहा। तो मैं खुद को नही रोक पाया, और मैंने उन्हें मेरे बारे में सब सच बता दिया। तबसे मैं अकेले ही अपना जीवन जी रहा हूँ।"


अविनाश :- (आँखों मे आँसू लिए) "तो तुम्हे इतने साल क्यों लग गए मेरे घर के दरवाजे तक आने में?? तुम्हे खुद पर भरोसा नही था, या मुझ पर?"


नीरज :- "किस मुँह से आता अविनाश। मेरे एक गलत फैसले की वजह से, मैं एक ज़िन्दगी तो खराब कर ही चुका था। मैं तुम्हारे लिए भी बेबसी का सबब नही बनना चाहता था।"


अविनाश :- "मैंने तुमसे प्यार किआ था नीरज, और आज भी उतना ही करता हूँ। तुम मेरे लिए कभी भी अफसोस का कारण नही बन सकते।"


नीरज :- "मैं तुमसे एक सवाल पूंछना चाहता हूँ जो कभी तुमने मुझसे पूछा था। क्या तुम मेरे साथ रहोगे? मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ अविनाश।"


       अविनाश ने आगे बढ़ कर नीरज को अपने गले से लगा लिया। और दोनों ही एक दूसरे को गले लगा कर, जी भर कर रोये, और दोनों के बीच में आयी 20 साल की दूरी को, उन आँसुओं ने दूर किया।


      खैर, इस किस्से में तो 20 साल के बाद भी, किसी का प्यार मुक्कमल हो गया। लेकिन ये किस्से कहानियां, जरूरी नही की असल जिंदगी में भी अपना असर दिखा पाए। तो इस किस्से से आप सभी को एक सीख लेने की बेहद जरूरत है। कभी भी जल्द बाजी में, या फिर किसी के भी दबाव में, ऐसा कोई फैसला ना लें, जिससे आप के साथ साथ किसी और का भी जीवन प्रभावित हो। हमेशा वही करने की कोशिश करें, जिसमे आपका दिल और दिमाग साथ हो। हो सकता है, ऐसे फैसले, आपके अपनो को कुछ समय के लिए नाराज भी कर जाए, लेकिन कुछ समय की नाराजगी, जीवन भर की यातनाओं से कई गुना आसान होगी। और शायद उससे आपको अपने जीवन को प्यार से भरने में, 20 सालो का समय भी ना लगे।



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Lots of Love

   Yuvraj ❤️



















Wednesday, December 2, 2020

एक किस्सा पुराना -Part I

Hello friends,

                       I am again here to present my new story, hope you like it as well. 


    ये कहानी है आज से 30 साल पहले की, जब इस समाज मे समलैंगिकता को बहुत ही ज्यादा बुरी नज़र से देखा जाता था। खैर, उस नज़रिए में तो आज भी कुछ ज्यादा बदलाव नही आया है। लेकिन तब तो बात कुछ और ही थी, तब तो समलैंगिकता एक कानूनी अपराध भी हुआ करता था। और उस पर ये समाज और इसकी बाते, किसी भी समलैंगिक इंसान को दोहरी ज़िन्दगी जीने पर विवश कर ही देती थीं। आपको भी अब मैं एक पुराना किस्सा सुनाता हूँ, जो 1990 के आस पास का है, जब इस देश मे अपने मन की बात किसी को बताने से ज्यादा आसान, नए नए आये कंप्यूटर को चलाना सीखना था।



 नीरज :- (फ़ोन पर अपने दोस्त से बात करते हुए) "कोशिश करता हूं आने की!!"


मधुर :- "कोशिश नहीं नीरज!!! तुझे आना है बस, कैसे भी!"


नीरज :- "हां देखता हूं!!"


मधुर :- "अरे फिर देखता हूं!!! तुझे आना है, मतलब आना है। कोई बहाना नहीं चलेगा।"


नीरज :- "हां!! ओके बाय!!"


         उसने फोन रख दिया। दिलो-दिमाग में गहरी उथल-पुथल मच चुकी थी। अब आगरा जाना पड़ेगा। वह इस शहर में जाने से जितना बचना चाह रहा था, अब जाना उतना ही जरूरी हो गया था। उसका कोई बहाना अब नहीं चलने वाला था। मधुर कुछ सुनने को तैयार ही नहीं था। मधुर की बेटी की शादी थी, ऐसे में उसका प्रिय मित्र ना आए, यह कैसे हो सकता था भला???  बरसों बाद तो मुलाकात का एक मौका मिला था। असमंजस की स्थिति में नीरज अपनी उंगली में पड़ी अंगूठी को इधर-उधर घुमाने लगा।


      नाजुक सी सोने की अंगूठी, जिसमें बीच में नीले रंग का एक बड़ा सा झिलमिलाता हुआ जरकिन का नग लगा हुआ था। यह अंगूठी जो कभी अविनाश ने दी थी, उसे तोहफे में। जिसे वह शादी के इतने साल बाद भी नहीं उतार पाया था। शादी के वक्त अगर किसी ने उससे पूछा भी था, कि वह अपनी सगाई की अंगूठी की जगह, यह अंगूठी क्यों पहनता है??  तो उसने सिर्फ यही जवाब सबको दिया था, कि सगाई वाली अंगूठी डायमंड की है, और वह अक्सर अंगूठी उतार कर इधर-उधर रख देता है, ऐसे में अगर खो गई तो नुकसान हो जाएगा। जबकि यह हल्की है, और इसे बरसों से पहनने की आदत है। लेकिन वह अंगूठी ना उतारने के पीछे की असल वज़ह तो सिर्फ नीरज का दिल ही जानता था।


     उसके जेहन में वह आकर्षक चेहरा उभरने लगा, जिसकी याद आज भी नासूर बनकर उसके दिल में पल रही थी। लंबा कद, गोरा रंग, सौम्य - शालीन व्यक्तित्व । अविनाश उस बैच का सबसे हैंडसम लड़का था। बहुत कम बोलता था, अक्सर डायरी में न जाने क्या लिखता रहता था। कॉलेज में जब नीरज ने दाखिला लिया, तो जिस शख्स ने सबसे पहली बार उसका ध्यान आकर्षित किया था, वह अविनाश था। कई बार नीरज की उस पर नजर पड़ी, तो उसने अविनाश को अपनी ओर देखते पाया। निगाह मिलते ही, झेंप कर वह दूसरी ओर देखने लगता था।


     नीरज दुबला पतला, आकर्षक युवक था। गेहूंआ रंग, सलीके से बने बाल, स्मार्ट, भव्य व्यक्तित्व, उसका खुशमिजाज व्यवहार, हर बात पर खिलखिलाना, किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। कॉलेज में आते ही उसकी, काव्या से दोस्ती हो गई थी। देखने में काव्या गोरी रंगत की सामान्य सी दिखने वाली युवती थी।


       उस दिन भी दोनों खाली समय में कुछ और मित्रों के साथ महाविद्यालय के परिसर में साथ बैठे गप्पे मार रहे थे। इधर उधर की बातें करते हुए, चर्चा का विषय अपने सहपाठियों पर गया। कौन किस में रुचि लेता लग रहा है, कौन लल्लू लगता है, कौन बहुत डेशिंग है। यही सब बातें हो रही थी। तभी काव्या ने शर्माते हुए बताया, कि उसे भी कोई पसंद आ गया है। बहुत पूछने पर बोली कि उसे अविनाश बहुत पसंद है। वही लड़का जो आज ब्लू जींस और ब्लैक शर्ट में कॉलेज आया था।


    यह सुनकर नीरज का मन आहत हो उठा। जैसे उसके अधिकार क्षेत्र में कोई और अनाधिकृत रूप से प्रवेश कर रहा हो। तभी काव्या ने उसके समक्ष प्रस्ताव रखा, कि वह अविनाश के साथ उसकी दोस्ती करवा दे। नीरज असमंजस में पड़ गया, काव्या से कैसे कहता, कि अविनाश तो उसके हृदय में धड़कन बनकर धड़क रहा है। पल भर सोचता रहा, फिर उसने निश्चय किया कि वह काव्या से मित्रता कर लेने का प्रस्ताव लेकर अविनाश के पास अवश्य जाएगा। स्वयं के लिए तो कुछ कहने का प्रश्न ही नहीं उठता था। उन दिनों में लड़कों का लड़कों के लिए ह्रदय धड़कने की बात ही, आसमान टूट गिरने की बात के बराबर हुआ करती थी। और उस पर नीरज तो अन्य युवकों से भी बढ़कर संकोची था।


     तभी काव्या ने नीरज को चुटकी काटी, तो वह चौंक पड़ा। सामने से अविनाश निकल रहा था। नीली जींस और उस पर काली शर्ट उसके उजले रंग पर बहुत फ़ब रही थी। तभी ना जाने अविनाश किन ख्यालों में गुम, वहाँ रुक गया। जेब से उसने नन्ही सी डायरी और पेन निकाला और कुछ लिखने लगा। तभी "एक्सक्यूज मी" कहता हुआ नीरज तेज कदमों से उसकी ओर बड़ा। अविनाश ने निगाह उठाई तो नीरज को देख कर उसके चेहरे पर पल भर को एक चमक सी दौड़ गई। नीरज ने उससे कहा कि उसकी एक मित्र उससे मित्रता करना चाहती है। जब अविनाश ने उस मित्र का नाम जानना चाहा, तो नीरज ने काव्या की ओर इशारा कर दिया। अविनाश ने उधर देखा तो उसका चेहरा एकदम भाविन था। नीरज समझ नहीं पाया कि वह क्या सोच रहा है। जब उसने पुनः प्रश्न किया, तो अविनाश ने इस प्रस्ताव पर सहमति की मुहर लगा दी। नीरज को महसूस हुआ, जैसे उसके हृदय में कहीं कुछ चुभ सा गया है। उसे ना जाने क्यों आशा थी कि शायद अविनाश इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देगा। परंतु उसकी सहमति उस उम्मीद पर तुषारपात कर गई थी। फिर कुछ संभल कर उसने अपना परिचय भी दिया, कि उसका नाम नीरज है। तो अविनाश बड़े ही खुशगवार ढंग से मुस्कुराया और बोला, वह उसे जानता है। नीरज को उसका जवाब बड़ा अच्छा लगा। वह शरारत से मुस्कुराया।


नीरज :- 'जानकर अच्छा लगा कि आप कम से कम मुझे जानते तो हैं!!"


अविनाश :- "हां कुछ लोग बहुत जल्दी सबका ध्यान अपनी ओर खींच पाने में सक्षम होते हैं!!"


नीरज :- "ओह!! अपनी यह क्वालिटी तो मुझे पता ही नहीं थी।"


अविनाश :- (मुस्कुराकर) "ओके चलता हूं। सी यू टुमारो।"


नीरज :- "अरे काव्या से हेलो तो कह दीजिए।"


       नीरज ने कहा तो अविनाश ने एक बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर दृष्टि डाली। फिर उसके साथ काव्या की तरफ बढ़ गया। थोड़ी देर वो लोग आपस में बातें करते रहे। फिर अविनाश चला गया।


      "तू सच में बहुत अच्छा दोस्त है" अविनाश के जाते ही काव्या ने नीरज को गले लगा लिया।  इसके बाद चल निकला बातों का सिलसिला। मौका मिलते ही वे तीनों बातें करने बैठ जाते। अविनाश को शेरो शायरी के साथ, छोटे-छोटे गिफ्ट्स, कार्ड्स देने का बहुत शौक था। अक्सर वह काव्या को कार्ड और गिफ्ट देता था। पर नीरज को हैरानी होती थी, जब साथ में उसके लिए भी कार्ड और गिफ्ट होता था। बातों का मौका बहुत कम मिलता था, इसलिए दिल की बात कहने के लिए खत का सहारा लिया जाता था। अब तक सभी सहपाठियों के बीच काव्या और अविनाश की ही चर्चा थी। जब काव्या के साथ अविनाश, नीरज को भी खत लिखा करता था, तो नीरज सोचता था कि, उसकी दोस्त पर क्या गुजरती होगी यह सब देख कर!!  बेशक अच्छा तो नहीं लगता होगा। पर काव्या ने ऐसा कुछ कभी जाहिर नहीं होने दिया था।


    एक दिन पूरे सप्ताह भर की अनुपस्थिति के बाद नीरज कॉलेज गया। तो साइकिल स्टैंड पर अविनाश ने उसे रोक लिया। और ना आने का कारण पूछने लगा। नीरज ने बताया कि स्वास्थ्य ठीक ना होने के कारण वह नहीं आ पाया था। कुछ देर इधर-उधर की बात करके उसने बताया कि, 1 दिन पहले बात करते हुए काव्या ने उसे कहा है, कि वह अविनाश से प्रेम करने लगी है। नीरज यह सुनकर चौक पड़ा। क्योंकि काव्या ने उससे तो कुछ नहीं कहा था इस विषय में। अविनाश काफी गंभीर था, और बताने लगा कि उसने तो इस विषय में अब तक कुछ सोचा नहीं है। वह नीरज से सुझाव मांगने लगा, कि इस स्थिति में उसे क्या करना चाहिए। नीरज ने उसे आश्वस्त किया, कि वह काव्या से बात करके पता लगाएगा कि उसके मन में क्या है। अविनाश तो उसके जवाब से संतुष्ट होकर चला गया, पर नीरज के दिलों दिमाग में हलचल मच गई। यह सब सुनकर उसे अच्छा नहीं लगा था। उसने अपना स्कूटर स्टैंड पर लगाया, और कक्षा में जाकर काव्या के आने का इंतजार करने लगा।"      


     काव्या आई तो नीरज को देखकर प्रसन्न हो गई। उसके ना आने का कारण पूछा, वजह बता कर थोड़ी देर औपचारिक बातें होती रहीं। फिर नीरज ने उससे आखिर पूछ ही लिया, कि वह अविनाश के साथ किस हद तक गंभीर है। काव्या के यह कहने पर कि, अच्छा मित्र है, बस इससे ज्यादा वह कुछ नहीं सोच सकती, क्योंकि उसके परिवार वाले काफी पुरानी सोच रखते हैं। इस पर नीरज ने पूछा कि यदि ऐसा है, तो उसने अपने प्रेम का इजहार क्यों किया??  नीरज के मुंह से यह सुनते ही काव्या भड़क गई।


काव्या :- (झल्लाते हुए) "अरे यार बात करते हुए थोड़ा सेंटी हो गई थी, तो बोल दिया आई लव यू। पर उसने भी तुझे आते ही बता दिया??"


नीरज :- "वह परेशान है!!"


काव्या :- "यह लो!!! इसमें परेशानी की क्या बात है?? मैंने कौन सा उससे शादी करने को बोला है??"


नीरज :- "पर काव्या ऐसी बातें यूं ही नहीं बोल दिया करते!!"


काव्या :- "एक बात बता नीरज, तुझे प्रॉब्लम क्या है??? क्या मैं हर बात तेरी परमिशन लेकर बोला करूं???"


नीरज :- "तू तो बेकार ही नाराज हो रही है!!"


काव्या :- "बेकार क्यों?? वह जब बात करेगा, तो तेरे साथ करेगा। मुझे कार्ड या गिफ्ट देगा, तो तुझे भी देगा। मुझे लेटर लिखेगा, तो तुझे भी लिखेगा। कभी अकेले में मैं कुछ कहूं, तो वह झट से तुझे बता देगा, और तू पूछताछ करने चला आएगा। चल क्या रहा है तुम लोगों के बीच में??"


नीरज :- "काव्या!!!" (नीरज काव्या के उखड़े स्वर को सुनकर हैरान रह गया) 


काव्या :- "माना कि तूने हमारी फ्रेंडशिप करवाई है, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि अब हमेशा तेरे साए में ही जीना होगा मुझे!!"


नीरज :- (हैरानी से काव्या को देखते हुए) "सॉरी मुझे नहीं पता था कि तू इतना बुरा मान जाएगी।"


काव्या :- "बुरा मानने वाली बात ही है नीरज।"


नीरज :- "ओके चलता हूं!! देर हो रही है।" (कहकर नीरज वहां से उठ खड़ा हुआ)


        नीरज ने इस तरह के प्रतिउत्तर की उम्मीद बिल्कुल भी काव्या से नहीं की थी। इसके बाद वह काव्या से दूरी बरतने लगा। काव्या भी उससे कटी कटी सी रहने लगी। दोनों ही अब दोस्तों के अलग-अलग समूहों में रहने लगे। बातचीत भी बिल्कुल बंद हो गई थी। कभी-कभी सामने पड़ने पर औपचारिकतावश मुस्कुरा देते थे। अविनाश ने उन दोनों को अलग-अलग देखा, तो बात करने की कोशिश की। पर काव्या उसकी भी उपेक्षा करके वहां से चली गई। कई दिन इसी तरह से गुजरे, फिर एक दिन रास्ते में अविनाश ने नीरज को रोक लिया और कहीं चल कर बात करने पर दबाव डालने लगा। बहुत मना करने पर भी जब वह नहीं माना, तो नीरज उसके साथ एक रेस्टोरेंट में चला गया।


     वहां पहुंचकर अविनाश ने पहला प्रश्न यही किया, कि उन दोनों दोस्तों के मध्य क्या हुआ है? वे दोनों एक साथ क्यों नहीं दिखाई देते? पहले तो नीरज ने टालने की कोशिश की, फिर अविनाश के बहुत जोर देने पर, बता दिया, कि उस दिन उसके रिश्ते की गंभीरता के विषय में पूछ लेने पर काव्या बहुत बुरा मान गई थी। साथ ही उसने अविनाश को आगाह भी कर दिया कि, काव्या उसे लेकर जरा भी गंभीर नहीं है। जिस दिन उनका आठ छूटेगा, वह पलट कर नहीं देखेगी। इस पर अविनाश ने बताया कि उसे भी यही शक था, इसलिए उसने नीरज की मदद मांगी थी। उसने यह भी बताया कि, वह काव्या की ओर जरा भी आकर्षित नहीं था, पर उसके मित्रता प्रस्ताव को महज इसलिए स्वीकार कर लिया था, क्योंकि उसके पास यह प्रस्ताव लेकर आने वाला नीरज था। और वह उसके लिए कुछ भी कर सकता था। यह सुनकर नीरज आश्चर्य में पड़ गया। उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा। उसने एक नए दृष्टिकोण से अविनाश की ओर देखा, तो उसकी आंखें बहुत कुछ कहती नजर आईं।


    फिर अविनाश ने यह राज भी खोला की काव्या ने उससे अपने दिए गए पत्र व कार्ड्स वापस मांग लिए थे। अविनाश को यह बहुत नागवार गुजरा था, कि काव्या ने उस पर भरोसा नहीं किया था। नीरज को भी यह जानकर बहुत बुरा लगा था। अविनाश जैसा इंसान क्या इन चीजों का कोई गलत इस्तेमाल कर सकता था??? लेकिन उस दिन की मुलाकात ने, दोनों के ही बीच मे सबकुछ बदल सा दिया था। जहाँ नीरज अविनाश के लिए अपनी भावनाओं से पहले ही अवगत था, अब उसे अविनाश की नज़रों और उसकी बातों में खुद के लिए एक अलग ही जगह साफ साफ दिखाई देने लगी थी। और धीरे धीरे समय के साथ दोनों ने बिना एक दूसरे के सामने अपने मन की बातों का इज़हार कर, एक दूसरे को अपना भी लिया था। 


      अब नीरज मधुर और उसके कुछ और दोस्तों के साथ रहने लगा था। इस बात का अविनाश और नीरज दोनों ने खास ख्याल रखा था, कि कॉलेज में वे कोई भी बात आपस में ना करें। पर अक्सर बातें और मुलाकातें होने लगी। कभी रेस्टोरेंट में, कभी उसके घर, तो कभी अविनाश के घर। नीरज के घर भी सभी लोग अविनाश को अच्छे से जानते थे, और अविनाश के साथ नीरज की दोस्ती को लेकर भी उन्हें कोई समस्या नहीं थी। बल्कि सभी अविनाश को बहुत पसंद भी करते थे। उधर अविनाश के यहां भी यही माहौल था। अविनाश बहुत अच्छा कुक भी था। कभी-कभी साउथ इंडियन डिश बनाता, तो नीरज को घर जरूर बुलाता था। और नीरज हंसकर कहता था।


नीरज :- "जानते हो अवि तुम मुझे क्यों पसंद हो, क्योंकि तुम कुकिंग बहुत अच्छी करते हो।"


अविनाश :- "और मुझे तुमने आज तक एक कप चाय भी बना कर नहीं पिलाई है। नीरज कुछ सीख लो वरना, शादी के बाद तुम्हारी पत्नी तुमसे बहुत नाराज रहा करेगी!!!"


नीरज :- "क्या करना है?? मैं गृह कार्य में दक्ष इंसान से शादी करूंगा। मेरी शर्त यही होगी कि, लड़का सुंदर सुशील और घर के कामकाज करना जानता हो, कमाने का काम तो मैं कर ही लूंगा।"


अविनाश :- "लड़का????? ऐसा कह पाओगे??? और  किस बिचारे की किस्मत फूटेगी तुमसे शादी करके।"


नीरज :- "एक बेचारे को तो आजकल मैं परख भी रहा हूं।"


अविनाश :- "अच्छा!!! तुम्हें पता भी नहीं लगेगा कि, मैं परिंदा बनकर कब फुर्र हो जाऊंगा।"


नीरज :- "सबसे पहले परिंदे के पर ही कतर दूंगा, उड़ने की सोच भी नहीं पाएगा।"


      नोकझोंक यूं ही चलती रही और वक़्त तेजी से गुजरता गया। ऐसे ही स्नातक का अंतिम वर्ष भी निकल गया, और मुलाकातें बहुत कम हो गई। अविनाश ने कॉलेज छोड़ दिया और जीविका कमाने की फिक्र में लग गया। पिता बैंक मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे, और बड़ा भाई कुछ करता नहीं था। तो घर को चलाने की सारी जिम्मेदारी अविनाश के ही कंधे पर थी। उधर नीरज ने भी एम ए के साथ टीचिंग भी शुरू कर दी थी। और उन दिनों कंप्यूटर सीखने पर जोर दिया जाने लगा था, तो उसने भी कंप्यूटर कोर्स जॉइन कर लिया था। समय की बहुत कमी हो गई थी। अब संपर्क एकदम से टूट ही गया था। दुनिया भर की बातें हुई थी, दोनों के मध्य, सिर्फ एक बात को छोड़कर। चाहत का इकरार किसी ने भी नहीं किया था। नीरज ने भी बिना इकरार किए कई कोशिशें तो की थी, लेकिन अविनाश ने अपनी उलझनो के चलते, नीरज की उन कोशिशों पर ज्यादा ध्यान भी नहीं दिया था।


      समय की कमी की वजह से नीरज ने अविनाश के घर भी जाना बंद कर दिया था। और इसी बीच वे लोग किराए का मकान छोड़कर अपने नए घर में शिफ्ट कर गए थे। जो नीरज के घर से काफी दूर था। अविनाश ने कभी उसे जोर देकर आने को भी नहीं कहा था। "क्या सचमुच अविनाश नाम का परिंदा उड़ चुका था??? जब वह यह सोचता था, तो उसकी आंखें भीग जाया करती थी। आखिर क्या है अवि के मन में???  क्यों मुझसे दूर होता जा रहा है??? क्या उसकी जिंदगी में कोई और आ चुका है??? या वो मेरे लिए वैसा महसूस ही नही करता, जैसा मैं उसके लिए करता हूँ??" ढेरों सवाल थे नीरज के मन मे, जिनका जवाब या तो अविनाश को पता था, या भगवान को।


      जब तन्हा बैठता बेचैनियां हावी होने लगती थी। उस वक़्त अविनाश के घर फोन था, पर नीरज के यहां तब तक नहीं लगा था। एक दो बार उसने पीसीओ जाकर फोन किया भी, तो कभी आंटी और कभी भैया ने फोन उठाया। औपचारिक बातें करके उसने फोन रख दिया। बार-बार फोन करने में झिझक लगती थी, जबकि यह भी निश्चित ना हो कि फोन उठाने वाला शख्स कौन होगा। अक्सर अविनाश के पुराने खतों का ढेर उठा कर बैठ जाता, उन्हें पड़ता और पुरानी बातें याद करके सिसकता रहता। उसके ढेरों कार्ड्स, गिफ्ट्स, पर्ची पर लिखकर दी हुई शेरो शायरी। सब बड़ा संभाल कर रखी हुई थी। उसे याद आता, कैसे एक बार अविनाश के देरी से कॉलेज आने पर, उसने नाराज होकर मुंह फेर लिया था। अविनाश ने कई बार उसे देख कर मुस्कुराया, तो उसने शिकायती अंदाज से घूर दिया। किसी के सामने वे बात करते नहीं थे। इसलिए हर बात चुपके से खतों के माध्यम से ही होती थी। नीरज के अभिन्न मित्र मधुर के सिवा किसी को उनके मध्य पनपे इस अनुरागात्मक संबंध की जानकारी नहीं थी। और उस समय के हिसाब से, मधुर काफी खुले विचारों का व्यक्ति था, तो उसे इस रिश्ते से कोई परहेज भी नही था। और वो उन दोनों की काफी मदद भी किआ करता था। उस दिन अविनाश ने मधुर के हाथों एक छोटा सा कार्ड भिजवाया। जिसमें सिर्फ दो पंक्तियां लिखी हुई थी।


 बार-बार पढ़िए हमें, न फेंकिए इस कदर,

हम आपके दोस्त हैं, कोई शाम का अखबार नहीं।


    यह पढ़ते ही उसके होठों पर एक प्यारी सी मुस्कान छा गई। उसने निगाह उठाकर उसे देखा तो मानो वह निहाल हो गया। कितनी ही बार अविनाश उसकी उसके स्कूटर की डिक्की में सुर्ख गुलाब अटका जाता, जिसे नीरज बड़े यत्न से किताबों में सहज लेता। आहिस्ता आहिस्ता अविनाश कब उसके दिल की गहराइयों में बस चुका था, उसे खबर भी ना हुई थी। रिसता हुआ जख्म नासूर का रूप लेने लगा था, और जख्म देने वाले को खबर भी नहीं थी। नीरज ने खुद को बहुत व्यस्त कर लिया था, ताकि उसे वो पुराने किस्से, वो पुरानी यादें, परेशान ना करें। पर रात की तन्हाई में वे उसे जकड़ ही लेते थे। पूरी रात आंखों में गुजर जाती, तकिए में जज़्ब हुए आंसू, कितनी ही बेचैन रातों के खामोश गवाह बन जाते थे।


    एक दिन संडे को उसकी छुट्टी थी, और दिन काटना मुश्किल लग रहा था। बेचैनी के आलम में वह बेमकसद घर से निकल पड़ा। निगाहे हर जगह उस एक चेहरे को ही ढूंढ रही थी, कि काश वह कहीं से आ जाए।  "नीरज"  एक जानी पहचानी हुई आवाज आई, पलट कर देखा तो बाइक पर अविनाश बैठा हुआ मुस्कुरा रहा था। साथ में उसका कोई दोस्त भी था।


नीरज :- (थरथराती आवाज़ में)  "वॉट अ प्लेज़ेंट सरप्राइज अवि!! आई मिस यू अलॉट!!"


अविनाश :- "मी टू!!! मीट माय फ्रेंड, वासु!"


नीरज :- (वासु की और हाँथ बढ़ाते हुए) "हेलो!!"


वासु :- (मुस्कुरा कर) "अवि ने बहुत कुछ बताया है आपके बारे में, मिलने की बड़ी इच्छा थी। चलिए आज मुलाकात भी हो गई।"


     वासु ने ऐसा बोला तो सुनकर नीरज को बहुत अच्छा लगा।


अविनाश :- "कहां जा रहे हो??"


नीरज :- "यूं ही बस!!"


अविनाश : "टाइम है???"


नीरज :- "हाँ, बोलो ना!!!"


अविनाश :- "पास ही वासु का घर है, वहाँ चलें???"


नीरज :- (एक पल सोचकर) "हाँ!! चलते हैं।"


     कितना कुछ था कहने को, पता नहीं कुछ कहने का मौका भी मिलेगा या नहीं। पर वह मुश्किल से हाथ आए इस मौके को छोड़ना नहीं चाहता था। वासु के परिवार में सभी बहुत प्यार से उससे मिले। मालूम पड़ता था, कि अविनाश के उनसे घनिष्ठ संबंध हैं। नीरज सबसे हंस बोल तो रहा था, पर उसकी बेचैनी चेहरे से साफ झलक रही थी। फिर एक-एक करके वे सभी उन दोनों को वहां अकेला छोड़ कर चले गए।


अविनाश :- "क्या सोच रहे हो???"


नीरज :- (भरे गले से) "अवि क्या तुम्हें कभी मेरा ख्याल नहीं आता?? बिल्कुल भुला दिया है तुमने मुझे???"


अविनाश :- "क्या तुम्हें लगता है कि ऐसा हो सकता है??"


नीरज :- "तो क्या वजह है इस बेरुखी की??"


अविनाश :- "बेरुखी नहीं है नीरज सिर्फ मजबूरी है। जानता हूं कि तुम्हारे जहन में इस वक्त ढेरों सवाल है, पर फिलहाल में जवाब देने की स्थिति में नहीं हूं।"


नीरज :- "जवाब के लिए कब तक इंतजार करूं अवि??"


अविनाश :- (नज़रे चुराते हुए) "पता नहीं!!!!! अरे तुम्हारा तो जन्मदिन आ रहा है 2 दिन बाद, बताओ कहां ट्रीट दे रहे हो??"


नीरज :- "बोलो कहां चाहिए??"


अविनाश :- "चलो उस दिन हम ढेर सारा वक्त साथ गुजारेंगे। ओके, पहले एक मूवी देखेंगे, फिर लंच करेंगे।"


नीरज :- (चेहरे पर छाई खुशी के साथ) "ओके!!" 


     जब नीरज अविनाश से विदा लेकर घर आया, तो 2 दिन का इंतजार करना भारी पड़ने लगा। कब वह घड़ी आएगी जब वह प्रिय व्यक्ति उसके पास होगा, ढेरों बातें होंगी, गिले-शिकवे, बहुत कुछ था कहने सुनने को। सदियों के समान एक-एक पल गुजरा। जन्मदिन पर बहुत उत्साहित था वह। बहुत समय बाद उसने खुद को संवार कर आईने में देखा, अपने ही प्रतिरूप पर मुक्त हो उठा। उसने नई नीले रंग की शर्ट और वाइट पेंट पहना था। बाहर निकलने को हुआ, तो फिर से आईने में देखा। "नहीं!!! ऐसे नहीं जाऊंगा"। थोड़ा सोच विचार कर, ब्लू जीन्स और लाइट येलो रंग की टीशर्ट पहन ली।


मम्मी :- "अरे अच्छा तो लग रहा था नए कपड़ों में, फिर बदल क्यों लिए??"


नीरज :- (घर से बाहर आते हुए) "यूं ही बस, मन नही किआ उन्हें पहनने का।"


     हालांकि उसे खुद को भी वजह समझ नहीं आ रही थी। पिक्चर हॉल पहुंचा, तो अविनाश उसके इंतजार में बाइक पर बैठा था। उसे सर से पांव तक निहारा, फिर कुछ अलग अंदाज में मुस्कुरा दिया। 


अविनाश :- "हैप्पी बर्थडे!!"


नीरज :- "थैंक्स!! ऐसे क्यों मुस्कुरा रहे हो??"


अविनाश :- "ऐसे मतलब??"


नीरज :- "तुम्हारी स्माइल कुछ कह रही है, बहुत राज भरी लग रही है??"


अविनाश :- "हम्ममम्म!!!  लीव इट!!"


नीरज :- "क्यों बताओ ना क्या हुआ???"


अविनाश :- "पता है, आने से पहले मैं शेव कर रहा था। तो ख्याल आया कि तुम आज क्या पहन कर आओगे। फिर ख्वाहिश हुई कि तुम ब्लू जींस और येलो टीशर्ट में आओ, इसमें तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो।


नीरज :- (आश्चर्य से) "तुम्हें हैरानी होगी अवि,  कि मैंने आने से पहले दूसरे कपड़े पहने थे। फिर न जाने क्यों उन्हें पहन कर आने का दिल नहीं हुआ। तो मैंने यह कपड़े डाल लिए।"


अविनाश :- "देखो इसे कहते हैं टेलीपैथी!!"


नीरज :- "हाँ सचमुच, उस दिन भी मैं तुमसे मिलने को बेकरार था, यूँही घर से निकल पड़ा था, और तुम मुझे रास्ते मे मिल भी गए।"


अविनाश :- "हाँ नीरज, हमारा रिश्ता बेमिसाल है।"


      दोनों सिनेमाघर में जा बैठे, और पिकचर भी शुरू हो गई। दोनों के बीच की खामोशी को नीरज ने ही तोड़ा।


नीरज :- "तुमने कहा बेमिसाल रिश्ता??? इस रिश्ते में इतनी तकलीफ़ मेरे ही हिस्से क्यों है अवि??? इस कदर बेचैनी मेरी जान ले लेगी!!"


अविनाश :- "ख़ामोश!!! ऐसी बातें मत करो नीरज, ये दिन भी गुज़र जाएंगे।"


नीरज :- (साँस छोड़ते हुए) "हाँ!! वक़्त कब रोके रुका है, निकल ही जायेगा।"


अविनाश :- "आज इतनी ना उम्मीदी भरी बातें मत करो। जो होता है अच्छे के लिए होता है। अपना बर्थडे गिफ्ट नहीं देखोगे।"


      कहते हुए उसने एक नाजुक सी अंगूठी निकाली, जिसके बीच में लगा बड़ा सा जरकिन का नग चमक रहा था। आहिस्ता से नीरज की अनामिका में पहना दी।


नीरज :- "सो ब्यूटीफुल!!"


अविनाश :- "खासतौर पर तुम्हारे लिए ऑर्डर देकर बनवाई थी।"


नीरज :- "आई लव इट!!"


अविनाश :- (शरारती अंदाज में) "और मुझसे???"


नीरज :- (कृत्रिम गुस्से से) "तुम इस लायक नहीं!!"


अविनाश :- (मायूसी से) "सच में?"


     अविनाश ने उदास होकर कहा, फिर खामोश हो गया।


नीरज :- "अरे तुम तो उदास हो गए, मजाक कर रहा था यार। अब हर बात यूं दिल पर मत लो।"


         दोनों हाथों में हाथ लिए बैठे रहे, पर खामोशी पसर गई थी। नीरज डबडबाई आंखों से स्क्रीन पर आंखें जमाए रहा। और अविनाश ना जाने किन ख्यालों में गुम था। इंटरवल के बाद इधर-उधर की बातें होती रही, पर मन की बात कहने से दोनों बचते रहे। दिन फिर पहले की तरह ही गुजरने लगे, राते सिसकती रहीं। कितने ही अनसुलझे सवाल थे, लेकिन जवाब कौन देता। घर में अब नीरज की शादी के लिए लड़की की तलाश तेज हो गई थी। चाह कर भी वह कुछ नहीं कर सकता था। आखिर किस बिनाह पर मना करता सब को। अविनाश ने  भी तो आज तक उससे कुछ कहा ही नहीं था। काश कि कभी बताता कि उसके दिल में है क्या। भविष्य को लेकर क्या सोचता है वह। एक दिन नीरज की विवाहिता बड़ी बहन, जो आगरा में ही रहती थी। घर आई, तो उसे बताया, कि उन्हें एक दिन रास्ते में अविनाश मिला था, और उसने बोला था कि नीरज को उसे कॉल करने के लिए बोलिएगा। पर वह उसे यह बात बताना भूल गई थी। यह सुनकर वह बेचैन हो उठा। कुछ दिन पहले ही उसके घर में फोन लग गया था। बड़ी बेकरारी से दिन गुजरा, उसने रात में मौका मिलते ही, अविनाश का नंबर डायल किया। "हैलो!!" उस तरफ से फिर से उसकी मां थीं।


नीरज :- 'नमस्ते आंटी!! नीरज बोल रहा हूं!!!"


अविनाश की मम्मी :- "नमस्ते बेटा!! कैसे हो? अब तो तुम ना घर आते हो ना फोन करते हो??"


नीरज :- "जी मैं ठीक हूं!! टाइम ही नहीं मिलता। पढ़ाई, टीचिंग इन सब में ही पूरा दिन निकल जाता है।"


अविनाश की मम्मी :- "अच्छा है बिजी हो।  खाली दिमाग शैतान का घर बन जाता है, जैसे हमारे बेटे का बना हुआ है।"


नीरज :- "अवि घर पर है आंटी???"


अविनाश की मम्मी :- "नहीं बेटा। वो जयपुर गया है किसी काम से। कोई खास बात???"


नीरज :- "नहीं बस यूं ही सोचा हालचाल ले लूँ।"


      कहकर उसने बात टाल दी। पर मन में बड़ी कोफ्त हुई कि जब फोन करो कभी नहीं मिलता। मन फिर मायूस हो गया। "बहुत हो गया अब मैं भूल जाऊंगा उसे। जब उसे मेरी कोई परवाह ही नहीं है, तो मैं क्यों पागल हो रहा हूं। आज से मैं उसे अपनी जिंदगी से निकाल फेंकता हूं।" वह बड़बड़ाने लगा। उसने अविनाश के सारे ख़त, तस्वीर और उपहार जला दिए। किताबों में सूखे हुए गुलाब के फूल मसल कर चूर चूर कर दिए। और सारी रात रोते हुए गुजार दी।


     कुछ दिन बाद नीरज के घर वालों को एक रिश्ता बहुत ही पसंद आया। और दोनों पक्षों की सहमति से शादी तय कर दी गई।वह लड़की मुरादाबाद के रहने वाली थी। अतः तय हुआ कि शादी वहीं जाकर की जाएगी, और अपने परिचितों के लिए सगाई व प्रीति भोज का कार्यक्रम आगरा में करने का निर्णय लिया गया। शादी में ज्यादा दिन नहीं थे, अतः तेजी से तैयारियां होने लगी। खरीदारी और सब को निमंत्रण देने के काम में दिन कैसे उड़े जा रहे थे पता ही ना लगा। अविनाश को बुलाए या ना बुलाए, वह कुछ निश्चय नहीं कर पा रहा था। आखिरकार सगाई से एक दिन पहले, उसने अविनाश को निमंत्रित करने का फैसला ले लिया। खाने से निपट कर उसने धड़कते दिल से फोन लगाया। "हेलो!!!" इस बार अविनाश की आवाज थी।


नीरज :- "हेलो.....अवि??"


अविनाश :- (हैरानी से) "हां नीरज???"


नीरज :- "हाँ"


अविनाश :- "कितने महीनों से तुम्हारे फोन का इंतजार कर रहा था, तुमने किया क्यों नहीं??"


नीरज :- "किया तो था!!!"


अविनाश :- "कब???"


नीरज :- "तुम्हारा मैसेज काफी लेट मिला था मुझे। दीदी भूल गई थी बताना। जब याद आया तो बताया, तो मैंने उसी दिन फोन किया था। पर हमेशा की तरह तुम फोन पर नहीं थे। आंटी से बात हुई थी। तुम जयपुर गए हुए थे।"


अविनाश :- "अच्छा!!! तो मां शायद बताना भूल गई होंगी, कि तुमने कॉल किया था।"


नीरज :- "कोई जरूरी काम था क्या???"


अविनाश :- "हां!!! तुमने भविष्य के लिए कुछ सोचा है नीरज???"


नीरज :- "क्या सोचूं???"


अविनाश :- "अब मैं सेटल हो गया हूं। अपना बिजनेस कर लिया है। इतना कमाने लगा हूं, कि परिवार की जरूरतें भी पूरी कर सकूं, और हम दोनों की भी।"


नीरज :-  "मुबारक हो!!"


अविनाश :- "तुम मेरे साथ रहोगे नीरज?? (एक वज्र सा गिरा और नीरज ने खुद को लहूलुहान महसूस किया) आई लव यू सो मच!!"


नीरज :- "तुम यह बात आज कह रहे हो, अवि!!! (वह कराह उठा) कब से तुम्हारे मुंह से यह सुनने के लिए तरस रहा था मैं!! (वह सिसक पड़ा)


अविनाश :- "मैं तब तक तुमसे कुछ नहीं कहना चाहता था, जब तक मैं अपने पैरों के नीचे पुख्ता जमीन ना बना दूं। आज हालात इस काबिल हो चुके हैं। और मैंने अपने परिवार में भी अपनी पसंद के बारे में खुलकर सबको बता दिया है।"


नीरज :- "अब क्या फायदा!!! कल मेरी इंगेजमेंट है।"


अविनाश :- "ऐसा मजाक मत करो नीरज!! मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा।"


नीरज :- "तुम्हें बर्दाश्त भी करना पड़ेगा, और इस हकीकत को कबूल भी करना पड़ेगा। मैंने तुम्हें इनवाइट करने के लिए फोन किया था। कल दिन में मेरी रिंग सेरेमनी है और 1 सप्ताह बाद शादी।"


अविनाश :- "तुम सच बोल रहे हो???"


नीरज :- "मुझे झूठ बोलकर क्या मिलेगा!! कल आ रहे हो ना???"


अविनाश :- "नहीं!!!"


नीरज :- "क्यों???"


अविनाश :- "मैं कैसे आ सकता हूं??'


नीरज :- "क्या दिक्कत है??"


अविनाश :- "तुम्हें अपने सामने किसी और का होते कैसे देख पाऊंगा???"


नीरज :- "जैसे मैं खुद को जिंदगी से दूर होते हुए देख लूंगा, जिस आग से मुझे गुजरना होगा, उसकी थोड़ी सी तपिश तुम भी तो बर्दाश्त करके देखो।" (नीरज ने सुबकते हुए फ़ोन रख दिया)



      उस रोज सगाई की रस्म भी सम्पन्न हुई। इतना मायूस और उदास दूल्हा, मधुर ने आज तक नही देखा था। वो अपने दोस्त के दर्द को अच्छे से समझ सकता था। उसने नीरज को एक बार को समझाया भी की अगर वो यहाँ से भाग कर अविनाश के साथ जाना चाहे, तो वो नीरज की हर मदद करने को तैयार है। नीरज ने उसे ऐसा कुछ भी करने से साफ मना कर दिया। 


नीरज :- "यार मैंने इतने सालों बस अविनाश की एक हाँ का इंतज़ार किआ। मैं अविनाश के साथ के आगे, हर किसी की बातें सुनने को भी तैयार था। लेकिन इस सब मे मेरे घरवालों के क्या कसूर। उन लोगों ने तो इस रिश्ते के लिए भी मुझसे बहुत बार पूछा, और मेरे हाँ करने के बाद ही ये शादी तय की। अब मेरे इस फैसले के साथ, कोई दूसरा परिवार और उसकी इज्जत भी जुड़ चुकी है। तो अब इन सभी लोगो की बेज्जती करने का मुझे कोई हक नहीं।"


     उस रात नीरज की आँखों से केवल आँसू ही नही बहे थे। उन आँसुओ के साथ वो सारे सपने, वो सारे ख्वाब भी बह गए थे। जो वो इतने सालों बुनता रहा था। फिर कुछ दिनों बाद, मुरादाबाद के लिए रवानगी से एक दिन पहले अविनाश, नीरज से मिलने आया। बड़ी हुई दाड़ी, लाल आँखे और चेहरे पे छाई मायूसी के साथ उसने नीरज से बात की।


अविनाश :- "कैसे हो?"


नीरज :- "कैसा हो सकता हूँ, अवि??"


अविनाश :- "नीरज हमेशा खुश रहना!!!"


नीरज :- "तुमने क्यों इतना समय लगा दिया अवि!!!"



       वहाँ कमरे में उन दोनों के अलावा कोई और तो मौजूद नहीं था, और ना ही वो दोनों एक दूसरे से कुछ बोल भी रहे थे। लेकिन उन दोनों की ख़ामोशी आपस मे ना जाने कितनी बातें कर रही थी। उन दोनों की जुबां तो कुछ नही कह रही थी, लेकिन उनकी आँखों से बहती आँसुओ की धारा, उन दोनों के दिल के हाल को बयां कर रही थी। दोनों ही एक दूसरे के लिए फैसलों के बोझ तले, अपने आने वाले जीवन को दांव पर लगाने को तैयार खड़े थे। लेकिन दोनों ने ही एक ऐसे सफर पर जाने की तैयारी कर ली थी, जिसके ना रास्तों से जान पहचान थी, और ना ही मंजिल का पता।



      अब आगे ये कहानी क्या मोड़ लेकर आएगी। जानने के लिए थोड़ा इंतेज़ार कीजिये।




      





      










Shadi.Com Part - III

Hello friends,                      If you directly landed on this page than I must tell you, please read it's first two parts, than you...